भय इतना व्याप्त हो गया है कि
आदमी शरण लेने के लिए तलाशता है
ऐसा कोई गुप्त स्थान
जहाँ नहीं पहुँच पाती कोई रोशनी।
आदमी पहुँच जाता है
एक ऐसे सूखे कुएँ में
जहाँ पसरा पड़ा है
पूर्वाग्रहों का कचरा।
वहाँ डोलचियाँ भर-भरकर
निकाल रहे हैं सब अपना-अपना हिस्सा
और मैं डोलची औंधी लटकाए
प्रतीक्षारत हूँ बारिश की
क्योंकि आवश्यक है
आदमी में भराव
कभी रोशनी का
कभी पानी का।

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