ब्लॉग | Blog

बच्चन की त्रिवेणी – मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश

आलोचना अच्छी है, अगर करनी आती हो। और अगर लेनी आती हो तो और भी। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि न तो कोई जिम्मेदारी से आलोचना कर पाता है और न ही बहुत लोग Read more…

By Puneet Kusum, ago
किताबें | Books

नई हिन्दी की शोस्टॉपर – रवीश कुमार की ‘इश्क़ में शहर होना’

मैं आज स्माल टाउन-सा फ़ील कर रहा हूँ… और मैं मेट्रो-सी। पढ़ने में सामान्य लेकिन शिकायत और शरारत दोनों दिखाती इन पंक्तियों से शुरू होने वाली इस किताब के बारे में लिखने में मुझे काफी Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रेम कविताएँ

अमूमन रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का नाम आते ही जो पंक्तियाँ किसी भी कविता प्रेमी की ज़बान पर आती हैं, वे या तो ‘कुरुक्षेत्र’ की ये पंक्तियाँ होती हैं- “वह कौन रोता है वहाँ- इतिहास के Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का जूता, मोजा, दस्ताने, स्वेटर और कोट

आप सोच रहे होंगें कि मैं सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कपड़ों की अलमारी क्यों खोलकर बैठा हूँ। लेकिन आप ग़लत सोच रहे हैं। ये सब चीज़ें उनकी कपड़ों की अलमारी से नहीं, उनके कविता संग्रह ‘खूटियों पर Read more…

By Puneet Kusum, ago
लप्रेक | Laprek

लप्रेक – इंटरेस्टेड ही तो किया है!

“राहुल, तुमने वो आँटी वाली इवेंट में इंटरेस्टेड क्यों किया हुआ था?” “ऐंवेही यार! अब तुम शुरू मत हो जाना, पैट्रिआर्कि, फेमिनिज्म, कुण्डी मत खड़काओ एन ऑल।” “क्यों ना शुरू हो जाऊँ? रीज़न दे दो, Read more…

By Puneet Kusum, ago
ब्लॉग | Blog

संग-ए-मील

10 सितंबर 2017, रविवार के दिन जब आधी दिल्ली, शाम के मनोरंजन के प्लान बना रही थी, तब दिल्ली का एक कोना सुबह से ही कविताओं और गीतों में खोया हुआ था। मौका था दिल्ली Read more…

By Shiva, ago
ब्लॉग | Blog

हिन्दी दिवस का उपहार – ‘प्रेमचंद – कलम का सिपाही’

किसी हिन्दी पाठक के पढ़ने की शुरुआत कहीं से भी हुई हो, जब तक अन्य उम्दा लेखकों से साक्षात्कार नहीं हो जाता या फिर खुद के फेवरेट्स नहीं बन जाते, किसी भी नए पाठक को Read more…

By Puneet Kusum, ago
लप्रेक | Laprek

लप्रेक – प्रेम, प्रेम, प्रेम

“प्रेम, प्रेम, प्रेम।” “क्या हुआ है तुम्हें, तबियत सही है ना?” “हाँ, तबियत को क्या हुआ?! बस तीन बार कुछ बोलने का मन हुआ। आज तो बनता है, नहीं?” “ह्म्म्म!!” “ह्म्म्म क्या? प्यार पर भी Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

फुलझड़ी – पुनीत कुसुम

एक समस्या मुँह खोले खड़ी है वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है? है बदन ज्यों चन्द्रमा और थोड़ा काँच हो रेत से लिपटे हो दोनों और थोड़ी आँच हो एक वृत फिर आतिशों Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

ग्लोबल वॉर्मिंग – शिवा

मेरे दिल की सतह पर टार जम गया है साँस खींचती हूँ तो खिंची चली आती है कई टूटे तारों की राख ना जाने कितने अरमान निगल गयी हूँ साँस छोड़ती हूँ तो बढ़ने लगता Read more…

By Shiva, ago
लप्रेक | Laprek

लप्रेक – चित्रलेखा

“मैंने एक अनुभव किया है- जब भी मैं अलगाव की कोई भी बात पढ़ती हूँ तो उद्विग्न हो जाती हूँ। उस व्यक्ति से घृणा होने लगती है जिसने अलग होने की भूमि तैयार की है Read more…

By Shiva, ago
कविता | Poetry

राधा-कृष्ण – शिवा & पुनीत कुसुम

Puneet- हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे कान्हा ढूँढ रहा तुझे राधे ऊपर नभ् को खोल खोल कर धरती के भीतर टटोल कर स्वर्ग, नरक और पातालों में जीव-मरण Read more…

By Shiva, ago
लप्रेक | Laprek

लप्रेक – इश्क़ में ‘आम’ होना

“तुम ऐसे खाते हो? मैं तो काट के खाती हूँ। ऐसे गँवार लगते हैं और मुँह भी गन्दा हो जाता है और पब्लिक में तो ऐसे खा ही नहीं सकते। तुम न जाने कैसे…। अच्छा Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

एक पेड़ – पुनीत कुसुम

[पापा के लिए] एक पेड़ मेरी क्षमता में जिसका केवल ज़िक्र करना भर है जिसे उपमेय और उपमान में बाँधने की न मेरी इच्छा है, न ही सामर्थ्य एक पेड़ जिसे हमेशा विशाल और घना Read more…

By Puneet Kusum, ago
लप्रेक | Laprek

लप्रेक – चाय-अदरक

“चार महीने जिम जाकर ये अदरक जैसी बॉडी बनायी तुमने?” “तुम चाय जैसी क्यों होती जा रही हो?” “चाय जैसी? मतलब? देखो  रेसिस्ट कॉमेंट किया तो अभी ब्रेक-अप हो जाएगा” “अरे बाबा! मतलब हर वक़्त तुम्हारी तलब Read more…

By Shiva, ago
लप्रेक | Laprek

लप्रेक – मन की बात

“सुनो।” “हाँ।” “अगर मेरे लिए कोई मन्दिर बनाकर उसमें मेरी मूर्ति रखे, तो मुझे तो बहुत अच्छा लगे।” “पर ऐसे पूजने वाले ज्यादा हो जायेंगे और प्यार करने वाले कम।” “प्यार करने वाले चाहिए भी Read more…

By Puneet Kusum, ago
लप्रेक | Laprek

लप्रेक – तुम मुबारक

“लगे इलज़ाम लाखो हैं कि घर से दूर निकला हूँ तुम्हारी ईद तुम समझो, मैं तो बदस्तूर निकला हूँ।” “तुम नहीं सुधरोगे ना? कोई घर ना जा पाने से दुखी है और तुम्हें व्यंग सूझ Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

एक्सट्रा चीज़! – शिवा & पुनीत कुसुम

Shiva- कभी आँखों से लिख दो कुछ मेरी आखों पर कि हया की हर झुकी नज़र का गुनेहगार तुम्हारा ज़िक्र हो और दुआ में उठी पलकें वहां ऊपर भी तुम्हें ही पायें Puneet- तुम आँखों Read more…

By Shiva, ago
Uncategorized

तिराहा – पुनीत कुसुम

एक तिराहे पर दो सेकंड रुकना हुआ, आधी नींद में था। आँख की एक झपक के बीच ही कई छोटे दृश्य दिखे। पहले में एक आदमी अपनी पत्नी को साइकिल की पीछे वाली सीट पर Read more…

By Puneet Kusum, ago
Uncategorized

घर आ गया – पुनीत कुसुम

सोचा नहीं था, इस भाषा में दोबारा उतर पाऊँगा। मगर, अगर सोचा गया ही होने लगे तो ना रंज रहेगा, ना रस। रंज का वियोग सहनीय है, रस का नही। बहरहाल, पता नहीं कहाँ जा Read more…

By Puneet Kusum, ago

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