आज बात करते हैं ‘तख़ल्लुस’ की – तसनीफ़ हैदर

तख़ल्लुस असल में ऐसे नाम को कहते हैं जिसे शायर अपनी ग़ज़ल के मक़्ते (आख़री शेर) में बतौर सिग्नेचर इस्तेमाल करता है। जैसे ये शेर देखिये-

हमने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब
मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है

इसमें ग़ालिब शायर का नाम है और उसी को तख़ल्लुस कहते हैं। तख़ल्लुस की रस्म ईरान से चली थी, उर्दू के एक बड़े अच्छे स्कॉलर थे, सय्यद अब्दुल्लाह। उन्होंने इस पर शानदार आर्टिकल लिखा था, जिसमें बहुत काम की बातें थीं। ये रस्म पहले क़सीदे से शुरू हुई। क़सीदे के बारे में ठीक से कभी और बताएँगे, अभी बस इतना समझिये कि ये बादशाहों की तारीफ़ में लिखी जाने वाली एक लम्बी सी नज़्म हुआ करती थी। अब होना ये शुरू हुआ कि एक शायर ग़रीब ने किसी बादशाह के बारे में कुछ लिखा, उसी को याद करके दूसरे शायर ने किसी दूसरे बादशाह के सामने पढ़ कर उससे ईनाम-विनाम हासिल कर लिया। अब पुराने शायरों की तो रोज़ी रोटी ही ज़्यादातर दरबारों से चलती थी, इस तरह क़सीदे चोरी होने लगे तो प्रॉब्लम हो सकती थी। क्यूंकि ईनाम हासिल करने के लिए क़सीदों को बड़ी मुश्किल से लिखा जाता था, बादशाह ज़्यादातर पढ़े लिखे होते थे (यानी आज कल के शरीफ़ पॉलिटिशियन्स की तरह जाहिल नहीं थे) इसलिए ज़बान और बयान के नाज़ुक मामलों को बहुत अच्छी तरह समझते थे। यही वजह थी कि एक क़सीदा लिखने में शायरों को बहुत समय और दिमाग़ खपाना पड़ता था। इसलिए ये तय हुआ कि अब जो शायर क़सीदा लिखे, अपना नाम भी उसमें शामिल कर दे, इससे एक फ़ायदा तो ये होगा कि लोग जब इसे याद करेंगे तो उन्हें ख़ुद ब ख़ुद पता चल जाएगा कि ये किस शायर का कलाम है, दूसरे ये कि शोहरत हो जाती तो अच्छे क़सीदे सुन कर दूसरे दरबारों से शायर को बुलावे आने लगते और उसके दिन फिर जाते। ग़ज़ल क़सीदे के बीच में कही जाती रही थी, इसलिए उसमें भी ये रिवायत या परंपरा शामिल हो गयी।

मगर ग़ज़ल हो या क़सीदा, तख़ल्लुस का बस इतना सा फ़ायदा नहीं था। इससे शायरों को उनकी मज़हबी पहचान से छुटकारा मिलता था। आप एक सिरे से सिर्फ़ आज से दो सौ, तीन सौ साल पुराने उर्दू शायरों के तख़ल्लुस देखते जाइये, पुरानी किताबें खंगाल डालिये, आपको मालूम होगा कि ऐसे तख़ल्लुस जिनसे कोई मज़हबी पहचान झलकती हो बहुत कम या ना के बराबर हैं। वली, मीर, उज़लत, सौदा, क़ायम, सिराज, ताबां, मुसहफ़ी, इंशा, जुरअत, दर्द और ग़ालिब से हाली, हाली से दाग़ और दाग़ से इक़बाल तक यही मामला है। आप मोमिन का नाम लेंगे तो मैं कहूंगा कि उन्होंने अपनी शायरी से बिलकुल दूसरा काम लिया, इस शेर से सिर्फ़ इशारा कर रहा हूँ-

उम्र सारी तो कटी इश्क़ ए बुताँ में मोमिन
आख़री वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे

और फिर मोमिन का तो मतलब भी ईमान रखने वाला होता है, यानी सच्चा और ईमानदार, उसका किसी धर्म विशेष से कोई तअल्लुक़ नहीं है। मैंने अब तक तो अपनी नज़र से किसी भी किताब में ‘मुस्लिम’ या ‘हिन्दू’ तख़ल्लुस वाला कोई शायर नहीं देखा है। आज हम जिस आइडेंटिटी की जंग वाले दौर में जी रहे हैं, वहां उर्दू ग़ज़ल की ये रिवायत हमें समझाती है कि पहचान के चक्कर से आर्टिस्ट ख़ुद कैसे निकले और दूसरों को कैसे निकलवाए। अब तो लोग शायरी में तख़ल्लुस नहीं इस्तेमाल करते (मैं ख़ुद इसे इग्नोर करता रहा हूँ) मगर हर पुरानी चीज़ बुरी नहीं होती। आख़िर में इतना बताता चलूँ कि फ़ारसी की एक डिक्शनरी ‘लुग़त ए किशोरी’ के हिसाब से तख़ल्लुस का एक मतलब छुटकारा या बचाव है। और सच में ये रस्म हमें नाम और ज़ात-पात के पैदा किये गए बहुत से झगड़ों से दूर ला खड़ा करती है, इंसान बनाती है, एक सोचने वाला ज़िंदा इंसान।

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