और मैंने गढ़ा प्रेम

मैंने नींद माँगी थी
तुमने बदल दिया इसे
स्याह रातों के ख़ौफ़ में।
मैं प्रेम की नदी
बनकर बही
तुमने खड़ी कर दी
भूख की ऊँची दीवारें।
मैंने समर्पण कहा,
तुमने क्रांति कहा।
मैंने कहा-
सभ्यताओं को संवर्धित
करने के लिए क्यों न
रोप दूँ प्रेम का बीज,
तुमने उलाहना दिया
हत्याओं का…
आँखों से खून बहाया,
तुम सदी के महान कवि बने
और मैंने गढ़ा प्रेम।