आज का एकलव्य

ए महाभारत के द्रोणाचार्य!
तुमने आज पुनः गुरु-दक्षिणा का ढोंग रचा है
लेकिन मैं हूँ एकलव्य आज का
सदियों पुराना नहीं
तुम्हारी नस-नस से परिचित हो चुका हूँ मैं
तुम आज तक इसलिए महिमा-मंडित हो
कि गुरु-दक्षिणा की आड़ में-
उस भोले-भाले बालक का अंगूठा
इसलिए हाथ से उड़वा लिया था कि
तुम्हारे साधे हुए घोड़ों को कोई
जमीन न सुंघा दे

और तुम्हारा तेज सदा के लिए
मलिन न हो जाए
मैं तुम्हारे बुद्धि-चातुर्य को
पहचान चुका हूँ
सदियों की तरह आज भी
मेरे कर्मठ हाथों का कर्मठ अंगूठा
तुम्हारी आंखों का तिनका है
तुम्हारी सर्प-दृष्टि
मैं आज भी भूला नहीं
उस समय की तुम्हारी जहरीली मुस्कान
आज तक मेरे सीने में धंसी हुई है

मैं जानता हूँ कि
जब मेरा यह कर्मठ अंगूठा
तुम्हारे हाथ में होगा
मेरा नाम
इतिहास के शूरवीरों में नहीं होगा
तब मेरी हर कलाकृति
तुम्हारी होगी
शरीर मेरा तपेगा
चेहरा तुम्हारा दमकेगा
और मैं हमेशा की तरह
इतिहास के पन्नों से
गधे के सींग की तरह नहीं मिलूंगा

तुम्हारे महलों की नींव में
दफन हो जाऊंगा सदा के लिए

लेकिन याद रख
यह काठ की हांडी तुम्हारी
फिर नहीं चढ़ेगी आग पर
कहानी वही होगी
अंगूठा भी वही होगा
और तुम्हारी मांग भी वही होगी
तुम्हें गुरु-दक्षिणा से इंकार न होगा
तुम्हें गुरु-दक्षिणा मिलेगी
अवश्य मिलेगी
लेकिन अंगूठा ‘कटवा’ कर नहीं
अंगूठा ‘दिखा’ कर।