‘बलराज साहनी का असंतोष’ – जयप्रकाश चौकसे

भारतीय सिनेमा का शताब्दी वर्ष अभिनेता बलराज साहनी का भी जन्म शताब्दी वर्ष है। उनका जन्म 1 मई 1913 को हुआ था। बलराज साहनी वामपंथी विचारधारा के व्यक्ति थे और इंडियन पीपुल्स थिएटर से जुड़े थे। मुंबई में वे अपने मित्र चेतन आनंद के घर रहते थे। इप्टा के एक नाटक का मंचन मजदूर बस्ती में होने वाला था। उस दिन मंच पर नाटक के पूर्व दिए गए भाषण और चंदा एकत्रित करने की बात को लेकर दोनों मित्रों में झगड़ा हुआ और चेतन आनंद रोष में आकर घर चले गए। दूसरे दिन सुबह बलराज साहनी ने भी पुराने मित्र का घर छोड़ दिया। इस झगड़े के बाद किसी नाटक की रिहर्सल में बलराज साहनी ने देव आनंद से कहा कि अभिनय उनके बस की बात नहीं है। कुछ ही समय बाद देव आनंद अभिनीत ‘बाजी’ की पटकथा बलराज साहनी ने लिखी और कुछ वर्षों बाद चेतन आनंद की ‘हकीकत’ में न केवल अभिनय किया, वरन लेखन व निर्माण में सहयोग दिया। सारांश यह है कि ये सब सच्चे अर्थों में पढ़े-लिखे लोग थे और किसी विवाद की कड़वाहट को दूर तक नहीं जाने देते थे।

बलराज साहनी का चेहरा पारंपरिक नायक का नहीं था और वे मध्य अवस्था में अभिनय से जुड़े थे। जिया सरहदी की ‘हम लोग’ की शूटिंग के लिए उन्हें प्रतिदिन जेल से लाया जाता था, क्योंकि एक वामपंथी आंदोलन के कारण वे राजनीतिक बंदी बनाए गए थे। ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘धरती के लाल’ में उन्होंने अभिनय किया था, परंतु 1946 में जगह-जगह दंगे होने के कारण फिल्म का सामान्य प्रदर्शन नहीं हो पाया। बिमल रॉय ने ‘दो बीघा जमीन’ में उन्हें केंद्रीय भूमिका में लिया और फिल्म की सफलता के साथ ही बलराज साहनी को भी खूब सराहा गया। अमिय चक्रवर्ती की ‘सीमा’ में वे एक गांधीवादी संस्था के प्रमुख की भूमिका में सराहे गए। यह फिल्म शंकर-जयकिशन-शैलेंद्र के सार्थक माधुर्य के कारण सदैव याद की जाएगी।

उन दिनों फिल्म कलाकार बस से भी आया-जाया करते थे। ऐसे ही एक दिन बलराज साहनी को बस में सफर के दौरान बस कंडक्टर बदरुद्दीन काजी के हंसने-हंसाने की अदा काफी पसंद आई और उनके सिफारिशी खत के साथ काजी गुरुदत्त से मिलने गए। उनका शराबी अंदाज गुरुदत्त को इतना पसंद आया कि उन्होंने उन्हें जॉनी वाकर के नाम से हास्य भूमिका में लिया और यथार्थ जीवन में कभी शराब नहीं छूने वाले जॉनी वाकर ने लंबी, सफल पारी खेली। बलराज साहनी ‘काबुलीवाला’ में भी खूब सराहे गए। यह फिल्म रबींद्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित थी और अरसे पहले शांति निकेतन से जुड़े होने के समय रबींद्रनाथ टैगोर ने बलराज साहनी को अपनी मातृभाषा पंजाबी में लिखने की प्रेरणा दी थी।

बलराज साहनी को आज के दर्शक टेलीविजन पर बार-बार दिखाए जाने वाले ‘वक्त’ के गीत ‘ओ मेरी जोहरा जबी, तुझे मालूम नहीं। तू अब तक है हसीं और मैं जवां’ में देख सकते हैं। मौज-मस्ती में पठान परिवार के जश्न में गीत गा रहा है। बलराज साहनी की ‘गरम कोट’, ‘सट्टा बाजार’, ‘सीमा’, ‘लाजवंती’ और ‘गर्म हवा’ अविस्मरणीय फिल्में हैं। एमएस सथ्यू की ‘गर्म हवा’ विभाजन की त्रासदी पर बनी सशक्त फिल्म है। इस विषय पर इसके अतिरिक्त महान रचना गोविंद निहलानी की ‘तमस’ है, जो बलराज साहनी के भाई भीष्म साहनी के उपन्यास से प्रेरित है। उनके पुत्र परीक्षित साहनी ने रूस की संस्था में पांच वर्ष तक निर्देशन व अभिनय का प्रशिक्षण लिया और अनेक फिल्मों में अभिनय किया तथा आज भी टेलीविजन पर सक्रिय हैं। बलराज साहनी अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति थे और उनकी कलात्मक अभिरुचियां उनके जीवन के हर कार्य में अभिव्यक्त हुई हैं। वे स्टार होते हुए भी अत्यंत सादा-सरल जीवन जीते थे। राज खोसला की ‘दो रास्ते’ में उन्होंने सौतेले भाई की भूमिका की थी, जो उस परिवार का केंद्र है। राज खोसला एक मनमौजी इंसान थे, जिन्हें शीघ्रता से और किफायत से काम करना पसंद नहीं था। उनसे ज्यादा विविध फिल्में किसी और फिल्मकार ने नहीं रची हैं। बलराज साहनी की गंभीरता से आतंकित खोसला ने यह फिल्म अत्यंत तीव्र गति से बनाई।

बलराज साहनी ने लाहौर के सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर सोढ़ी और प्रोफेसर बुखारी के मार्गदर्शन में शेक्सपीयर के लिखे नाटकों में अभिनय किया और शांति निकेतन में बर्नाड शॉ का ‘आम्र्स एंड मैन’ खेला, परंतु लंदन में बीबीसी में नौकरी करके भारत लौटने के बाद उन्होंने भारतीय नाटकों में ही काम किया। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि राजनीति में भी अनेक भारतीय इंग्लैंड से लौटने के बाद स्वदेशी आंदोलन में कूदे। इसी तरह अनेक कलाकार विदेशों से लौटकर विशुद्ध देशज हो गए। बलराज साहनी ने फिल्म उद्योग में अपने जीवन के चौंतीसवें वर्ष में प्रवेश किया था और सार्थक पारी खेलने के बाद जीवन के अंतिम दौर में अमृतसर के पंजाबी कला केंद्र से जुड़े। इस संस्था के लिए उन्होंने एक नाटक लिखा- ‘क्या यह सच है बापू?’, परंतु यह ‘अर्श-फर्श’ के नाम से मंचित किया गया। अपने अंतिम दिनों में उन्हें दुख था कि भारतीय रंगमंच और सिनेमा कोई अणु विस्फोट नहीं कर पाया। अनगिनत नाटक, दर्जनों फिल्में और ढेरों किताबें लिखने के बाद भी उन्हें स्वयं से असंतोष था। इस तरह का असंतोष एक अच्छे इंसान की आत्मा का ताप होता है।

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(प्रस्तुत लेख दैनिक भास्कर के ‘परदे के पीछे’ स्तम्भ में 31 जनवरी 2013 को प्रकाशित हुआ था।)