बुढ़िया का कटोरा

मन में उठे दो भाव,
एक के बाद एक,
देखा जब मैंने
एक बुढ़िया को,
बैठी थी जो एक बड़े पुराने
मंदिर के बाहर,
लिए हुए अपने हाथों में एक बड़ा कटोरा,
कटोरा एलुमिनियम का था।
उन्हीं हाथों में,
जिनसे कभी दी थी दुआएँ
बच्चों को अपने
बहुत बड़े आदमी बनने का,
और कभी उतारी थी बलाएँ,
कभी बुरी नज़र के उतारने को
उन्हीं हाथों में लेकर
सूखी मिर्चें सात,
फेरा था अपने बच्चों के चारों ओर।
और फिर खर्च कर दी थी
एक-एक दमड़ी अपनी
उनकी पढ़ाई में।
तब भी जब जुगाड़ पूरा नहीं हुआ
तब बेच दिए थे गहने
और गिरवी रखा था
पति की निशानी-सा वो पुराना घर।

अब बच्चे उसके बड़े आदमी बन चुके हैं,
इसीलिए अब वो बेघर है,
घूमती है इधर-उधर
विशेषतः
धार्मिक स्थलों पर ज़्यादा।
सो लेती है रैन बसेरे में कभी
और कभी फुटपाथ पर।
उन हाथों को ग़ौर से देखा मैंने,
तो फटी हुई त्वचा से झाँक रही थीं
माँसल रेखाएँ कई
और देखा जब उन आँखों में
तो दिखे कुछ टूटे हुए ख़्वाब,
एक गम्भीर निराशा,
बिगड़ा हुआ मोतियाबिंद
और एक आशा
कि यदि यह कटोरा
कुछ भारी हो जाये
तो रात्रि भोजन का
इंतजाम हो जाये।
यह सब परिलक्षित था,
स्वतः स्पष्ट था,
उसके लिए किसी स्वांग की
आवश्यकता नहीं थी।
मन में उठते हुए एक भाव ने
सुझाया कि सौ रुपये का
एक नोट
कटोरे में डालना चाहिए,
पर दूसरे भाव ने रोका
और प्रेरित होकर उसी भाव से
निकाला मैंने
दस रुपये का सिक्का एक,
और सोचा अब पीछे वाले की बारी है।

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