बेचैन शहर की गलियाँ

मेरा शहर किसी गन्दी गाली-सा है
इसकी गलियाँ जैसे बारूदी सुरंग
जाने कब निगल जाएँ आदमी
बिगड़ी हुई शक्ल
चेहरे पर इश्तेहारों के घाव
और नंगी तवायफ़ों को ताड़ने वाली नज़र

एक अजीब आवाज़ है इस शहर की
गिटार की टूटी स्ट्रिंग जैसी
मेरा शहर कुत्तों-सा भौंकता है
अंधेरी गलियों में
फिर सन्नाटों में जाकर अकेला सोता है
ये औरत की गूँगी चीख भी है
और मौत का कचोटता सन्नाटा

अजीब इत्तेफ़ाक़ है
मेरा शहर हर रोज़ मरता है
किसी कोने पर पहले हाथ भी मिलाएगा
और मारेगा धक्का चौराहे पर
इसके मकान कोई कोरे अल्फ़ाज़ हैं
और दरवाज़े मुँह पर पड़ते थप्पड़

मेरे शहर के फेफड़ों में धुआँ भरा है
और आँखों पर मली है कालिख
ये एस्पिरेशन भी है और इमेजिनेशन भी
किसी अफ़सोस-सा है मेरा शहर!

यह भी पढ़ें: वेदान्त दरबारी की कविता ‘एक बड़ा शहर और तुम