मैं

‘मैं’ – बिल्क़ीस ज़फ़िरुल हसन

कोई गिला तुझसे
शिकायत कुछ नहीं है
तेरी ही तरह मैंने भी
लिखे हैं ऐसे अफ़साने
निहायत पाक-तीनत1, बेख़ता
मासूम करैक्टर तराशे
फिर उनको दर्द, नाकामी, ग़म व हसरत
सज़ाएँ और रुसवाई अता की है

कभी उनको चढ़ाया
बे-गुनाही की सलीबों2 पर
कभी तन्हाइयों के
अन्धे ग़ारों3 में धकेला है
कभी ख़ुद उनके सीने में
उतारे उनके ही हाथों से वह ख़ंजर
ज़ख्म जिनके
मुंदमिल4 हो ही नहीं सकते

मगर चारा भी क्या था?
हर अफ़साने को
अफ़साना बनाने के लिए यह सब
हमें करना ही पड़ता है

तेरी मजबूरियाँ
गर मैं न समझूँ
कौन समझेगा?
मुझे जिस तरह भी
तूने लिखा है
ख़ूब लिक्खा है!


1-विशुद्ध/निर्मल भाव, 2-सूली, 3-गुफाओं, 4-घाव भरना.


चित्र श्रेय: Alp Allen Altiner

More Posts:

This Post Has 2 Comments

    1. We assume, aap ‘achchhi’ kehna chahte the. 🙂

Leave a Reply

Close Menu
error: