समीक्षा | Book Reviews

‘अपनी अपनी बीमारी’ – हरिशंकर परसाई की व्यंग्य चिकित्सा

तीन-चार पेजों की बीस-इक्कीस कहानियों में अपने समाज की लगभग सारी बुराईयों को पृष्ठ-दर-पृष्ठ उघाड़ देना हरिशंकर परसाई ही कर सकते हैं। और वह भी ऐसी बीमारियाँ जिनसे ग्रस्त होना इस समाज के लिए एक Read more…

By Puneet Kusum, ago
समीक्षा | Book Reviews

एक अतिरिक्त ‘अ’ – रश्मि भारद्वाज

भारतीय ज्ञानपीठ के जोरबाग़ वाले बुकस्टोर में एक किताब खरीदने गया था। खुले पैसे नहीं थे तो बिलिंग पर बैठे सज्जन ने सुझाया कि कोई और किताब भी देख लीजिए। यद्यपि मैं ऐसे बहाने ढूँढा Read more…

By Puneet Kusum, ago
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The Night Train at Deoli – Ruskin Bond

बहुत अच्छे लेखकों के बारे में यह एक आम धारणा है कि उन्हें उनकी मूल भाषा में ही पढ़ा जाना चाहिए। रस्किन बॉन्ड, जिन्होंने मूलतः अंग्रेजी में लिखा है, उनके बारे में भी यही कहा Read more…

By Posham Pa, ago
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जगदीश चंद्र की ‘धरती धन न अपना’

जगदीश चंद्र की किताब ‘धरती धन न अपना’ एक और किताब है जो मुझे बड़ी मशक्कतों के बाद केवल ऑनलाइन एक सॉफ्टकॉपी के रूप में मिल पायी, जबकि यह किताब अपने विषय की एक उम्दा Read more…

By Puneet Kusum, ago
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‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ – अनुराधा बेनीवाल

अनुराधा बेनीवाल की यह पहली किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’, राजकमल प्रकाशन की ‘यायावरी आवारगी’ शृंखला का पहला पड़ाव है। वैसे तो शृंखला के नाम से जाहिर है कि यह एक यात्रा-वृत्तांत (travelogue) है, लेकिन किताब Read more…

By Puneet Kusum, ago
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नई हिन्दी की शोस्टॉपर – रवीश कुमार की ‘इश्क़ में शहर होना’

मैं आज स्माल टाउन-सा फ़ील कर रहा हूँ… और मैं मेट्रो-सी। पढ़ने में सामान्य लेकिन शिकायत और शरारत दोनों दिखाती इन पंक्तियों से शुरू होने वाली इस किताब के बारे में लिखने में मुझे काफी Read more…

By Puneet Kusum, ago
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