अंकिता वर्मा की कविताएँ

अंकिता वर्मा हिमाचल के प्यारे शहर शिमला से हैं। तीन सालों से चंडीगढ़ में रहकर एक टेक्सटाइल फर्म में बतौर मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव काम कर रही थीं, फिलहाल नौकरी छोड़ कर किताबें पढ़ रही हैं, लिख रही हैं और खुद को खोज रही हैं। आज पोषम पा पर पढ़िए अंकिता की कुछ कविताएँ और काव्यात्मक गद्य जिनमें प्रेम और जीवन के रहस्यों को समझने की ललक भी है और उन रहस्यों की गलियों में बेबाकी से घूमने का हौसला भी! 

अंकिता से ankitavrmaa@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है!

Fiction

मैं एक युग से इस भ्रम में जीती आयी हूँ कि,
जीवन यात्रा में मैं आकांक्षाओं के पंखों पे सवार हूँ,
पर असल में आकांक्षाएँ तो पानी के बुलबुलों की तरह होती है,
जो यथार्थ की एड़ियों में छालों के भांति भिक से फ़ट जाती हैं,
पैदल चलना आखिर क्या है, यह तब ज्ञात होता है।

एक पहाड़ पर चढ़ने और उतरने के बीच केवल एक ही अंतर है,
चढ़ना अगर एक fiction जैसा है,
तो वहीं उतरना उस fiction को लिख रहे लेखक जैसा,
मैं निश्चय नहीं कर पा रही हूँ कि मैं fiction के भीतर बैठी कल्पना हूँ या उससे बाहर निकला हुआ एक काल्पनिक पात्र?

बुरांश

तुम मुझे कोई फूल कहते थे,
पर कौनसा?
यह तुमने मुझपर छोड़ दिया कि मैं कौनसा फूल हूँ,
मैंने बुरांश को चुना,
तुमने पूछा क्यों?
मैंने कहा क्यों नहीं,
और तुम हंस बैठे।
एक बुरांश को तुमने मेरी टहनी से तोड़ कर अपने बालों में ठूंसा दिया,
मैं खिल उठी,
फूल के मानिंद।

उल्कापिंड के गीले-गीले दीप

वह कौन से ऐसे पल होते हैं जो हमारी आंखों में भर देते हैं विश्वास के आँसू और जहाँ जबरन चिपका दिए जाते हों तालू और जीभ के बीच की सुरंग में दोपहरी के भर्राए-से कुछ अलसाये स्मृतिगीत।

वह कौन सी ऐसी रातें होती हैं जब आँख लगी हो गहरी और स्लेट की छतों पर गिरते हों उल्कापिंड के गीले-गीले दीप, तुम रो देते हो एक पराये देश में, सोचते हो कि बाहर गिरता होगा पानी।

वह कौन सी ऐसी सुबहें होती हैं जब सूरज और चाँद हों बादलों की रज़ाई में लिपटे पड़े और उनके नीचे हो फैली इंद्रधनुषी चादर और तुम्हें हो भ्रम सूर्योदय की सांझ में, तीन लोमड़ियां हो तुमसे बातें कर रही।

उदासीन गीत

मैंने एक उदासीन गीत लिखना चाहा है,
तुम पढ़ोगे? तुम कहोगे, “गीत तो अनुराग भरा भी लिख सकती थी तुम”,
तो मैं कहूंगी, “हाँ लिख तो सकती थी, पर मैं केवल लिखना नहीं चाहती, मैं उकेरना चाहती हूँ” तुम पूछोगे, “किस चीज़ को?” तो मैं कहूंगी, “उस मौन को जो एक पुरानी हवेली की नई खिड़की से बारिश की बूंदों को नृत्य करते देखता रहता है। वह जानता है कि उसे प्रेम है, पर आदी है घर में बिखरी उदासी का।
बारिश तो अंततः लौट ही जाती है, और छोड़ जाती है पतझड़ का विरक्त एकाकीपन, और रह जाती है तो वही पुरानी बिखरी उदासी।
तुम ढूँढना! बर्फ़ की मौनता की परतों के नीचे तुम्हें मिलेगी ठंडी उदास देह।
तुम छू लेना उसे, सहलाना उसे बड़े प्रेम से, उसके बालों को, उसके नीले पड़े होठों को, उसके सुकड़े स्तनों को, चूम लेना उसकी पीठ पर उकेरी गई उस विचित्र लिपि को, लिखना उंगलियों से कोई कविता उसके नितंबों पर, बोना गुलमोहर के फूल जांघो की मिट्टी के अंदर, तुम्हें मालूम पड़ेगा कि मौनता की परतों के नीचे बैठी उस उदास ठंडी देह के भीतर पकेंगे मीठे-मीठे फूल। तुम तोड़ लेना उन्हें, चाहो तो तोड़ लेना एक पूरा गुलदस्ता, और सजा लेना उन्हें अपने कमरे के किसी फूलदान में। मुरझा कर जब वह अंतिम श्वास ले लें, तुम उकेर देना उन्हें किसी दीवाल पर, तुम्हें रह-रह कर याद आएगा उस उदासीन नंगी देह पर उकेरा हुआ स्निग्ध मौन।

तारिकाएँ

तारिकाओं की अपनी कोई अलग दुनिया है क्या?
यह जो शाम का एक सितारा आकाश की खिड़की से गुपचुप तरीके से धरती पर किसी को निहारता है,
वो मैं हूँ क्या?
उफ़्फ़! तुम मुझे narcissist का कोई प्रतिरूप अगर कहोगे, तो मैं कहूंगी,
ख़्याल बुरा नहीं है।

हताशा का अरण्य

हताशा का अरण्य बहुत ही घना होता है,
वहां का हर पेड़ एक-सी शक्ल का लगता है,
कोई अगर-अलग दिखता है तो वह हम खुद।
उस अरण्य के बीचोबीच से केवल एक ही सड़क गुज़रती है,
जिसके चौराहों पर पगडंडियों के पैर काट कर लटका दिए जाते हैं।

मैं हताश हो जाती हूँ, हाँ! पर नाउम्मीद नहीं,
दोनों में अंतर समझती हूँ,
इसलिए एक उम्मीद लिए चल देती हूँ नंगे पैर,
किसी और अरण्य की ओर।

फ़िर जब बहुत दिनों तक चलते-चलते पैरों के छालों से फफूँद पिचक आती है,
तब जो पहला खंडहर दिखता है उसकी छांव की ओट में किसी नवजात सी लेट जाती हूँ।

जाग खुलती है तो आभास होता है मैं कितना मीठा सोई,
धूप, पेड़ों की छाननी से छनकर मेरे बदन पर जब गर्म चाय सी गिरती है तब,
हर जगह जंगली मशरूमों के मुहांसे फूट आते हैं।

मैंने एक अंतिम बार अपने पैरों की ओर नज़र दौड़ाई,
फफूँद की धरती पर नन्हे अंकुर उग आए थे,
उम्मीद के अरण्य का उदय हो चला था,
एक गहरी लंबी सांस लेकर मैंने आंखें मीच ली,

शायद फ़िर क्या पता एक दिन मैं हताशा का अरण्य ढूँढने निकल जाऊँ।

Dejavu

यह रात कितनी भरी-भरी सी है,
जैसे हो पतझड़ में गिरती उबासी।
पास खड़े लैंप पोस्ट पर बैठा एक पपीहा गाता है कोई धुन्दला सा गीत,
स्मृतियाँ झट से आ गिरती है टोकरों में जैसे गिरते हैं लदे पेड़ों से मीठे आड़ू,
मैं गुनगुनाती हूँ पपीहे के साथ अपने गाँव का वह भादों वाला साँवला गीत।

धूप तेज़ है,और मैं बैठ जाती हूँ आड़ू के पेड़ की ओट में,
फुनगियों पर घोंसलों में रहते है चिड़ियाँ के नन्हे चूज़े,
करते है मुझसे ढेरों बातें,
चढ़ना चाहते है वह एक दिन धौलाधार के पहाड़ और कूदना चाहते है सबसे शिखर से।

आड़ू की मीठी सुगंध करती है जैसे कोई मादक नशा,
सो जाती हूँ मैं किसी स्वप्न के भीतर और देखती हूँ स्वप्न के अंदर खुलता एक और स्वप्न,
जाग खुलती है तो उसी लैंप पोस्ट पर बैठा पपीहा गा रहा होता है वही धुन्दला सा गीत,
छल नहीं तो होगा यह dejavu,
हमने जी रखा है शायद अपना आज पहले भी और कहीं,
बहुत बार!
सुदूर, किसी दूसरे लैंप पोस्ट पर बैठकर शायद अब पपीहा और चूज़े मिलकर गाते होंगे कोई नए-नए गीत।

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