बाईस गज में सिमटे चौबीस वर्ष

बाईस गज में सिमटे चौबीस वर्ष – जयप्रकाश चौकसे

चार्ली चैपलिन को बरसात बहुत पसंद थी क्योंकि उसमें आंसू लोगों को नहीं दिखाई देते। हॉलीवुड की ‘गुडबॉय अगेन’ में नायिका इन्ग्रिड बर्गमैन अपने प्रेमी से अंतिम बार मिलकर भरी दोपहर में कार से सफर करते समय गाड़ी के वाइपर्स स्विच ऑन करती है जो बरसात के समय काम आते हैं। इस दृश्य में वह डबडबाई आंखों से देखते हुए समझती है कि बाहर बरसात हो रही है। राजकपूर की ‘जोकर’ के एक शॉट में आंसू के मध्य से मुस्कान दिखाई गई है। स्टीवन स्पीलबर्ग की ‘ई.टी.’ में अंतरिक्ष का प्राणी पृथ्वी से विदा लेता है तो उसकी आंख में आंसू है। अगर हसरत लिखते हैं ‘आंसू मेरे दिल की ज़बान है’ तो शैलेन्द्र लिखते है ‘मर कर भी याद आएंगे, किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे’, और जयशंकर प्रसाद लिखते है, ‘जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई, दुर्दिन में आंसू बनकर वह आज बरसने आई’ और रवीन्द्रनाथ टैगोर शाहजहां के ताजमहल को देखकर कहते हैं ‘कि यह वक्त के गाल पर थमा हुआ आंसू है।’

शनिवार को वानखेड़े स्टेडियम से मैच समाप्त होते ही सचिन तेंदुलकर आखिरी बार पैवेलियन आते समय अपने आंसू रोकने का प्रयास कर रहे थे, अपने बाऊलर हैट के पीछे आंखें छुपाने की चेष्टा कर रहे थे, वे आंसू विरोधी की गेंद की तरह नहीं थे जिन पर सचिन का बस चलता। यह आंसू क्रिकेट प्रेमियों के लिए उनका शुकराना था। उनके हृदय में विगत तीस वर्षो का सारा दु:ख और आनंद इन आंसुओं के द्वारा अभिव्यक्त हो रहा था। खेल के आंकड़ों और जय पराजय के बहीखाते से खिलाड़ी का दर्द हम नहीं आंक सकते। इसका कैसे आकलन करेंगे कि इंग्लैंड के दौरे से सचिन अपने पिता की शवयात्रा में भाग लेने लौटे और चिता के ठंडा होने के पहले शेष दौरा पूरा करने इंग्लैंड लौटे। अपने काम को इस तरह निभाने को जीवन का धर्म कहते हैं। सड़कों पर हुड़दंग करना, चलते तमाशों को रोकना धर्म नहीं है। आज इस अंतिम मैच का हर क्षण यादों के धागों से बने गोले को खोलने और उनकी जुगाली का समय था। उनके मन में यह ख्याल भी आया होगा कि क्या अब वे दोबारा टेस्ट नहीं खेलेंगे? उनके जीवन के विगत ’24 वर्ष इन बाइस गजों में समाए थे’। सचिन का मन युधिष्ठिर की तरह होगा जब सारी जय-पराजय के पश्चात वे हिमालय चढ़ रहे थे और बंधु भी पीछे छूट रहे थे, साथ केवल कुत्ता चल रहा था जिसके बिना वे सशरीर स्वर्ग भी नहीं जाना चाहते थे। वह कुत्ता ही उनकी निष्ठा का प्रतीक था। तमाशबीन नहीं जान पाते कि कितने घाव कितने विश्वासघात, कितना दर्द छुपा होता है शिखर के रास्ते पर। क्रिकेट तो जीवन से भी निर्मम है जो सारा दिन अच्छा खेलने पर मात्र एक गलत शॉट के चयन से पराजित कर देता है जबकि जीवन हमें अनेक अवसर देता है। मात्र ग्यारह की उम्र में सचिन के पिता ने कहा था कि अपनी मंजिल की ओर जाते समय कोई शॉर्ट कट मत लेना। आज शॉर्ट कट के खिलाफ कुछ कहने वालों की संख्या बहुत कम हो गई वरन् शॉर्ट कट को राजपथ माना जाने लगा है। सचिन ने अपने मार्मिक भाषण में अपने माता पिता से लेकर अपने बचपन के साथियों तक को स्मरण किया और पत्नी अंजली के साथ अपनी वैवाहिक पारी को सबसे लम्बी और सार्थक माना। करिअर में कई बार नैराश्य ने घेरा तो पत्नी ने ही बिफरते मूड के भावनात्मक भार को झेला। सचिन ने वहां मौजूद राहुल द्रविड़ और लक्ष्मण का उल्लेख आदर से किया। अपने गुरु आचरेकर को आदर दिया जो बारह वर्ष के तेंदुलकर को शिवाजी पार्क से आजाद मैदान अपने स्कूटर पर ले जाते थे ताकि वह एक दिन में दो मैच खेल सके।

सचिन तेंडुलकर राहुुल द्रविड़ की तरह महत्वपूर्ण अपने खेल से ज्यादा जीवन को खेल की भावना से खेलने के लिए हैं। उन्होंने बल्ले का साथ नैतिक मूल्यों का निर्वाह किया यह बात उन्हें अन्य खिलाडिय़ों से अलग करती है। अनेक बार गलत आउट दिए जाने पर भी तेंदुलकर ने कोई आक्रोश नहीं दिखाया। गौरतलब है कि अपने धन्यवाद भाषण के दरमियान गला सूखने के कारण वे एक बोतल पानी पी गए क्योंकि ताउम्र उनके लिए उनका बल्ला ही बोलता था, मुँह आज पहली बार खोला।

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(प्रस्तुत लेख दैनिक भास्कर के ‘परदे के पीछे’ स्तम्भ में 18 नवम्बर 2013 को प्रकाशित हुआ था।)

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This Post Has 2 Comments

  1. पिछले करीब आठ सालों से जयप्रकाश चौकसे के दैनिक भास्कर में लिखे लेख को लगातार पढ़ रहा हूँ, और आज यह चंद पंक्तियाँ पढ़के मन के किसी कोने में छिपा आँसु आंखों तक आ ही गया ?

    1. सचमुच यह भावुक कर देने वाला है! और यह लेख भी उनके कॉलम ‘परदे के पीछे’ से ही है! 🙂

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