सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ प्रयोगवाद के कवि थे और अपने समकालीन कवियों से काफी अलग। उनकी कविताएँ और यहाँ तक कि कहानियाँ भी मनुष्य के बाहरी संघर्षों से साथ-साथ उसके आंतरिक द्वंद्वों को एक मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रकट करती हैं। यही कारण है कि उनकी कविताओं को समझने के लिए एक सामान्य हिन्दी पाठक को थोड़ा श्रम करना पड़ता है। किन्तु उनकी कविताएँ पढ़ने के बाद यह श्रम वाजिब भी महसूस होता है।

आज अज्ञेय’ का जन्मदिवस है और इस अवसर पर पोषम पा पर प्रस्तुत हैं उनके कविता संग्रह ‘क्योंकि मैं उसे जानता हूँ’ से पांच कविताएँ। ये कविताएँ प्रेम के अप्रत्यक्ष रूपों से लेकर आजादी के बाद आयी वैचारिक दासता तक की बातें करती हैं। अगर आपने ‘अज्ञेय’ को कभी न पढ़ा हो, तो इन कविताओं से उनको पढ़ने की शुरुआत की जा सकती है।

वेध्य

पहले
मैं तुम्हें बताऊँगा अपनी देह का प्रत्येक मर्मस्थल
फिर मैं अपने दहन की आग पर तपा कर
तैयार करूँगा एक धारदार चमकीली कटार
जो मैं तुम्हें दूँगा
फिर मैं
अपने दक्ष हाथों से तुम्हें दिखाऊँगा
करना वह कुशल, निष्कम्प, अचूक वार
जो मर्म को बेध जाय
मुझे आह भरने तो क्या
गिरने का भी अवसर न दे
मैं वह भी न कह पाऊँ
जो कहने की यह भूमिका है-
अवाक् खड़ा रह जाऊँ
जब तक कोई मुझे
भूमिसात् न कर दे।
नहीं तो और क्या है प्यार
सिवा यों अपनी ही हार का अमोघ दाँव किसी को सिखाने के-
किसी के आगे
चरम रूप से वेध्य हो जाने के?


रात : चौंध

रात एकाएक टूटी मेरी नींद
और सामने आयी एक बात
कि तुम्हारे जिस प्यार में मैं खोया रहा हूँ,
जिस लम्बी, मीठी नशीली धुन्ध में
मैं सब भूल कर सोया रहा हूँ,
उस की भीत जो है
वह नहीं है रति
वह मूलतः है पुरुष के प्रति
नारी की करुणा।
अगाध, अबाध करुणा,
फिर भी-राग नहीं, करुणा।
नहीं, नहीं, नहीं!
ओ रात!
प्रात का और कुछ भी सच हो
पर इस से तो अच्छा है
जागते ही जागते
आग की एक ही धधक में
जल कर मरना!


औपन्यासिक

मैं ने कहा : अपनी मनःस्थिति
मैं बता नहीं सकता। पर अगर
अपने को उपन्यास का चरित्र बताता, तो इस समय अपने को
एक शराबखाने में दिखाता, अकेले बैठ कर
पीते हुए-इस कोशिश में कि सोचने की ताक़त
किसी तरह जड़ हो जाए।

कौन या कब अकेले बैठ कर शराब पीता है?
जो या जब अपने को अच्छा नहीं लगता-अपने को
सह नहीं सकता।

उस ने कहा : हूँ! कोई बात है भला? शराबखाना भी
(यह नहीं कि मुझे इस का कोई तजुरबा है, पर)
कोई बैठने की जगह होगी-वह भी अकेले?
मैं वैसे में अपने पात्र को
नदी किनारे बैठाती-अकेले उदास बैठ कर कुढ़ने के लिए।

मैं ने कहा : शराबखाना
न सही बैठने के लायक जगह! पर अपने शहर में
ऐसा नदी का किनारा कहाँ मिलेगा जो
बैठने लायक हो-उदासी में अकेले
बैठ कर अपने पर कुढ़ने लायक?

उस ने कहा : अब मैं क्या करूँ अगर अपनी नदी का
ऐसा हाल हो गया है? पर कहीं तो ऐसी नदी
ज़रूर होगी?

मैं ने कहा : सो तो है-यानी होगी। तो मैं
अपने उपन्यास का शराबखाना
क्या तुम्हारे उपन्यास की नदी के किनारे
नहीं ले जा सकता?

उस ने कहा : हुँ! यह कैसे हो सकता है?

मैं ने कहा : ऐसा पूछती हो, तो तुम उपन्यासकार भी
कैसे बन सकती हो?

उस ने कहा : न सही-हम नहीं बनते उपन्यासकार।
पर वैसी नदी होगी
तो तुम्हारे शराबखाने की ज़रूरत क्या होगी, और उसे
नदी के किनारे तुम ले जा कर ही क्या करोगे?

मैं ने ज़िद कर के कहा : ज़रूर ले जाऊँगा! अब देखो, मैं
उपन्यास ही लिखता हूँ और उसमें
नदी किनारे शराबखाना बनाता हूँ!

उस ने भी ज़िद कर के कहा : वह
बनेगा ही नहीं! और बन भी गया तो वहाँ तुम अकेले बैठ कर
शराब नहीं पी सकोगे!

मैं ने कहा : क्यों नहीं? शराबखाने में अकेले
शराब पीने पर मनाही होगी?

उस ने कहा : मेरी नदी के किनारे तुम को
अकेले बैठने कौन देगा, यह भी सोचा है?

तब मैं ने कहा : नदी के किनारे तुम मुझे अकेला
नहीं होने दोगी, तो शराब पीना ही कोई
क्यों चाहेगा, यह भी कभी सोचा है?

इस पर हम दोनों हँस पड़े। वह
उपन्यास वाली नदी और कहीं हो न हो,
इसी हँसी में सदा बहती है,
और वहाँ शराबखाने की कोई ज़रूरत नहीं है।


केले का पेड़

उधर से आये सेठ जी
इधर से संन्यासी
एक ने कही, एक ने मानी-
(दोनों ठहरे ज्ञानी)
दोनों ने पहचानी
सच्ची सीख, पुरानी :
दोनों के काम की,
दोनों की मनचीती-
जै सियाराम की!

सीख सच्ची, सनातन
सौटंच, सत्यानासी।
कि मानुस हो तो ऐसा…
जैसा केले का पेड़
जिस का सब कुछ काम आ जाए।
(मुख्यतया खाने के!)
फल खाओ, फूल खाओ,
धौद खाओ, मोचा खाओ;
डंठल खाओ, जड़ खाओ,
पत्ते-पत्ते का पत्तल परोसो
जिस पर पकवान सजाओ :
(यों पत्ते भी डाँगर तो खाएँगे-गो माता की जै हो, जै हो!)
यों, मानो बात तै हो :
इधर गये सेठ, उधर गये संन्यासी।
रह गया बिचारा भारतवासी।

ओ केले के पेड़, क्यों नहीं भगवान् ने तुझे रीढ़ दी
कि कभी तो तू अपने भी काम आता-
चाहे तुझे कोई न भी खाता-
न सेठ, न संन्यासी, न डाँगर-पशु-
चाहे तुझे बाँध कर तुझ पर न भी भँसाता
हर असमय मृत आशा-शिशु?
तू एक बार तन कर खड़ा तो होता
मेरे लुजलुज भारतवासी!


जनपथ-राजपथ

राष्ट्रीय राजमार्ग के बीचो-बीच बैठ
पछाहीं भैंस
जुगाली कर रही है :
तेज़ दौड़ती मोटरें, लारियाँ,
पास आते सकपका जाती हैं,
भैंस की आँखों की स्थिर चितवन के आगे
मानो इंजनों की बोलती बन्द हो जाती है।
भैंस राष्ट्रीय पशु नहीं है।
राष्ट्रीय राजमार्ग, प्रादेशिक पशु :
योजना आयोग वाले करें तो क्या करें?
बिचारे उगाते हैं
आयातित रासायिनक खाद से
अन्तर्राष्ट्रीय करमकल्ले।



Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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