बालकवि बैरागी की बाल कविताएँ

बालकवि बैरागी की बाल कविताएँ

यह केवल पाठकों का ही नहीं, हिन्दी साहित्य का भी दुर्भाग्य है, कि हिन्दी के लेखक और कवियों को भारत का एक बड़ा वर्ग उनके निधन के बाद पढ़ना शुरू करता है। अपनी मृत्यु से वे ख़बरों में आते हैं और नए पढ़ने वाले इसे एक मौके की तरह देखकर उन्हें पढ़ना शुरू करते हैं। और विडंबना यह है कि इस असमय पठन को ठुकराया भी नहीं जा सकता।

बालकवि बैरागी जी भी दो दिन पहले हिन्दी साहित्य जगत को छोड़कर चले गए हैं! कुछ लोग भाग्यशाली होंगे जिन्होंने उन्हें साक्षात् सुना होगा और उनके जीवन और रचनाकाल में उन्हें पढ़ा होगा। जिन्हें यह अवसर नहीं मिल पाया, वे लोग उनकी बाल कविताओं से उन्हें पढ़ना शुरू कर सकते हैं। बेहद सरल और पठनीय कविताएँ जिन्हें आप अपने घर के छोटे बच्चों तक पहुँचा सकते हैं! 🙂

‘चाँद में धब्बा’

गोरे-गोरे चाँद में धब्बा
दिखता है जो काला काला,
उस धब्बे का मतलब हमने
बड़े मजे से खोज निकाला।
वहाँ नहीं है गुड़िया बुढ़िया
वहाँ नहीं बैठी है दादी,
अपनी काली गाय सूर्य ने
चँदा के आँगन में बाँधी।

‘खुद सागर बन जाओ’

नदियाँ होतीं मीठी-मीठी
सागर होता खारा,
मैंने पूछ लिया सागर से
यह कैसा व्यवहार तुम्हारा?
सागर बोला, सिर मत खाओ
पहले खुद सागर बन जाओ!

‘आकाश’

ईश्वर ने आकाश बनाया
उसमें सूरज को बैठाया
अगर नहीं आकाश बनाता
चाँद-सितारे कहाँ सजाता?
कैसे हम किरणों से जुड़ते?
ऐरोप्लेन कहाँ पर उड़ते?

‘चाय बनाओ’

बड़े सवेरे सूरज आया,
आकर उसने मुझे जगाया,
कहने लगा, ‘बिछौना छोड़ो
मैं आया हूँ सोना छोड़ो!’

मैंने कहा, ‘पधारो आओ,
जाकर पहले चाय बनाओ,
गरम चाय के प्याले लाना
फिर आ करके मुझे जगाना,
चलो रसोईघर में जाओ
दरवाजे पर मत चिल्लाओ।’’

‘विश्वास’

शाम ढले पंछी घर आते,
अपने बच्चों को समझाते।
अगर नापना हो आकाश,
पंखों पर करना विश्वास।
साथ न देंगे पंख पराए,
बच्चों को अब क्या समझाए?

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