अमावास का चाँद

पूर्णिमा से चाँद घटते-घटते
अमावस तक दिखना बंद कर देता है।
पर बस दिखना बंद करता है।
अपना अस्तित्व नहीं खोता।
हम पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं,
उसके मौजूद होने को लेकर
और एक बार फिर आकाश में
खिलने के बारे में।
धीरे-धीरे ही सही…
पर हम इन्तज़ार करते हैं,
उस पूरे चाँद का।
ये जानते हुए भी,
कि फिर एक दिन उसे खो जाना है आकाश में
अमावस के चाँद की तरह।
कुछ ऐसा ही है हमारा प्रेम भी।
ठीक अमावस के चाँद की तरह।