आँधी

आँधी जब आती है
बदल जाता है धरती-आसमान का रंग
बदल जाता है पेड़-पौधों और मनुष्यों का रूप
चला जाता है सबके चेहरो का नूर
शरीर के साथ आत्मा तक ज़मा हो जाती है ढेर सारी धूल

आँधी जब भी आती है
कर देती है बहुत कुछ इधर का उधर

आँधी में चला जाता है अनवर का कोट राधा के आँगन में
और वहीं फँस कर रह जाता है दीवार पर लगे तारों में।

आँधी में ही चला जाता है मोहन का रूमाल
शबीना की छत पर
और उलझ जाता है बुरी तरह टीवी के एंटीने में।

आँधी में चला जाता है कवि का मन
कहीं दूर बसे अपने प्रिय के पास
और वहीं ठहर जाता है, आँधी के थम जाने तक।
जब वह वापस आता है
तब उसके साथ में आती है कविता।

कविताएँ कवि-मन में चलने वाली आँधी की बेटियाँ हैं।