अक्स-ए-चाँद

ख़ुद को नाशाद करने का हुनर
शौक़ से तो नहीं आता,
तहज़ीब भी बेख़ुदी की
किसी शऊर की मोहताज नहीं,
बेकसी से ताअल्लुक़ कोई यूँ नहीं रखता,
बेज़ारी शेवा तो नहीं बनती
एक पल में,
तबियत इतनी बेनियाज़ न दिखती है कभी
मेरी हमनशीं-
मैं तुम्हारा चारागर न बन सकूँ शायद
मेरे हमदर्द बने रहने में
तुम्हें कोई शिकवा न हो बस
तो तुम्हारे माथे की शिकन को
होंठों की मुस्कान में तब्दील करने का जिम्मा,
मैं शौक़ से लूँगा
इससे पहले कि तुम हलकान हो,
उन थकावटों को मेरी आग़ोश सोख लेगी
बस फिर क्या-
लबों से मुतअल्लिक़ सिर्फ़ बोसे नही होंगें
रूह भी मक़सूद होगी
और तब सब कुछ शाद हो जायेगा गोया,
ख़ैर,
आज चाँद ज़र्द था
और आधा भी
जैसे तुम्हारे चेहरे की आज़ुर्दगी
और ज़ीस्त के अधूरेपन को ख़ुद बाँट रहा हो।