मोहन राकेश का नाटक ‘आधे-अधूरे’ एक मध्यमवर्गीय परिवार की आंतरिक कलह और उलझते रिश्तों के साथ-साथ समाज में स्त्री-पुरुष के बीच बदलते परिवेश तथा एक-दूसरे से दोनों की अपेक्षाओं को चित्रित करता है।

महेन्द्रनाथ बहुत समय से व्यापार में असफल होकर घर पर बेकार बैठा है और उसकी पत्नी सावित्री नौकरी करके घर चलाती है। कई तरह की परिस्थितियों और अपने-अपने स्वभाव के कारण दोनों एक दूसरे से नफरत करते हैं मगर फिर भी सामाजिक, पारिवारिक और रूढ़िगत ढांचों में कसे रहने के कारण साथ रहने को मजबूर हैं। महेन्द्रनाथ और सावित्री का एक-दूसरे से घृणा करते हुए भी साथ रहना, भारतीय समाज में व्याप्त रूढ़िगत विवशताओं को ज़ाहिर करता है जिसके चलते स्त्री तो क्या, पुरुष-प्रधान समाज का एक पुरुष भी शादी जैसे बंधन को तोड़ पाने में खुद को असमर्थ पाता है।

सावित्री को महेन्द्रनाथ हमेशा से दब्बू, व्यक्तित्वहीन और उसपर निर्भर रहने वाला बेकार आदमी नज़र आता है जिसका उसकी नज़रों में कोई सम्मान नहीं है। वह अपने लिए या जीवन बिताने के लिए एक ऐसे आदमी की अपेक्षा अपने जीवनसाथी के रूप में नहीं करती। इसलिए उससे कटती जाती है और लगातार किसी ऐसे पूर्ण आदमी की तलाश करती रहती है जो उसकी सारी कसौटियों पर खरा उतर सके किन्तु ऐसा आदमी उसे कहीं नहीं मिलता। कभी-कभी ऐसे आदमी की कुछ विशेषताओं को किसी व्यक्ति में पाकर वह दूसरों की तरफ आकर्षित होती है किन्तु समय बीतने पर कुछ-न-कुछ कमी पाकर सदैव निराश होती है। सावित्री का इस प्रकार अपने पति से मिली निराशा के फलस्वरूप बाहर एक पूर्ण आदमी की लगातार तलाश करना स्त्रियों की अपने जीवन को लेकर एक नयी आत्मकेंद्रित मनोवृत्ति का भी प्रतीक है।

दूसरी और महेन्द्रनाथ को लगता है कि सावित्री सदैव उस पर हावी होने की तथा उसे अपमानित करने की कोशिश करती है। वह हमेशा उसे नियंत्रित करना चाहती है। वह बार-बार उससे दूर जाने की कोशिश करता है, परन्तु उस पर इस प्रकार निर्भर है कि उसे हर बार लौट आना पड़ता है।

दोस्तों का चहेता और हँसमुख महेन्द्रनाथ सावित्री से शादी करने के बाद व्यापार में लगातार असफल होकर, मारने-पीटने वाला, पत्नी के परिचितों-प्रेमियों के घर आने पर घर से चले जाना वाला एक हारा हुआ व्यक्ति बन गया है। सबसे अपमानित होकर वह अपने बचपन के मित्र जुनेजा के यहाँ जाता है कि कभी घर नहीं लौटेगा। किन्तु अंत में ब्लडप्रेशर की बुरी हालत में ही वापस लौट आता है। वह न सावित्री के साथ रह सकता है, न ही अलग।

कह सकते हैं कि दोनों को किसी दूसरे साथी की तलाश है। दोनों अपने में अभी आधे से हैं, अधूरे हैं और उनका वर्तमान साथी इस अधूरेपन को कम नहीं करता, बल्कि इस एहसास को और अधिक बढ़ा देता है।

यह स्थिति अपने आप में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का एक त्रासद रूप है। नाटककार की दृष्टि से देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि किसी भी परिस्थिति में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में कभी कोई सामंजस्य या स्थायी तालमेल हो ही नहीं सकता। स्त्री-पुरुष सम्बन्ध एक ऐसा अंतर्विरोध लेकर आगे बढ़ते हैं जहाँ साथ रहना भी मुश्किल है और अलग होना भी। दोनों को इसी प्रकार से एक आधा-अधूरा सा जीवन जीते रहने के लिए विवश होना पड़ता है।

यह स्थिति आधुनिक मध्यमवर्गीय समाज में स्त्री-पुरुष के बीच के सम्बन्धों में आए बदलाव को यथास्वरूप चित्रित करती है, जहाँ महत्त्वाकांक्षाएं, आत्मकेंद्रित स्वभाव तथा आत्म-निर्भर न होने की स्थिति में वह रिश्ता जो जीवन का आधार होना चाहिए, एक बोझ बनकर रह जाता है और स्त्री-पुरुष आजीवन उस बोझ को ढोने के लिए खुद को विवश पाते हैं।

महेन्द्रनाथ और सावित्री के बीच के इस भावनात्मक अलगाव का मुख्य कारण उनकी आर्थिक स्थिति भी समझी जा सकती है। परन्तु नाटककार मोहन राकेश ने अन्य पात्रों के ज़रिए यह भी दर्शाया है कि पति-पत्नी के अलगाव और परिवार के टूटने का एकमात्र कारण हमेशा आर्थिक संकट ही नहीं होता। सावित्री की बेटी बिन्नी और उसके पति मनोज का वैवाहिक जीवन आर्थिक दृष्टि से अच्छा है, फिर भी उनके बीच तनाव और उनके बीच के रिश्ते में आयी घुटन उपर्युक्त कथन को प्रमाणित करते हैं।

नाटक में महेन्द्रनाथ के अलावा जुनेजा, शिवजीत, जगमोहन, मनोज और सिंघानिया का भी उल्लेख हुआ है। इन पात्रों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति महेन्द्रनाथ से काफी अलग थी और यही एक कारण माना जा सकता है कि सावित्री इन पात्रों में से कुछ के प्रति आकर्षित रही, परन्तु फिर भी एक ऐसा स्थायी सम्बन्ध बनाने में असक्षम रही जो उसकी अपूर्णता को ख़त्म कर पाता। इसी से पता चलता है कि मध्यमवर्गीय समाज का मनुष्य आजकल रिश्ते बनाते वक़्त तत्कालीन सुविधा खोजता है और जब वह सुविधा समाप्त हो जाती है तो इस रिश्ते के बने रहने का भी कोई कारण नहीं रहता। बड़ी तेजी से आते इस बदलाव में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध भी अपने रूप और आकार बदल लेते हैं। यही कारण है कि ‘आधे-अधूरे’ नाटक स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों में व्याप्त असफलताओं, अपूर्ण महत्त्वकांक्षाओं, यौन कुंठाओं तथा भय, घृणा और आक्रोश को उजागर करता है।

पति-पत्नी के बीच मानसिक विच्छेद और कलह का असर उनके अन्य रिश्तों पर भी पड़ता है। महेन्द्रनाथ और सावित्री की बड़ी बेटी बिन्नी ने माँ के ही एक प्रेमी मनोज के साथ भागकर शादी कर ली लेकिन फिर भी दुखी और परेशान है। बेटा अशोक पिता की भांति बेकार है, उसका नौकरी में मन नहीं लगता और वह अपना जीवन अभिनेत्रियों की तस्वीरों और अश्लील पुस्तकों के सहारे काट रहा है। छोटी बेटी भी इस वातावरण में बिगड़कर जिद्दी, मुँहफट तथा चिड़चिड़ी हो गयी है और उम्र से पहले ही यौन सम्बन्धों में रूचि रखने लगी है। इन सभी पात्रों के व्यवहार में महेन्द्रनाथ और सावित्री के कटु सम्बन्धों की छाप साफ़ नज़र आती है। अतः ‘आधे-अधूरे’ नाटक यह भी दर्शाता है कि किस तरह स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों में आए बदलाव पारिवारिक ढाँचे और अन्य रिश्तों पर भी असर डालते हैं।

मध्यमवर्ग में जहाँ एक ओर स्वतंत्र, प्रगतिशील, मुक्त जीवन यापन की आकांक्षा है तो वहीं साथी पर निर्भरता और स्थायी रिश्तों की चाह भी है। और यही कारण है कि ये उलझे हुए रिश्ते कभी सुलझने की कोशिश में तो कभी मुक्त होने की छटपटाहट लिए हुए दिखायी देते हैं। मोहन राकेश का यह नाटक इन सम्बन्धों का एक सटीक चित्र प्रस्तुत कर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को समझने का एक सफल प्रयास करता है।

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चित्र श्रेय: Rangayan.in

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Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

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