अंधा शख़्स

एक अंधा शख्स निकला हुआ है,
किसी आँख वाले का खून करने।
वो उसे मिटा देना चाहता है अपने अस्तित्व से।
वो छीनना चाहता है उससे वो हर अधिकार,
जिसके आधार पर वो आँख वाला क़ौम का राजा बना फिरता है।
क्यूं बना है वो राजा?
क्यूं उसके पास ये विशाल ताकत है?

वो जो चाहे वो कर सकता है।
वो चाहे तो आसमान में सुराख कर सकता है,
जमीनें हिला सकता है।
खुशियाँ छीन सकता है वो लोगों की,
वो ग़रीबों को और भी ग़रीब बना सकता है
मजबूर कर सकता है वो लोगों को ज़हर पीने के लिए,
या फाँसी का फंदा टांग कर लटक जाने के लिए
लोगों के घर बार उजाड़ सकता है वो,
और ये सारा जहान तहस-नहस कर सकता है।

वो अगर चाहे तो ज़माना खुशियों से भी भर सकता
बैर मिटा सकता है,
जहां के सारे मक़तल को गुलिस्तां में तब्दील कर सकता है।
वो अगर चाहे तो हर रोने वाला हस दें,
हर वो शख्स जिसके जिंदगी में ग़म है,
उसकी जेबें खुशियों से भर दे।
मगर वो ये सब नहीं करता।

वो बस वही करता है जिससे तकलीफ़ होती है लोगों को।
उसके कर्मों का अंजाम दर्दनाक होता है,
देखा नहीं जाता,
हां, देखा नहीं जाता।
वो अंधा शख्स अंधा नहीं है,
उसने एक काले रंग की मोटी पट्टी बांधी है अपनी आँखों पर,
जिससे कुछ दिखाई नहीं देता, ना सही ना गलत।
वो शख्स बड़ा खुदगर्ज़ है।
वो बस अपनी आँखों पर बंधी हुई मोटी पट्टी खोलना चाहता है,
और फिर से निहारना चाहता है ये जहान,
लेकिन ये तभी मुमकिन है,
जब वो खून कर दे उस ताकतवर आँखवाले इंसान का।