आधा चाँद माँगता है पूरी रात

पूरी रात के लिए मचलता है
आधा समुद्र..
आधे चाँद को मिलती है पूरी रात
आधी पृथ्वी की पूरी रात..
आधी पृथ्वी के हिस्से में आता है
पूरा सूर्य..

आधे से अधिक
बहुत अधिक मेरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ लोग
आधे वस्त्रों से ढांकते हुए पूरा तन
आधी चादर में फैलाते हुए पूरे पांव
आधे भोजन से खींचते पूरी ताकत
आधी इच्छा से जीते पूरा जीवन
आधे इलाज की देते पूरी फीस
पूरी मृत्यु
पाते आधी उम्र में।

आधी उम्र, बची आधी उम्र नहीं
बीती आधी उम्र का बचा पूरा भोजन
पूरा स्वाद
पूरी दवा
पूरी नींद
पूरा चैन
पूरा जीवन

पूरे जीवन का पूरा हिसाब हमें चाहिए

हम नहीं समुद्र, नहीं चाँद, नहीं सूर्य
हम मनुष्य, हम-
आधे चौथाई या एक बटा आठ
पूरे होने की इच्छा से भरे हम मनुष्य।


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नरेश सक्सेना
नरेश सक्सेना

जन्म : 16 जनवरी 1939, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
कविता संग्रह : समुद्र पर हो रही है बारिश, सुनो चारुशीला
नाटक : आदमी का आ
पटकथा लेखन : हर क्षण विदा है, दसवीं दौड़, जौनसार बावर, रसखान, एक हती मनू (बुंदेली)
फिल्म निर्देशन : संबंध, जल से ज्योति, समाधान, नन्हें कदम (सभी लघु फिल्में)
सम्मान: पहल सम्मान, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (1992), हिंदी साहित्य सम्मेलन का सम्मान, शमशेर सम्मान

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