बोझ

एक बोझ था;
मेरे अंदर
जो लिए घूमता था,
ट्रेनों में,
बसों में,
सड़कों पर,
आज उसी चौराहे पर
उतार दिया है वो बोझ,
जहाँ सब शुरू हुआ था,
निश्चय किया है,
अब नहीं सोचूँगा और,
थोड़ा स्वार्थी हो गया हूँ,
अकेले में ख़ुद से बात करते करते,
और तुम्हारा प्रतिबिम्ब,
खोजते खोजते,
काफ़ी दूर निकल गया था।
मील के पत्थरों पर,
वो सारे निशान लगाता चला जा रहा था,
जहाँ मेरी और तुम्हारी परछाइयों
ने चिह्न छोड़े थे,
एक पंखहीन विहग की भाँति
जब गिरा था मैं
अपने स्वप्न की धरती पर
वहाँ ख़ुद को बड़ा असहज पाया,
निद्रा जब और गहरी होती,
फिसलन और उतनी ही बढ़ती
जा रही थी;
आज उतार फेंके हैं,
मैंने वो सारे वस्त्र,
जो मेरे अंगों को नोचने लगे थे;
घाव काफ़ी गहरा हो चला था,
कुरेदा भी,
सहलाया भी,
लेकिन असहनीय पीड़ा से संतृप्त
अब बड़ा ढीठ हो गया हूँ,
काफ़ी अरसों से चिल्लाया नहीं हूँ;
कहीं एकांत में,
श्रेणी से विस्थापित,
एक गहरी चुप्प से
भीगा हुआ हूँ।

सच कहो तो,
थक गया हूँ
बोझ ढोते ढोते,
पीठ पर छालों के निशान है,
अपनी वास्तविक आयु से
कहीं अधिक वृद्ध दिखने लगा हूँ,
सोचने लगा हूँ,
इस उम्र में कई
अनचाहे सवाल,
मेरी त्वचा की
झुर्रियाँ बनते जा रहे हैं,
अपनी प्रश्नहीनता,
खाती है अंदर अंदर,
तभी निर्णय किया है,
आज ये कविता लिखने का,
वहीं जहाँ तुम्हारा मेरे साथ
वर्तमान होना,
एक प्रश्न है,
भूत एक मुकरी,
और भविष्य एक लम्बा अवकाश,

कदाचित ही
इस शरीर की निर्माण प्रक्रिया में
हृदय सबसे कोमल अंग रहा हो,
लेकिन अब इसे मैंने कठोर बना दिया है,
मेरे अंदर का उपद्रवी स्वभाव,
अब मजबूर करता है,
प्रेम को एक अपूर्ण शब्द मानने पर,
कई सत्य आज विस्थापित हो जायेंगे
अपने अभिकारकों से
जिनका औचित्य सिर्फ़
इतना है कि
तुम्हें एक सजीव स्वप्न मान लेना ही
इस क्षण उचित रहेगा।