भाषाओं को
भावनाओं को
आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए
खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

यह ब्लॉग, दो ऐसे लोगों, जो कविताओं और साहित्य में खुद को ढूँढने में प्रयासरत हैं, उनकी एक दिन की सनक का सामान्य सा परिणाम है। लेकिन प्रयास रहेगा कि यह सनक हमारे पाठकों के लिए समय बर्बादी का कारण न बने। इसलिए कोशिश रहेगी कि इस ब्लॉग पर प्रकाशित साहित्य और कला से जुड़ी सभी पोस्ट्स, समीक्षाओं, कविताओं, गद्य और अनुवाद इत्यादि में ऐसी बातें पेश की जाएँ जिनसे न केवल हमारे पारंपरिक और विस्तृत साहित्य के कुछ अंश को समझा जा सके, साथ ही समकालीन, हमारे आस-पास ही कार्य करते हमारे साथियों के प्रयासों की भी बातें की जा सकें। और इस प्रक्रिया में यदि अपनी कृतियों के माध्यम से मन में वक्त-बेवक्त उठती बेचैनियाँ भी कुछ शांत कर पाएँ, तो वह बोनस रहेगा।

काव्य और गद्य भागों में अभी ब्लॉगर्स की रचनाओं के साथ कुछ पसंदीदा लेखकों/कवियों की ही रचनाएँ रखी गयी हैं, ये भाग आने वाले समय में आवश्यकतानुसार विकसित किए जाएँगे।

पाठकों को, किसी भी क्षण यदि ऐसी कोई बचकानी हरकत दिखायी दे, जो सामाजिक और नैतिक स्तर पर ग़लत न भी हो, लेकिन सही के खाने में भी फिट न होती हो, तो सोशियल मीडिया के किसी भी माध्यम द्वारा हम तक पहुँचाने में संकोच न करें.. अभी सीख ही रहे हैं। आपका साथ ज़रूरी है।

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