‘आख़िरी बातचीत’ – लू शुन

पिताजी बहुत मुश्किल से ही साँस ले पा रहे थे। यहाँ तक कि उनकी सीने की धड़कन भी मुझे सुनाई नहीं दे रही थी। मगर अब शायद ही कोई उनकी कुछ मदद कर सकता था। मैं बार-बार यही सोच रहा था कि अच्छा हो, यदि वे इसी तरह शान्तिपूर्वक परलोक चले जाएँ। पर तभी अचानक मुझे लगा कि मुझे इस तरह की बातें नहीं सोचनी चाहिएँ। मुझे ऐसा लगने लगा मानो मैंने इस तरह की बात सोचकर कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। लेकिन तब न जाने क्यों मुझे यह भी लगता था कि अपने मरते हुए पिता की शान्त-मृत्यु की कामना करना कोई ग़लत बात भी नहीं है। आज भी मुझे यह बात ठीक लगती है।

उस दिन सुबह-सुबह हमारे घर के अहाते में ही रहने वाली श्रीमती येन हमारे पास आईं और पिता की हालत देखकर उन्होंने पूछा कि अब हम किस चीज़ का इन्तज़ार कर रहे हैं। अब समय बरबाद करने से क्या फ़ायदा। श्रीमती येन के कहने पर हमने पिता के कपड़े बदले। उसके बाद नोट और कायांग-सूत्र जलाकर उनकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना की। फिर उस राख को एक कागज़ में लपेटकर वह पुड़िया उनके हाथ में पकड़ा दी।

“उनसे कुछ बात करो!”, श्रीमती येन ने कहा- “तुम्हारे बाबूजी का आख़िरी समय आ पहुँचा है। जल्दी से उनसे बात कर लो।”

“बाबूजी! बाबूजी! मैंने उन्हें पुकारा।”

“ज़ोर से बोलो। उन्हें तुम्हारी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ रही। अरे भाई, जल्दी करो, तुम ज़ोर से नहीं बोल सकते क्या?”

“बाबूजी! बाबूजी! मैंने फिर से कहा। अब की बार थोड़ा ज़ोर लगाकर।”

उनके चेहरे पर पहले जो थोड़ी-बहुत शान्ति दिखाई दे रही थी, वह गायब हो गई थी। अब फिर से उनके चेहरे पर पीड़ा छलकने लगी थी। बेचैनी के साथ उनकी भौंहों में हल्की-सी थरथरहाट हुई।

“उनसे बात करो कुछ”, येन ने फिर से कहा- “जल्दी करो…अब समय नहीं है!”

“बाबूजी!!!”, मैंने बड़ी कातरता से कहा।

“क्या बात है?…चिल्ला क्यों रहे हो?”

यह उनकी आवाज़ थी। एकदम मद्धम और धीमी। वे फिर से छटपटाने लगे थे। वे फिर से साँस लेने की कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद ही वे फिर से पहले की तरह शांत हो गए।

“बाबूजी!!!”, इस बार मैं तब तक उन्हें बुलाता रहा, जब तक कि उन्होंने आख़िरी साँस न ले ली।

अपनी वह कातर और मार्मिक आवाज़ मैं आज भी वैसे ही सुन सकता हूँ। और जब भी मैं अपनी वे चीखें सुनता हूँ, मुझे लगता है कि वह मेरे जीवन की शायद सबसे बड़ी ग़लती थी।

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