बलराज साहनी एक अभिनेता के रूप में ही ज्यादा जाने जाते हैं, जबकि उन्होंने एक साहित्यकार के रूप में भी काफी कार्य किया है। उन्होंने कविताओं और कहानियों से लेकर, नाटक और यात्रा-वृत्तान्त तक लिखे हैं। 13 अप्रैल 1973 को जब उनकी मृत्यु हुई, तब भी बलराज एक उपन्यास लिख रहे थे, जो कि उनकी मृत्यु के कारण अधूरा ही रह गया। आज उनकी सालगिरह पर पोषम पा पर प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ-

सीख

वैज्ञानिकों का कथन है कि
डरे हुए मनुष्य के शरीर से
एक प्रकार की बास निकलती है
जिसे कुत्ता झट सूंघ लेता है
और काटने दौड़ता है।

और अगर आदमी न डरे
तो कुत्ता मुँह खोल
मुस्कुराता, पूँछ हिलाता
मित्र ही नहीं, मनुष्य का
गुलाम भी बन जाता है।

तो प्यारे!
अगर जीने की चाह है,
जीवन को बदलने की चाह है
तो इस तत्व से लाभ उठाएँ,
इस मंत्र की महिमा गाएँ,
इस तत्व को मानवी स्तर पर ले जाएँ!
जब भी मनुष्य से भेंट हो
भले ही वह कितना ही महान क्यों न हो,
कितना प्रबल
कितना ही शक्तिमान हाकिम क्यों न हो,
उतने ही निडर हो जाइए
जितना कि कुत्ते से।

मित्र प्यारे!
अगर डरोगे, तो निकलेगी बास जिस्म से
जिसे वह कुत्ते से भी जल्दी सूंघ लेगा
और कुत्ते से भी
बढ़ कर काटेगा!

सट्टा बाज़ार

भौंकते देख मनुष्य को, कुत्तों की तरह
यहाँ, देखिए खरी हकीकत इस निज़ाम की!
यहाँ न पले धर्म, नियम, न्याय,
सरल पवित्रता और संस्कृति
युगों-युगों से विकसित हुआ बुद्धज्ञान
कोमल कला विभूतियाँ और अनुभूतियाँ

भौंकते देख मनुष्य को कुत्तों सा
यहाँ देखिए, खरी हकीकत, पूँजीवाद की!

उस दूर खो गए युग की याद में.. (कविता अंश)

…तुझे याद है प्रेयसी, एक बार जब
‘अलापत्थर झील’ के निर्मल शीतल जल प्रसार
की ढलान पर, आ उतरी थी सेना सी
पिकनिक करने, हम सबके परिवारों की। तब
खेले थे हम खूब, बरफ़ों से और
पर्वतों की कोख में छिपी, गूंज डायन को था
खूब चिढ़ाया अपने मीठे गीतों और
पुकारों से, कैसे लौट-लौट आतीं प्रति ध्वनियाँ,
उन गीतों और पुकारों की! कैसे उन्हीं पुकारों से
टूट-टूट कर, हिम चट्टानें थीं फिसली
और गिरी थीं झील लहरों में, हिला गई थीं
झील में पड़ती किनारों की कोमल परछाइयाँ!…

आशा-निराशा

एक बार पहले भी भटका था दर-बदर,
तुझे खोकर,
वह पाने के लिए
जिसकी आशा नहीं थी।

आज फिर भटक रहा हूँ
तुम्हें पाकर,
जो पाने की आशा थी
उसे खोकर।
पी.डब्ल्यू.डी. महकमे के पोस्टरों की तरह
‘बचाव में ही बचाव है।’
मेरी, अब तो
गति में ही गति है।

प्रभात से पहले

एयरपोर्ट जाती सड़क को बीच में काटती,
बम्बई, अहमदाबाद सफ़र के लिए बनी
यह नई सड़क, यहाँ है इतनी ऊँची कि
हमारे आगे भागती एक मोटर
सड़क से नीचे लुढ़क गई।

इस क्रॉस रोड के लिए एक
पुलिया बनानी चाहिए थी, पर
उन्हें सूझेगा पुल बनाना तभी जब
कुछ और गाड़ियाँ लुढ़केंगी
कुछ और लोग मरेंगे।

ग़नीमत हुई कि
लुढ़कती मोटर की लाइटें
मेरे ड्राइवर को दीख गईं
अगर लाइटें होती ‘डिम’ तो
तेज़ भागती गाड़ियाँ, निश्चय ही
सभी टकरा लुढ़क जातीं, और
एयरपोर्ट के बजाए, हमें
कहीं और पहुँचातीं।

अब हो गई वह मोटर, अब सबसे आगे
जो थी बहुत बड़ी और आलीशान।
उसकी काली पालिश थी चकाचक चमकती
और आगे पीछे की बत्तियाँ खूब तेज़ थीं।

कोई बहुत बड़े लोग थे उसमें
उनके सामने था जगमग करता
विशाल एयरपोर्ट भूमिका
विस्तार, एक तिलिस्मी सा संसार!
जिस पर यूं भासता, था
उनका ही विशेष अधिकार!

सजा था मेरे सामने एयरपोर्ट यूं
मानो एक बड़ा इश्तिहार
देश के बढ़ते धन-ऐश्वर्य का,
जिस फल स्वरुप है, चीख पुकार
जनता की, रोटी के लिए, और
सरकार की,
केक से बढ़िया समाजवाद की!

अपनी छोटी सी मोटर तब
मुझे यूं दिखी, ज्यों
किसी बड़े आलीशान बंगले का
छोटा सा सर्वेंट-क्वार्टर।

साथ ही उठा मन में एक सवाल
कि मेरे आदर्श ऊँचे होने के बावजूद
क्या मेरा जीवन भी कुराह तो नहीं पड़ गया?

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