गुजराती कविता: ‘अपना तो’ – मफत ओझा

ये सब के सब जैसे-के-तैसे
सोफासेट, पलंग, कुर्सी, खिड़कियाँ, दरवाज़े, पर्दे
सीलिंगफैन, घड़ी की सुइयाँ- टक-टक और बन्द
अँधेरी दीवारों पर टँगा है ईश्वर
नश्वर पिता के फोटो की फ्रेम में मढ़ा हुआ।

स्विच के ऑन-ऑफ से अब कोई फ़र्क़ नहीं
अन्धकार की पीठ पर सवार रेगिस्तान बलबलाता दौड़ता है
दीवारों को अफ़सोस नहीं है इसका
कभी इनके पंख पत्थर के होते हैं
और कभी पानी के।

एक कमरे से दूसरे कमरे में
दूसरे से तीसरे कमरे में
कौन घूमता फिरता है? कमरा? एक दो और तीन?
या फिर सबके सब?

थिरकते हैं, थमते हैं, चरण-चिह्न पवन की पाँखों के
तड़फड़ाकर मर जाता है वन में जटायु
उड़ना, उड़ते रहना, उड़ते जाना
दीवार से दीवार तक
वित्ते भर की दूरी पर न होना
झपट्टा मारकर श्वास का डूब जाना
फिर ठीक सतह से उड़ना
या फिर बस ममी की भाँति जैसे-का-तैसा,
सतह पर बैठे रहना!

बीच में दीवार
दीवार के बीच में
बीच-बीच में; इसी भाँति
-ठिठुरे हुए अन्धकार की भाँति
उगना,
अरे भाई अपना तो… कहिए कि अपना तो यूँ है
आतम को उढ़ाकर मस्तक तक
अपना यह चोला लिये उड़ना है तो बस उड़ना ही है
जैसे का तैसा।

■■■

चित्र श्रेय: Cristina Gottardi


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

Leave a Reply

Related Posts

कविताएँ | Poetry

सिन्धी कविता: ‘कौन है’ – नामदेव

‘कौन है’ – नामदेव कौन है जो बन्दूक की नली से गुलाब को घायल कर रहा है? कौन है जो बन्सरी की चोट से किसी का सर फोड़ रहा है? कौन है जो बाल-मन्दिर की Read more…

कविताएँ | Poetry

नज़्म: ‘रस की अनोखी लहरें’ – मीराजी

‘रस की अनोखी लहरें’ – मीराजी मैं ये चाहती हूँ कि दुनिया की आँखें मुझे देखती जाएँ यूँ देखती जाएँ जैसे कोई पेड़ की नर्म टहनी को देखे लचकती हुई नर्म टहनी को देखे मगर Read more…

कविताएँ | Poetry

ख्यालों को बहने दो, बनके नदिया..

मुदित श्रीवास्तव की कविताएँ मुदित श्रीवास्तव भोपाल में रहते हैं। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और कॉलेज में सहायक प्राध्यापक भी रहे हैं। साहित्य से लगाव के कारण बाल पत्रिका ‘इकतारा’ से जुड़े Read more…

error:
%d bloggers like this: