मैंने कब कहा
कि मुझे कबाब बिरियानी
और काजू किशमिश का कलेवा दो
तीखी सुगन्ध से सराबोर सतरंगी पोशाक दो,
मैंने कब माँगी चमचमाती कार,
फूलों के हार
आलीशान फ्लेट
हीरे की अंगूठी
सोने की चेन
श्वान, लॉन, रम और शेम्पेन…
मैंने तो बस इतना चाहा
कि जब खेतों की थाली में
दुनिया को रोटी परोसने के लिये
मैं धान की फसल रोप रहा होऊं
तब मेरे पेट की ट्यूब
भूख के काँटे से पंक्चर न पड़ी रहे
मेरी पत्नी की तार-तार साड़ी में से झाँकते
सौन्दर्य के प्रकाश को
अँधियारे के अनधिकारी दाँत जख्मी न कर पाएँ
जलती धूल हमारे तलुओं का रंग न बदले
और वक्त का गिरगिट
रंग बदलने पर उतारू हो जाए
तो हम बेमौत न मारे जायें
बल्कि अपने छोटे से घर में
नई सुबह का इन्तज़ार कर सकें।


Special Facts:

Related Info:

Link to buy the book:

© 2018 पोषम पा ALL RIGHTS RESERVED | ABOUT | CONTACT | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE

Don`t copy text!