साक्षात्कार | Interviews

अमृता के इमरोज़ से ‘सात सवाल’

अमृता-इमरोज़ का नाम आते ही या तो प्रेम-तिकोनों के कोण नपने लगते हैं या फिर एक में खुद को भुला चुका कोई दूसरा ‘एक’ याद आने लगता है। दो पर एक की छाया हमेशा रहती Read more…

By Posham Pa, ago
कहानी | Story

कहानी: ‘ठाकुर का कुआँ’ – प्रेमचंद

‘ठाकुर का कुआँ’ – प्रेमचंद जोखू ने लोटा मुँह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आयी। गंगी से बोला- “यह कैसा पानी है? मारे बास के पिया नहीं जाता। गला सूखा जा रहा है Read more…

By Posham Pa, ago
उद्धरण | Quotes

कुछ पंक्तियाँ – ‘ग़बन’ (प्रेमचंद)

“उत्कंठा की चरम सीमा ही निराशा है।” “रूपये के मामले में पुरूष महिलाओं के सामने कुछ नहीं कह सकता। क्या वह कह सकता है, इस वक्त मेरे पास रूपये नहीं हैं। वह मर जाएगा, पर Read more…

By Posham Pa, ago
ब्लॉग | Blog

दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2018 में खरीदें ये 15 हिन्दी किताबें

हिन्दी में नया क्या लिखा जा रहा है, यह इंटरनेट के युग में भी ढूंढ पाना इतना आसान नहीं नज़र आता। इतनी पर्याप्त जानकारी किसी एक वेबसाइट या पोर्टल पर नहीं मिलती कि उसमें से Read more…

By Puneet Kusum, ago
Library

कहानी: ‘टोबा टेक सिंह’ – सआदत हसन मंटो

‘टोबा टेक सिंह’ – सआदत हसन मंटो बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल Read more…

By Posham Pa, ago
नव-लेखन | New Writing

कविता: मैं समर अवशेष हूँ – पूजा शाह

‘कुरुक्षेत्र’ कविता और ‘अँधा युग’ व् ‘ताम्बे के कीड़े’ जैसे नाटक जिस बात को अलग-अलग शैलियों और शब्दों में दोहराते हैं, वहीं एक दोस्त की यह कविता भी उन लोगों का मुँह ताकती है जो Read more…

By Posham Pa, ago
नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘तमाशा’ – पुनीत कुसुम

उन्मादकता की शुरुआत हो जैसे जैसे खुलते और बंद दरवाज़ों में खुद को गले लगाना हो जैसे कोनों में दबा बैठा भय आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए जैसे वो सत्य जिसे झुठलाने की Read more…

By Puneet Kusum, ago
रिपोर्ताज | Reportage

‘अदम्य जीवन’ – रांगेय राघव का रिपोर्ताज

पचास के दशक के आरम्भ में पड़े बंगाल के अकाल के बारे में रांगेय राघव ने यह रिपोर्ताज लिखा था, जो ‘तूफानों के बीच’ रिपोर्ताज संग्रह में प्रकाशित हुआ। बंगाल के अकाल के दौरान जो Read more…

By Posham Pa, ago
नव-लेखन | New Writing

“शदायी केह्न्दे ने” – रमेश पठानिया की कविताएँ

आधुनिक युग का आदमियत पर जो सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है वो है इंसान से उसकी सहजता छीन लेना। थोपे हुए व्यवसाए हों या आगे बढ़ जाने की दौड़, हम जाने किन-किन माध्यमों का प्रयोग Read more…

By Puneet Kusum, ago
लेखकों से बातचीत | Authors' Interviews

जो पढ़ने में आप सहज हैं, वही पढ़ें – शान रहमान

कॉरपोरेट के पिंजरे में फंसे एक साहित्य प्रेमी के आगे अगर एक किताब रख दी जाए जिसका नाम हो “कॉरपोरेट कबूतर”, तो उस किताब की तरफ आकर्षण स्वाभाविक ही है. पटना में रहने वाले शान Read more…

By Shiva, ago
अनुवाद | Translation

कविता: ‘स्वयं हेतु’ – रिया जैन

रिया अंग्रेज़ी कविताएँ लिखती हैं और अपनी उम्र की भावनाएँ और असमंजस बड़े सुलझे हुए शब्दों में उकेरती हैं। मैंने यह कविता रिया के ब्लॉग The Scribbling Girl पर पढ़ी थी और चूंकि हिन्दी में ज़्यादा Read more…

By Puneet Kusum, ago
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