कविता | Poetry

कविता: मैं समर अवशेष हूँ – पूजा शाह

‘कुरुक्षेत्र’ कविता और ‘अँधा युग’ व् ‘ताम्बे के कीड़े’ जैसे नाटक जिस बात को अलग-अलग शैलियों और शब्दों में दोहराते हैं, वहीं एक दोस्त की यह कविता भी उन लोगों का मुँह ताकती है जो Read more…

कविता | Poetry

कविता: ‘तमाशा’ – पुनीत कुसुम

उन्मादकता की शुरुआत हो जैसे जैसे खुलते और बंद दरवाज़ों में खुद को गले लगाना हो जैसे कोनों में दबा बैठा भय आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए जैसे वो सत्य जिसे झुठलाने की Read more…

रिपोर्ताज | Reportage

‘अदम्य जीवन’ – रांगेय राघव का रिपोर्ताज

पचास के दशक के आरम्भ में पड़े बंगाल के अकाल के बारे में रांगेय राघव ने यह रिपोर्ताज लिखा था, जो ‘तूफानों के बीच’ रिपोर्ताज संग्रह में प्रकाशित हुआ। बंगाल के अकाल के दौरान जो Read more…

कविता | Poetry

“शदायी केह्न्दे ने” – रमेश पठानिया की कविताएँ

आधुनिक युग का आदमियत पर जो सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है वो है इंसान से उसकी सहजता छीन लेना। थोपे हुए व्यवसाए हों या आगे बढ़ जाने की दौड़, हम जाने किन-किन माध्यमों का प्रयोग Read more…

लेखकों से बातचीत | Authors' Interviews

जो पढ़ने में आप सहज हैं, वही पढ़ें – शान रहमान

कॉरपोरेट के पिंजरे में फंसे एक साहित्य प्रेमी के आगे अगर एक किताब रख दी जाए जिसका नाम हो “कॉरपोरेट कबूतर”, तो उस किताब की तरफ आकर्षण स्वाभाविक ही है. पटना में रहने वाले शान Read more…

अनुवाद | Translation

कविता: ‘स्वयं हेतु’ – रिया जैन

रिया अंग्रेज़ी कविताएँ लिखती हैं और अपनी उम्र की भावनाएँ और असमंजस बड़े सुलझे हुए शब्दों में उकेरती हैं। मैंने यह कविता रिया के ब्लॉग The Scribbling Girl पर पढ़ी थी और चूंकि हिन्दी में ज़्यादा Read more…

ब्लॉग | Blog

हरिवंशराय बच्चन: जन्मदिन पर विशेष

नोट: यह लेख मूल रूप से हिन्दी अखबार अमर उजाला के ऑनलाइन पोर्टल ‘काव्य’ के लिए लिखा गया था। यहाँ पुनः प्रस्तुत है। हरिवंशराय बच्चन हिन्दी साहित्य के सबसे अधिक लोकप्रिय कवियों में से एक Read more…

Uncategorized

दुविधा (मुक्तिबोध की कविता ‘मुझे कदम कदम पर’ से प्रेरित)

कविताएँ अपने पाठकों के भीतर बहुत कुछ जगा देती हैं और उन्हें बहुत जगह भी देती हैं जिसमें कुछ न कुछ चुपचाप बैठा रहता है, जीता रहता है, बढ़ता रहता है और मौका ढूँढता रहता Read more…

ब्लॉग | Blog

हिन्दी हाइकु (Hindi Haiku)

पिछले दिनों रोशनदान ग्रुप द्वारा आयोजित पोएट्री वर्कशॉप में लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी द्वारा हाइकु, माहिया और दोहे जैसे काव्य रूपों को संक्षेप में समझने का मौका मिला। चूंकि यह पोस्ट हाइकु समझने हेतु है Read more…

कविता | Poetry

कविता: ‘कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ’ – पुनीत कुसुम

तुम कहती हो “कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ” मगर, क्यों मान लेती हो? आख़िर, क्यों मान लेती हो? पृथ्वी तो नहीं मानती अपने गुरुत्व को जब तक कोई ज़मीन से अपनी Read more…

कविता | Poetry

कुँवर नारायण: अबकी बार लौटा तो..

लेखक लक्ष्मण राव को एक वीडियो में कहते सुना था कि कोई कवि या लेखक पचास वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद जन्मता है और उसकी ज़िन्दगी उसकी मृत्यु के बाद शुरू होती है। Read more…

कहानी | Story

रानी पद्मावती/पद्मिनी की कहानी (जायसी की ‘पद्मावत’ का व्याख्यान)

संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ के कारण फिर से चर्चा में आयी रानी पद्मावती की कहानी, हिन्दी साहित्य के प्रेममार्गी शाखा के कवि मलिक मुहम्मद ‘जायसी’ के महान और चर्चित ग्रन्थ ‘पद्मावत’ में पायी Read more…

किताबें | Books

एक अतिरिक्त ‘अ’ – रश्मि भारद्वाज

भारतीय ज्ञानपीठ के जोरबाग़ वाले बुकस्टोर में एक किताब खरीदने गया था। खुले पैसे नहीं थे तो बिलिंग पर बैठे सज्जन ने सुझाया कि कोई और किताब भी देख लीजिए। यद्यपि मैं ऐसे बहाने ढूँढा Read more…

किताबें | Books

The Night Train at Deoli – Ruskin Bond

बहुत अच्छे लेखकों के बारे में यह एक आम धारणा है कि उन्हें उनकी मूल भाषा में ही पढ़ा जाना चाहिए। रस्किन बॉन्ड, जिन्होंने मूलतः अंग्रेजी में लिखा है, उनके बारे में भी यही कहा Read more…

कविता | Poetry

छायावाद का ‘बह चला झरना’

कोई भी बहुत लम्बे समय तक केवल मनोरंजन के लिए कविताएँ नहीं सुन सकता। चाहे कविताओं के विषय हों या कवि की कथन-शैली, एक पाठक कहीं न कहीं खुद को उन कविताओं में ढूँढने लगता Read more…

कहानी | Story

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘पंचलाइट’ (पंचलैट)

अपने उपन्यासों और कहानियों में लोकजीवन को एक कविता के जैसे पेश करने वाले फणीश्वरनाथ रेणु के कहानी संग्रह ‘ठुमरी’ की यह कहानी बड़ी मजेदार है। एक गाँव में विभिन्न जातियों की विभिन्न टोलियाँ हैं। Read more…

कविता | Poetry

‘पथिक’ – आदर्श भूषण

चलते चलते रुक जाओगे किसी दिन, पथिक हो तुम, थकना तुम्हारे न धर्म में है; ना ही कर्म में, उस दिन तिमिर जो अस्तित्व को, अपनी परिमिति में घेरने लगेगा, छटपटाने लगोगे, खोजना चाहोगे, लेकिन Read more…

कविता | Poetry

‘कविता’ पर कविताएँ

जब कविताएँ पढ़ते या लिखते हुए कुछ समय बीत जाता है तो कोई भी पाठक या कविता-प्रेमी अनायास ही कभी-कभी कुछ ऐसे सवालों में खोने लगता है जिनका कोई एक नियत जवाब नहीं हो सकता। Read more…

ब्लॉग | Blog

हिन्दी मुकरी

नहीं नहीं, हिन्दी अपने किसी वादे से नहीं मुकरी है, यह तो एक हिन्दी विधा (form) है जो मुकरे हुए लोगों का सैंकड़ों साल बाद भी इंतज़ार कर रही है कि कब वो मुड़कर उसकी Read more…

किताबें | Books

जगदीश चंद्र की ‘धरती धन न अपना’

जगदीश चंद्र की किताब ‘धरती धन न अपना’ एक और किताब है जो मुझे बड़ी मशक्कतों के बाद केवल ऑनलाइन एक सॉफ्टकॉपी के रूप में मिल पायी, जबकि यह किताब अपने विषय की एक उम्दा Read more…

किताबें | Books

‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ – अनुराधा बेनीवाल

अनुराधा बेनीवाल की यह पहली किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’, राजकमल प्रकाशन की ‘यायावरी आवारगी’ शृंखला का पहला पड़ाव है। वैसे तो शृंखला के नाम से जाहिर है कि यह एक यात्रा-वृत्तांत (travelogue) है, लेकिन किताब Read more…

ब्लॉग | Blog

बच्चन की त्रिवेणी – मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश

आलोचना अच्छी है, अगर करनी आती हो। और अगर लेनी आती हो तो और भी। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि न तो कोई जिम्मेदारी से आलोचना कर पाता है और न ही बहुत लोग Read more…

किताबें | Books

नई हिन्दी की शोस्टॉपर – रवीश कुमार की ‘इश्क़ में शहर होना’

मैं आज स्माल टाउन-सा फ़ील कर रहा हूँ… और मैं मेट्रो-सी। पढ़ने में सामान्य लेकिन शिकायत और शरारत दोनों दिखाती इन पंक्तियों से शुरू होने वाली इस किताब के बारे में लिखने में मुझे काफी Read more…

कविता | Poetry

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रेम कविताएँ

अमूमन रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का नाम आते ही जो पंक्तियाँ किसी भी कविता प्रेमी की ज़बान पर आती हैं, वे या तो ‘कुरुक्षेत्र’ की ये पंक्तियाँ होती हैं- “वह कौन रोता है वहाँ- इतिहास के Read more…

कविता | Poetry

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का जूता, मोजा, दस्ताने, स्वेटर और कोट

आप सोच रहे होंगें कि मैं सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कपड़ों की अलमारी क्यों खोलकर बैठा हूँ। लेकिन आप ग़लत सोच रहे हैं। ये सब चीज़ें उनकी कपड़ों की अलमारी से नहीं, उनके कविता संग्रह ‘खूटियों पर Read more…

लप्रेक | Laprek

लप्रेक – इंटरेस्टेड ही तो किया है!

“राहुल, तुमने वो आँटी वाली इवेंट में इंटरेस्टेड क्यों किया हुआ था?” “ऐंवेही यार! अब तुम शुरू मत हो जाना, पैट्रिआर्कि, फेमिनिज्म, कुण्डी मत खड़काओ एन ऑल।” “क्यों ना शुरू हो जाऊँ? रीज़न दे दो, Read more…

ब्लॉग | Blog

संग-ए-मील

10 सितंबर 2017, रविवार के दिन जब आधी दिल्ली, शाम के मनोरंजन के प्लान बना रही थी, तब दिल्ली का एक कोना सुबह से ही कविताओं और गीतों में खोया हुआ था। मौका था दिल्ली Read more…

ब्लॉग | Blog

हिन्दी दिवस का उपहार – ‘प्रेमचंद – कलम का सिपाही’

किसी हिन्दी पाठक के पढ़ने की शुरुआत कहीं से भी हुई हो, जब तक अन्य उम्दा लेखकों से साक्षात्कार नहीं हो जाता या फिर खुद के फेवरेट्स नहीं बन जाते, किसी भी नए पाठक को Read more…

लप्रेक | Laprek

लप्रेक – प्रेम, प्रेम, प्रेम

“प्रेम, प्रेम, प्रेम।” “क्या हुआ है तुम्हें, तबियत सही है ना?” “हाँ, तबियत को क्या हुआ?! बस तीन बार कुछ बोलने का मन हुआ। आज तो बनता है, नहीं?” “ह्म्म्म!!” “ह्म्म्म क्या? प्यार पर भी Read more…

कविता | Poetry

फुलझड़ी – पुनीत कुसुम

एक समस्या मुँह खोले खड़ी है वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है? है बदन ज्यों चन्द्रमा और थोड़ा काँच हो रेत से लिपटे हो दोनों और थोड़ी आँच हो एक वृत फिर आतिशों Read more…

लप्रेक | Laprek

लप्रेक – चित्रलेखा

“मैंने एक अनुभव किया है- जब भी मैं अलगाव की कोई भी बात पढ़ती हूँ तो उद्विग्न हो जाती हूँ। उस व्यक्ति से घृणा होने लगती है जिसने अलग होने की भूमि तैयार की है Read more…

कविता | Poetry

राधा-कृष्ण – शिवा & पुनीत कुसुम

Puneet- हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे कान्हा ढूँढ रहा तुझे राधे ऊपर नभ् को खोल खोल कर धरती के भीतर टटोल कर स्वर्ग, नरक और पातालों में जीव-मरण Read more…

कविता | Poetry

एक पेड़ – पुनीत कुसुम

[पापा के लिए] एक पेड़ मेरी क्षमता में जिसका केवल ज़िक्र करना भर है जिसे उपमेय और उपमान में बाँधने की न मेरी इच्छा है, न ही सामर्थ्य एक पेड़ जिसे हमेशा विशाल और घना Read more…

लप्रेक | Laprek

लप्रेक – चाय-अदरक

“चार महीने जिम जाकर ये अदरक जैसी बॉडी बनायी तुमने?” “तुम चाय जैसी क्यों होती जा रही हो?” “चाय जैसी? मतलब? देखो  रेसिस्ट कॉमेंट किया तो अभी ब्रेक-अप हो जाएगा” “अरे बाबा! मतलब हर वक़्त तुम्हारी तलब Read more…

लप्रेक | Laprek

लप्रेक – मन की बात

“सुनो।” “हाँ।” “अगर मेरे लिए कोई मन्दिर बनाकर उसमें मेरी मूर्ति रखे, तो मुझे तो बहुत अच्छा लगे।” “पर ऐसे पूजने वाले ज्यादा हो जायेंगे और प्यार करने वाले कम।” “प्यार करने वाले चाहिए भी Read more…

लप्रेक | Laprek

लप्रेक – तुम मुबारक

“लगे इलज़ाम लाखो हैं कि घर से दूर निकला हूँ तुम्हारी ईद तुम समझो, मैं तो बदस्तूर निकला हूँ।” “तुम नहीं सुधरोगे ना? कोई घर ना जा पाने से दुखी है और तुम्हें व्यंग सूझ Read more…

कविता | Poetry

एक्सट्रा चीज़! – शिवा & पुनीत कुसुम

Shiva- कभी आँखों से लिख दो कुछ मेरी आखों पर कि हया की हर झुकी नज़र का गुनेहगार तुम्हारा ज़िक्र हो और दुआ में उठी पलकें वहां ऊपर भी तुम्हें ही पायें Puneet- तुम आँखों Read more…

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तिराहा – पुनीत कुसुम

एक तिराहे पर दो सेकंड रुकना हुआ, आधी नींद में था। आँख की एक झपक के बीच ही कई छोटे दृश्य दिखे। पहले में एक आदमी अपनी पत्नी को साइकिल की पीछे वाली सीट पर Read more…

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घर आ गया – पुनीत कुसुम

सोचा नहीं था, इस भाषा में दोबारा उतर पाऊँगा। मगर, अगर सोचा गया ही होने लगे तो ना रंज रहेगा, ना रस। रंज का वियोग सहनीय है, रस का नही। बहरहाल, पता नहीं कहाँ जा Read more…