आवाज़ें

मैंने देखा
कहीं दूर से आवाज़ों को
आते
कहीं दूर तक जाते

मैंने देखा
वो एक तरफ से आतीं
एक तरफ को जातीं

उनका आना जाना
तब भी चलता
जब रुक जायें हवाएँ
या सूरज ढल जाए
कोई ढक ले कानों को
या कर ले बंद मकानों को

फिर सोचा मैंने
आवाज़ें बाहर नहीं, शायद
अंदर है कहीं
और हमें कानों को नहीं
बल्कि ढकना होगा
अपने अंदरखानो को!