अंकुश कुमार की कविताएँ

वक्त

वक्त रुक कर चल रहा है
मेरे बीच से गुज़रते हुए,
मैं देखता हूँ
कि कई सदियाँ गुज़र गयी हैं मुझसे होकर
मेरे समूचे अस्तित्व में
कोयले की कालिख लगी है
और वो षडयंत्र जो रचे गये महाभारत काल में
वो अब भी मेरा पीछा कर रहे हैं।

मेरे शरीर पर जम गये हैं चकत्ते वक्त के
आप देखेंगे तो पायेंगे
उनमें से आती है गंध
आदिमानव द्वारा जलायी गयी आग पर
भूने हुए मांस की।

जैसे-जैसे ये वक्त आगे बढ़ता जायेगा
मुझसे फूटने लगेंगी कोंपले आधुनिकता की
मैं सशरीर एक पेड़ बन जाऊँगा
एक बीज से फूटकर
और एक दिन जब मैं अपनी वृद्धावस्था में
आ जाऊँगा तो मुझे उखाड़ दिया जायेगा जड़ समेत
और फिर कर दिया जायेगा राख मुझे जलाकर
और जो कोयला उत्पन्न होगा
उसकी कालिख मेरे मुँह पर पुती है,
मुझे डाल दिया जायेगा किसी भापगाड़ी के इंजन में
और आप ध्यान से सुनेंगे तो पायेंगे
कि
भाप गाड़ी के हॉर्न से मेरी आवाज आती है
दबी-दबी सी।

गिरगिट

कई बार मुझे ये मालूम होते हुए भी
कि मुझे लूटा जा रहा है
मैं लुट बैठता हूँ।
और कई बार मैं देखता हूँ अन्याय
अगर किसी जगह
तो चल देता हूँ किसी अलग रास्ते,
या फिर अगर बहुत जरूरी हो वहीं से जाना
तो मैं अपनी आँख और कान बंद करने की चेष्टा कर
वहाँ से निकल भागने की प्रक्रिया में लिप्त पाया जाता हूँ।

अगर निकल पड़ता हूँ, कभी किसी बेवकूफ की संगत में
जिसको सदियों पहले कहा जाता था ईमानदार व संवेदनशील
मैं उसको भी करता हूँ कोशिश
ख़ुद के जैसा बनाने की,
हालांकि पहले मैं भी हुआ करता था ऐसा ही
लेकिन मैंने ढाल लिया है ख़ुद को
इस दौर के हिसाब से
अब मैं भी गिरगिट की तरह
रंग बदलने में माहिर हूँ।

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