अक्षय अक्षर’ – मद्दूरू श्रीनिवासुलु

अनुवाद: डॉ. एस. ए. सूर्यनारायण शर्मा

अक्षर
उपजता है बीज-सा,
शब्द-टहनियों में
पल्लवित होता है कोंपल-सा,
खिल उठता है फूल-सा।

अक्षर
गूँज उठता है
मृदंग नाद-सा,
जनता के मुक्तकंठ से
निःसृत निनाद-सा।

अक्षर
प्रकट होता है
प्रथम रश्मि-सा
पृथ्वी के वक्ष पर
प्रथम स्पर्श-सा।

अक्षर
कविता बन जाता है
ज्यों कलिका बन जाती है फूल,
अक्षर
बनता है काव्य
ज्यों फूल बन जाता है फल

अक्षर अक्षर से मिलकर
शब्द-प्लावन बन जाता है
अक्षर अक्षर से मिलकर
क्रान्ति की आँधी बन जाता है
अक्षर हिमाचल बन जाता है
और अक्षय बन
टिक जाता है।

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निःसृत- बाहर आया हुआ; निनाद- ज़ोर की आवाज़; प्लावन- सैलाब।