नयी किताबें | New Books

नयी किताब: दिलीप कुमार की आत्मकथा – वजूद और परछाई

विवरण: 94 वर्षीय दिलीप कुमार की यह आत्मकथा इंग्लिश में द सब्स्टेंस एंड द शैडो: एन ऑटोबायोग्राफी शीर्षक से प्रकाशित हो चुकी है। इसमें इस महान सितारे ने अपने दिल की बातें साझा की हैं। Read more…

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नयी किताबें | New Books

नयी किताब: शशि थरूर कृत ‘अन्धकार काल: भारत में ब्रिटिश साम्राज्य’

विवरण: इस धमाकेदार पुस्तक में लोकप्रिय लेखक शशि थरूर ने प्रामाणिक शोध एवं अपनी चिरपटुता से यह उजागर किया है कि भारत के लिए ब्रिटिश शासन कितना विनाशकरी था। उपनिवेशकों द्वारा भारत के अनेक प्रकार से Read more…

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समीक्षा | Book Reviews

‘अपनी अपनी बीमारी’ – हरिशंकर परसाई की व्यंग्य चिकित्सा

तीन-चार पेजों की बीस-इक्कीस कहानियों में अपने समाज की लगभग सारी बुराईयों को पृष्ठ-दर-पृष्ठ उघाड़ देना हरिशंकर परसाई ही कर सकते हैं। और वह भी ऐसी बीमारियाँ जिनसे ग्रस्त होना इस समाज के लिए एक Read more…

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नयी किताबें | New Books

नयी किताब: मृणाल पाण्डे कृत ‘सहेला रे’

विवरण: भारतीय संगीत का एक दौर रहा है जब संगीत के प्रस्तोता नहीं, साधक हुआ करते थे ! वे अपने लिए गाते थे और सुननेवाले उनके स्वरों को प्रसाद कि तरह ग्रहण करते थे ! Read more…

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नयी किताबें | New Books

नयी किताब: अनुराधा सिंह कृत ‘ईश्वर नहीं नींद चाहिए’

विवरण: अनुराधा सिंह ने अपने पहले ही संग्रह की इन कविताओं के मार्फत हिंदी कविता के समकालीन परिदृश्य में एक सार्थक हस्तक्षेप किया है। दीप्त जीवनानुभव, संश्लिष्ट संवेदना और अभिव्यक्ति की सघनता के स्तर पर Read more…

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उद्धरण | Quotes

कुछ पंक्तियाँ – ‘अपनी अपनी बीमारी’ (हरिशंकर परसाई)

“जो नहीं है, उसे खोज लेना शोधकर्ता का काम है। काम जिस तरह होना चाहिए, उस तरह न होने देना विशेषज्ञ का काम है। जिस बीमारी से आदमी मर रहा है, उससे उसे न मरने Read more…

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नयी किताबें | New Books

नयी किताब: अशोक कुमार पाण्डेय कृत ‘कश्मीरनामा’

  विवरण: ‘‘अशोक कुमार पाण्डेय की ‘कश्मीरनामा’ हिन्दी में कश्मीर के इतिहास पर एक पथप्रदर्शक किताब है। यह किताब घाटी के उस राजनैतिक इतिहास की उनकी स्पष्ट समझ प्रदर्शित करती है जिसने इसे वैसा बनाया, Read more…

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ब्लॉग | Blog

नई दिल्ली बुक फेयर में मिलिए ‘प्लूटो’ से

नई दिल्ली बुक फेयर जारी है। लोग पूरा-पूरा दिन घूमकर किताबें देख रहे हैं, खरीद रहे हैं और दोस्तों को बता भी रहे हैं। जिनके पास समय की कमी है, वे सुझाव भी माँग रहे Read more…

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नयी किताबें | New Books

नयी किताब: गीत चतुर्वेदी कृत ‘टेबल लैम्प’

“ये जो गद्य के टुकड़े हैं, ये दरअसल मेरी यात्राएँ हैं. मेरी स्टडी में एक दीवार पर दुनिया का नक़्शा लगा हुआ है. मैंने ऐतिहासिक शहरों की तस्वीरें जुटा रखी हैं. मैं छह भाषाओं में Read more…

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नयी किताबें | New Books

नयी किताब: एम. एम. चंद्रा कृत ‘प्रोस्तोर’

विवरण: प्रोस्तोर ( विस्तार ) एम. एम. चन्द्रा का दूसरा लघु उपन्यास है। प्रोस्तोर का अर्थ है विस्तार। प्रोस्तोर’ (विस्तार) लघु उपन्यास, 1990 के दशक की एक सच्ची घटना पर आधारित है। इतिहासकारों का मानना Read more…

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नयी किताबें | New Books

नयी किताब: अनीता राकेश कृत ‘अन्तिम सतरें’

विवरण: कथाकार मोहन राकेश के साथ बिताए अपने समय को लेकर अनीता राकेश के संस्मरणों की दो पुस्तकें हिन्दी पाठकों की प्रिय पुस्तकों में पहले से शामिल हैं—’चन्द सतरें और’ तथा ‘सतरें और सतरें’। उसी Read more…

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ब्लॉग | Blog

जब भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने लिखीं अंग्रेज़ों की प्रशंसा में कविताएँ

भारतेन्दु हरिश्चंद्र हिन्दी आधुनिक काल के प्रथम प्रमुख कवि माने जाते हैं। भारतेन्दु का कार्यकाल लगभग उसी समय का रहा जब 1857 की क्रांति के बाद भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज ख़त्म हुआ Read more…

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व्यंग्य | Satire

परसाई के हनुमान: प्रथम साम्यवादी या प्रथम स्मगलर?

हरिशंकर परसाई सदियों पुराने मिथकों में अपनी कल्पना जोड़कर उसे आज के समाज की विसंगतियों का रूप दे देने के लिए जाने जाते हैं, चाहे वो कृष्ण-सुदामा मिलन का प्रसंग हो या फिर त्रिशंकु की Read more…

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साक्षात्कार | Interviews

अमृता के इमरोज़ से ‘सात सवाल’

अमृता-इमरोज़ का नाम आते ही या तो प्रेम-तिकोनों के कोण नपने लगते हैं या फिर एक में खुद को भुला चुका कोई दूसरा ‘एक’ याद आने लगता है। दो पर एक की छाया हमेशा रहती Read more…

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उद्धरण | Quotes

कुछ पंक्तियाँ – ‘ग़बन’ (प्रेमचंद)

“उत्कंठा की चरम सीमा ही निराशा है।” “रूपये के मामले में पुरूष महिलाओं के सामने कुछ नहीं कह सकता। क्या वह कह सकता है, इस वक्त मेरे पास रूपये नहीं हैं। वह मर जाएगा, पर Read more…

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ब्लॉग | Blog

दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2018 में खरीदें ये 15 हिन्दी किताबें

हिन्दी में नया क्या लिखा जा रहा है, यह इंटरनेट के युग में भी ढूंढ पाना इतना आसान नहीं नज़र आता। इतनी पर्याप्त जानकारी किसी एक वेबसाइट या पोर्टल पर नहीं मिलती कि उसमें से Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: मैं समर अवशेष हूँ – पूजा शाह

‘कुरुक्षेत्र’ कविता और ‘अँधा युग’ व् ‘ताम्बे के कीड़े’ जैसे नाटक जिस बात को अलग-अलग शैलियों और शब्दों में दोहराते हैं, वहीं एक दोस्त की यह कविता भी उन लोगों का मुँह ताकती है जो Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘तमाशा’ – पुनीत कुसुम

उन्मादकता की शुरुआत हो जैसे जैसे खुलते और बंद दरवाज़ों में खुद को गले लगाना हो जैसे कोनों में दबा बैठा भय आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए जैसे वो सत्य जिसे झुठलाने की Read more…

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रिपोर्ताज | Reportage

‘अदम्य जीवन’ – रांगेय राघव का रिपोर्ताज

पचास के दशक के आरम्भ में पड़े बंगाल के अकाल के बारे में रांगेय राघव ने यह रिपोर्ताज लिखा था, जो ‘तूफानों के बीच’ रिपोर्ताज संग्रह में प्रकाशित हुआ। बंगाल के अकाल के दौरान जो Read more…

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नव-लेखन | New Writing

“शदायी केह्न्दे ने” – रमेश पठानिया की कविताएँ

आधुनिक युग का आदमियत पर जो सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है वो है इंसान से उसकी सहजता छीन लेना। थोपे हुए व्यवसाए हों या आगे बढ़ जाने की दौड़, हम जाने किन-किन माध्यमों का प्रयोग Read more…

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लेखकों से बातचीत | Authors' Interviews

जो पढ़ने में आप सहज हैं, वही पढ़ें – शान रहमान

कॉरपोरेट के पिंजरे में फंसे एक साहित्य प्रेमी के आगे अगर एक किताब रख दी जाए जिसका नाम हो “कॉरपोरेट कबूतर”, तो उस किताब की तरफ आकर्षण स्वाभाविक ही है. पटना में रहने वाले शान Read more…

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अनुवाद | Translation

कविता: ‘स्वयं हेतु’ – रिया जैन

रिया अंग्रेज़ी कविताएँ लिखती हैं और अपनी उम्र की भावनाएँ और असमंजस बड़े सुलझे हुए शब्दों में उकेरती हैं। मैंने यह कविता रिया के ब्लॉग The Scribbling Girl पर पढ़ी थी और चूंकि हिन्दी में ज़्यादा Read more…

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ब्लॉग | Blog

हरिवंशराय बच्चन: जन्मदिन पर विशेष

नोट: यह लेख मूल रूप से हिन्दी अखबार अमर उजाला के ऑनलाइन पोर्टल ‘काव्य’ के लिए लिखा गया था। यहाँ पुनः प्रस्तुत है। हरिवंशराय बच्चन हिन्दी साहित्य के सबसे अधिक लोकप्रिय कवियों में से एक Read more…

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Uncategorized

दुविधा (मुक्तिबोध की कविता ‘मुझे कदम कदम पर’ से प्रेरित)

कविताएँ अपने पाठकों के भीतर बहुत कुछ जगा देती हैं और उन्हें बहुत जगह भी देती हैं जिसमें कुछ न कुछ चुपचाप बैठा रहता है, जीता रहता है, बढ़ता रहता है और मौका ढूँढता रहता Read more…

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ब्लॉग | Blog

हिन्दी हाइकु (Hindi Haiku)

पिछले दिनों रोशनदान ग्रुप द्वारा आयोजित पोएट्री वर्कशॉप में लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी द्वारा हाइकु, माहिया और दोहे जैसे काव्य रूपों को संक्षेप में समझने का मौका मिला। चूंकि यह पोस्ट हाइकु समझने हेतु है Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ’ – पुनीत कुसुम

तुम कहती हो “कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ” मगर, क्यों मान लेती हो? आख़िर, क्यों मान लेती हो? पृथ्वी तो नहीं मानती अपने गुरुत्व को जब तक कोई ज़मीन से अपनी Read more…

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कविता | Poetry

कुँवर नारायण: अबकी बार लौटा तो..

लेखक लक्ष्मण राव को एक वीडियो में कहते सुना था कि कोई कवि या लेखक पचास वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद जन्मता है और उसकी ज़िन्दगी उसकी मृत्यु के बाद शुरू होती है। Read more…

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कहानी | Story

रानी पद्मावती/पद्मिनी की कहानी (जायसी की ‘पद्मावत’ का व्याख्यान)

संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ के कारण फिर से चर्चा में आयी रानी पद्मावती की कहानी, हिन्दी साहित्य के प्रेममार्गी शाखा के कवि मलिक मुहम्मद ‘जायसी’ के महान और चर्चित ग्रन्थ ‘पद्मावत’ में पायी Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘खजूर बेचता हूँ’ – पुनीत कुसुम

न सीने पर हैं तमगे न हाथों में कलम है न कंठ में है वीणा न थिरकते कदम हैं इस शहर को छोड़कर जिसमें घर है मेरा उस ग़ैर मुल्क जाके लोगों के मुँह देखता Read more…

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उद्धरण | Quotes

कुछ पंक्तियाँ – ‘चित्रलेखा’ (भगवतीचरण वर्मा)

“हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।” “प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। केवल व्यक्तियों के सुख के केन्द्र भिन्न होते हैं।” “कुछ-कुछ Read more…

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समीक्षा | Book Reviews

एक अतिरिक्त ‘अ’ – रश्मि भारद्वाज

भारतीय ज्ञानपीठ के जोरबाग़ वाले बुकस्टोर में एक किताब खरीदने गया था। खुले पैसे नहीं थे तो बिलिंग पर बैठे सज्जन ने सुझाया कि कोई और किताब भी देख लीजिए। यद्यपि मैं ऐसे बहाने ढूँढा Read more…

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समीक्षा | Book Reviews

The Night Train at Deoli – Ruskin Bond

बहुत अच्छे लेखकों के बारे में यह एक आम धारणा है कि उन्हें उनकी मूल भाषा में ही पढ़ा जाना चाहिए। रस्किन बॉन्ड, जिन्होंने मूलतः अंग्रेजी में लिखा है, उनके बारे में भी यही कहा Read more…

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कविता | Poetry

छायावाद का ‘बह चला झरना’

कोई भी बहुत लम्बे समय तक केवल मनोरंजन के लिए कविताएँ नहीं सुन सकता। चाहे कविताओं के विषय हों या कवि की कथन-शैली, एक पाठक कहीं न कहीं खुद को उन कविताओं में ढूँढने लगता Read more…

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कहानी | Story

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘पंचलाइट’ (पंचलैट)

अपने उपन्यासों और कहानियों में लोकजीवन को एक कविता के जैसे पेश करने वाले फणीश्वरनाथ रेणु के कहानी संग्रह ‘ठुमरी’ की यह कहानी बड़ी मजेदार है। एक गाँव में विभिन्न जातियों की विभिन्न टोलियाँ हैं। Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘पथिक’ – आदर्श भूषण

चलते चलते रुक जाओगे किसी दिन, पथिक हो तुम, थकना तुम्हारे न धर्म में है; ना ही कर्म में, उस दिन तिमिर जो अस्तित्व को, अपनी परिमिति में घेरने लगेगा, छटपटाने लगोगे, खोजना चाहोगे, लेकिन Read more…

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कविता | Poetry

‘कविता’ पर कविताएँ

जब कविताएँ पढ़ते या लिखते हुए कुछ समय बीत जाता है तो कोई भी पाठक या कविता-प्रेमी अनायास ही कभी-कभी कुछ ऐसे सवालों में खोने लगता है जिनका कोई एक नियत जवाब नहीं हो सकता। Read more…

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ब्लॉग | Blog

हिन्दी मुकरी

नहीं नहीं, हिन्दी अपने किसी वादे से नहीं मुकरी है, यह तो एक हिन्दी विधा (form) है जो मुकरे हुए लोगों का सैंकड़ों साल बाद भी इंतज़ार कर रही है कि कब वो मुड़कर उसकी Read more…

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समीक्षा | Book Reviews

जगदीश चंद्र की ‘धरती धन न अपना’

जगदीश चंद्र की किताब ‘धरती धन न अपना’ एक और किताब है जो मुझे बड़ी मशक्कतों के बाद केवल ऑनलाइन एक सॉफ्टकॉपी के रूप में मिल पायी, जबकि यह किताब अपने विषय की एक उम्दा Read more…

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समीक्षा | Book Reviews

‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ – अनुराधा बेनीवाल

अनुराधा बेनीवाल की यह पहली किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’, राजकमल प्रकाशन की ‘यायावरी आवारगी’ शृंखला का पहला पड़ाव है। वैसे तो शृंखला के नाम से जाहिर है कि यह एक यात्रा-वृत्तांत (travelogue) है, लेकिन किताब Read more…

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ब्लॉग | Blog

बच्चन की त्रिवेणी – मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश

आलोचना अच्छी है, अगर करनी आती हो। और अगर लेनी आती हो तो और भी। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि न तो कोई जिम्मेदारी से आलोचना कर पाता है और न ही बहुत लोग Read more…

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समीक्षा | Book Reviews

नई हिन्दी की शोस्टॉपर – रवीश कुमार की ‘इश्क़ में शहर होना’

मैं आज स्माल टाउन-सा फ़ील कर रहा हूँ… और मैं मेट्रो-सी। पढ़ने में सामान्य लेकिन शिकायत और शरारत दोनों दिखाती इन पंक्तियों से शुरू होने वाली इस किताब के बारे में लिखने में मुझे काफी Read more…

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कविता | Poetry

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रेम कविताएँ

अमूमन रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का नाम आते ही जो पंक्तियाँ किसी भी कविता प्रेमी की ज़बान पर आती हैं, वे या तो ‘कुरुक्षेत्र’ की ये पंक्तियाँ होती हैं- “वह कौन रोता है वहाँ- इतिहास के Read more…

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कविता | Poetry

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का जूता, मोजा, दस्ताने, स्वेटर और कोट

आप सोच रहे होंगें कि मैं सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कपड़ों की अलमारी क्यों खोलकर बैठा हूँ। लेकिन आप ग़लत सोच रहे हैं। ये सब चीज़ें उनकी कपड़ों की अलमारी से नहीं, उनके कविता संग्रह ‘खूटियों पर Read more…

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नव-लेखन | New Writing

लप्रेक – इंटरेस्टेड ही तो किया है!

“राहुल, तुमने वो आँटी वाली इवेंट में इंटरेस्टेड क्यों किया हुआ था?” “ऐंवेही यार! अब तुम शुरू मत हो जाना, पैट्रिआर्कि, फेमिनिज्म, कुण्डी मत खड़काओ एन ऑल।” “क्यों ना शुरू हो जाऊँ? रीज़न दे दो, Read more…

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ब्लॉग | Blog

संग-ए-मील

10 सितंबर 2017, रविवार के दिन जब आधी दिल्ली, शाम के मनोरंजन के प्लान बना रही थी, तब दिल्ली का एक कोना सुबह से ही कविताओं और गीतों में खोया हुआ था। मौका था दिल्ली Read more…

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ब्लॉग | Blog

हिन्दी दिवस का उपहार – ‘प्रेमचंद – कलम का सिपाही’

किसी हिन्दी पाठक के पढ़ने की शुरुआत कहीं से भी हुई हो, जब तक अन्य उम्दा लेखकों से साक्षात्कार नहीं हो जाता या फिर खुद के फेवरेट्स नहीं बन जाते, किसी भी नए पाठक को Read more…

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नव-लेखन | New Writing

लप्रेक – प्रेम, प्रेम, प्रेम

“प्रेम, प्रेम, प्रेम।” “क्या हुआ है तुम्हें, तबियत सही है ना?” “हाँ, तबियत को क्या हुआ?! बस तीन बार कुछ बोलने का मन हुआ। आज तो बनता है, नहीं?” “ह्म्म्म!!” “ह्म्म्म क्या? प्यार पर भी Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘फुलझड़ी’ – पुनीत कुसुम

एक समस्या मुँह खोले खड़ी है वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है? है बदन ज्यों चन्द्रमा और थोड़ा काँच हो रेत से लिपटे हो दोनों और थोड़ी आँच हो एक वृत फिर आतिशों Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ – शिवा

मेरे दिल की सतह पर टार जम गया है साँस खींचती हूँ तो खिंची चली आती है कई टूटे तारों की राख ना जाने कितने अरमान निगल गयी हूँ साँस छोड़ती हूँ तो बढ़ने लगता Read more…

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नव-लेखन | New Writing

लप्रेक – चित्रलेखा

“मैंने एक अनुभव किया है- जब भी मैं अलगाव की कोई भी बात पढ़ती हूँ तो उद्विग्न हो जाती हूँ। उस व्यक्ति से घृणा होने लगती है जिसने अलग होने की भूमि तैयार की है Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘राधा-कृष्ण’ – शिवा & पुनीत कुसुम

Puneet- हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे कान्हा ढूँढ रहा तुझे राधे ऊपर नभ् को खोल खोल कर धरती के भीतर टटोल कर स्वर्ग, नरक और पातालों में जीव-मरण Read more…

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नव-लेखन | New Writing

लप्रेक – इश्क़ में ‘आम’ होना

“तुम ऐसे खाते हो? मैं तो काट के खाती हूँ। ऐसे गँवार लगते हैं और मुँह भी गन्दा हो जाता है और पब्लिक में तो ऐसे खा ही नहीं सकते। तुम न जाने कैसे…। अच्छा Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: एक पेड़ – पुनीत कुसुम

[पापा के लिए] एक पेड़ मेरी क्षमता में जिसका केवल ज़िक्र करना भर है जिसे उपमेय और उपमान में बाँधने की न मेरी इच्छा है, न ही सामर्थ्य एक पेड़ जिसे हमेशा विशाल और घना Read more…

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नव-लेखन | New Writing

लप्रेक – चाय-अदरक

“चार महीने जिम जाकर ये अदरक जैसी बॉडी बनायी तुमने?” “तुम चाय जैसी क्यों होती जा रही हो?” “चाय जैसी? मतलब? देखो  रेसिस्ट कॉमेंट किया तो अभी ब्रेक-अप हो जाएगा” “अरे बाबा! मतलब हर वक़्त तुम्हारी तलब Read more…

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नव-लेखन | New Writing

लप्रेक – मन की बात

“सुनो।” “हाँ।” “अगर मेरे लिए कोई मन्दिर बनाकर उसमें मेरी मूर्ति रखे, तो मुझे तो बहुत अच्छा लगे।” “पर ऐसे पूजने वाले ज्यादा हो जायेंगे और प्यार करने वाले कम।” “प्यार करने वाले चाहिए भी Read more…

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नव-लेखन | New Writing

लप्रेक – तुम मुबारक

“लगे इलज़ाम लाखो हैं कि घर से दूर निकला हूँ तुम्हारी ईद तुम समझो, मैं तो बदस्तूर निकला हूँ।” “तुम नहीं सुधरोगे ना? कोई घर ना जा पाने से दुखी है और तुम्हें व्यंग सूझ Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: एक्सट्रा चीज़! – शिवा & पुनीत कुसुम

Shiva- कभी आँखों से लिख दो कुछ मेरी आखों पर कि हया की हर झुकी नज़र का गुनेहगार तुम्हारा ज़िक्र हो और दुआ में उठी पलकें वहां ऊपर भी तुम्हें ही पायें Puneet- तुम आँखों Read more…

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तिराहा – पुनीत कुसुम

एक तिराहे पर दो सेकंड रुकना हुआ, आधी नींद में था। आँख की एक झपक के बीच ही कई छोटे दृश्य दिखे। पहले में एक आदमी अपनी पत्नी को साइकिल की पीछे वाली सीट पर Read more…

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घर आ गया – पुनीत कुसुम

सोचा नहीं था, इस भाषा में दोबारा उतर पाऊँगा। मगर, अगर सोचा गया ही होने लगे तो ना रंज रहेगा, ना रस। रंज का वियोग सहनीय है, रस का नही। बहरहाल, पता नहीं कहाँ जा Read more…

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