कविताएँ | Poetry

ख्यालों को बहने दो, बनके नदिया..

मुदित श्रीवास्तव की कविताएँ मुदित श्रीवास्तव भोपाल में रहते हैं। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और कॉलेज में सहायक प्राध्यापक भी रहे हैं। साहित्य से लगाव के कारण बाल पत्रिका ‘इकतारा’ से जुड़े Read more…

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इस बार जीवित रहे तो…

कविता: ‘इस बार जीवित रहे तो’ – जसबीरसिंह आहलूवालिया यदि इस बार सावन आया यदि जमकर बादल बरसे यदि रिमझिम-रिमझिम हो गयी कोई भीगा मन तक आया काग़ज़ की कश्तियों को तुम्हारी और अपनी को Read more…

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कविता: ‘चौराहे पर घर’ – नन्द जवेरी

‘चौराहे पर घर’ – नन्द जवेरी अनुवाद: श्याम जयसिंघाणी कल तक मेरा घर एक चौराहे पर था पर आज सवेरे घर के बाहर लठधर चौकीदार की जगह बन्दूकधारी जवान तैनात था और चौराहा गुम था। Read more…

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‘देर से, बहुत देर से बतानी चाहिए जाने की ख़बर!!’ – गौरव अदीब की नयी कविताएँ

गौरव अदीब की कुछ नयी कविताएँ गौरव सक्सेना ‘अदीब’ बतौर स्पेशल एजुकेटर इंटरनेशनल स्कूल में कार्यरत हैं और थिएटर व शायरी में विशेष रुचि रखते हैं। दस वर्षों से विभिन्न विधाओं में लेखन के साथ-साथ Read more…

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कविता: ‘अब माँ शांत है!’ – शिवा

‘अब माँ शांत है!’ – शिवा मुझे लोगों पर बहुत प्यार आया ज़रा संकोच न हुआ मैंने प्यार बरसा दिया अब मन शांत है मुझे लोगों पर बहुत गुस्सा आया ज़रा संकोच हुआ मैंने माँ Read more…

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‘जेठ’ पर हाइकु

‘जेठ’ पर हाइकु जेठ (ज्येष्ठ) हिन्दू पंचांग के अनुसार साल का तीसरा महीना होता है और इस माह को गर्मी का महीना भी कहा जाता है। आई. आई. टी. रुड़की में कार्यरत रमाकांत जी ने Read more…

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विशेष चंद्र ‘नमन’ की कविताएँ

विशेष चंद्र नमन दिल्ली विवि, श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में तृतीय वर्ष, स्नातक (गणित) में अध्ययनरत हैं। गुज़रे तीन वर्षों में कॉलेज के दिनों में साहित्यिक रुचि खूब जागी, नया पढ़ने का मौका Read more…

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बालकवि बैरागी की बाल कविताएँ

बालकवि बैरागी की बाल कविताएँ यह केवल पाठकों का ही नहीं, हिन्दी साहित्य का भी दुर्भाग्य है, कि हिन्दी के लेखक और कवियों को भारत का एक बड़ा वर्ग उनके निधन के बाद पढ़ना शुरू Read more…

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जोशना बैनर्जी आडवानी की कविताएँ

आज पोषम पा पर प्रस्तुत हैं जोशना बैनर्जी आडवानी की कुछ कविताएँ। जोशना इन्टर कॉलेज में प्राचार्या हैं और कत्थक व भरतनाट्यम में प्रभाकर कर चुकी हैं। जोशना को कविताएँ लिखना बेहद पसंद है और Read more…

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‘माँ’ के लिए कुछ कविताएँ

‘माँ’ के लिए कुछ कविताएँ ‘माँ’ – मोहनजीत मैं उस मिट्टी में से उगा हूँ जिसमें से माँ लोकगीत चुनती थी हर नज्म लिखने के बाद सोचता हूँ- क्या लिखा है? माँ कहाँ इस तरह Read more…

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‘दरवाज़े गर ज़बान की चिटखनी खोल पाते तो बताते..’ – गौरी चुघ की नज्में

गौरी चुघ स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में एक दशक से ज़्यादा समय से सक्रिय हैं। उन्होंने शिक्षा जगत से जुड़े विभिन्न सरकारी, ग़ैर-सरकारी और निजी संस्थानों में अलग-अलग भूमिकाओं में काम किया है। 2008 में Read more…

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कविता: ‘उत्कृष्टता’ – उदय प्रकाश

‘उत्कृष्टता’ – उदय प्रकाश सुन्दर और उत्कृष्ट कविताएँ धीरे-धीरे ले जाएँगी सत्ता की ओर सूक्ष्म संवेदनाओं और ख़फ़ीफ़ भाषा का कवि देखा जाएगा अत्याचारियों के भोज में शामिल सबसे ज़्यादा स्वादों का बखान करता हुआ Read more…

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क्यों पीछे रह जाएगा युवा होने का अद्भुत आश्चर्य

कविता: ‘अकेले क्यों?’ – अशोक वाजपेयी हम उस यात्रा में अकेले क्यों रह जाएँगे? साथ क्यों नहीं आएगा हमारा बचपन, उसकी आकाश-चढ़ती पतंगें और लकड़ी के छोटे से टुकड़े को हथियार बना कर दिग्विजय करने Read more…

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कविता: ‘पत्ते नीम के’ – कुमार शिव

‘पत्ते नीम के’ – कुमार शिव तालियों से बजे पत्ते नीम के। अनवरत चलती रही थी, थक गयी, तनिक आवे पर ठहर कर पक गयी, अब चढ़ी है हवा हत्थे नीम के। था बहुत कड़वा Read more…

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वह दीवाल के पीछे खड़ी है

कविता: ‘वह दीवाल के पीछे खड़ी है’ – सुदीप बनर्जी वह दीवाल के पीछे खड़ी है दीवाल का वह तरफ़ उसके कमरे में है जिस पर कुछ लिखा है कोयले से कोयले से की गयी Read more…

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कविता: ‘कोशिश’ – इन्दु जैन

कविता: ‘कोशिश’ – इन्दु जैन एक चीख लिखनी थी एक बच्चे की चीख अरबी में, तुर्की में, यिद्दिश में, यैंकीस्तानी में असमिया, हिन्दी, गुरमुखी में चिथड़े उड़े बाप और ऐंठी पड़ी माँ के बीच उठी Read more…

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बलराज साहनी की कविताएँ

बलराज साहनी एक अभिनेता के रूप में ही ज्यादा जाने जाते हैं, जबकि उन्होंने एक साहित्यकार के रूप में भी काफी कार्य किया है। उन्होंने कविताओं और कहानियों से लेकर, नाटक और यात्रा-वृत्तान्त तक लिखे हैं। Read more…

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कविता: ‘समाज’ – पुनीत कुसुम

‘समाज’ – पुनीत कुसुम कल एक प्राणी से मुलाक़ात हुई जब मैंने उससे उसका नाम पूछा तो वह बोला- ‘समाज’ प्राणी इसलिए कहा क्योंकि उसकी शक्ल और हरकतें मानवों से तो नहीं मिलती थीं संवेदनाओं Read more…

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झूठ बोलिए, सच बोलिए, खचाखच बोलिए

कविता: ‘खचाखच बोलिए’ – शिवा बोलिए बोलना ज़रूरी है सुनना, पढ़ना, समझना मूर्खों के लिए छोड़ दीजिए सत्ता की शय से बोलिए चढ़ गयी मय से बोलिए ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ के लिए बोलिए ‘अधिकतम आउटरीच’ Read more…

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सुन्दरता कितना बड़ा कारण है..

कविता: ‘चाहिए’ – नवीन सागर एक बच्ची अपनी गुदगुदी हथेली देखती है और धरती पर मारती है। लार और हँसी से सना उसका चेहरा अभी इतना मुलायम है कि पूरी धरती अपने थूक के फुग्गे Read more…

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कविता: ‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ – आतिफ़ ख़ान

प्रख्यात व्यंग्यकार और शायर इब्ने इंशा की कविता ‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ एक ऐसा काव्य झरना है जिसमें भीगने के बाद उसकी नमी एक अरसे तक आपको महसूस होती है। उसी नमी का Read more…

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उड़ना, उड़ते रहना, उड़ते जाना..

गुजराती कविता: ‘अपना तो’ – मफत ओझा ये सब के सब जैसे-के-तैसे सोफासेट, पलंग, कुर्सी, खिड़कियाँ, दरवाज़े, पर्दे सीलिंगफैन, घड़ी की सुइयाँ- टक-टक और बन्द अँधेरी दीवारों पर टँगा है ईश्वर नश्वर पिता के फोटो Read more…

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तेरे अनन्य प्रतिरूप अपने लिए बनाये हैं मैंने।

उड़िया कविता: ‘प्रतिरूप’ – अपर्णा महान्ति पास नहीं हो इसीलिए न! कल्पना के सारे श्रेष्ठ रंग लगाकर इतने सुन्दर दिख रहे हो आज! विरह की छेनी से ठीक से तराश-तराश कर तमाम अनावश्यक असुन्दरता काट-छाँटकर Read more…

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मराठी कविता: ‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले

‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले (रूपान्तर: प्रकाश भातम्ब्रेकर) खोये हुए बालक-सा प्रजातन्त्र जो माँ-बाप का नाम भी नहीं बता सकता न ही अपना पता और सत्ता भी मानो नीची निगाहों से रास्ता नाप रही पतिव्रता Read more…

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अंकल आई एम तिलोत्तमा!

कविता: ‘पहचान और परवरिश’ – प्रज्ञा मिश्रा कौन है ये? मेरी बिटिया है, इनकी भतीजी है, मट्टू की बहन है, वी पी साहब की वाइफ हैं, शर्मा जी की बहू है। अपने बारे में भी Read more…

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पोर उँगलियों के बंसी टटोलते रहे रात भर..

असमिया कविता: ‘पर्वत के उस पार’ – समीर ताँती पर्वत के उस पार कहीं लो बुझी दीपशिखा इस पार हुआ धूसर नभ उतरे पंछी कुछ अजनबी नौका डूबी… उस पार मगर वो पेड़ ताकता रहा Read more…

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संस्कृत कविता: ‘विवशता’ – सीताराम द्विवेदी

‘विवशता’ – सीताराम द्विवेदी जब जब मैंने, धरती पर, सनी धूल में, शोकालीन लता को चाहा- फिर से डालना बाँहों में वृक्ष की, तभी आँधी के झौंके से धूल भरी- आँखें हो गयीं लाल। थोड़ा Read more…

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के. एल. सहगल की कविता ‘परदेस में रहने वाले आ’

यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि के. एल. सहगल एक कवि/शायर भी थे और निजी महफिलों में वे अपनी कविताएँ/छंद सुनाया भी करते थे, हालांकि ‘मैं बैठी थी फुलवारी में’ के अलावा उन Read more…

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नज़्म: ‘आख़िरी दुआ’ – शहरयार

‘आख़िरी दुआ’ – शहरयार आख़िरी दुआ माँगने को हूँ आसमान पर, रात के सिवा, कुछ नहीं रहा कौन मुट्ठियाँ, रेत से भरे पानियों का रुख, शहर की तरफ़, अब नहीं रहा। कितने मुतमइन लोग आज Read more…

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कविता: ‘गर्मियों की शुरुआत’ – मंगलेश डबराल

‘गर्मियों की शुरुआत’ – मंगलेश डबराल पास के पेड़ एकदम ठूँठ हैं वे हमेशा रहते आए हैं बिना पत्तों के हरे पेड़ काफी दूर दिखाई देते हैं जिनकी जड़ें हैं, जिनकी परछाईं हैं उन्हीं में Read more…

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केदारनाथ अग्रवाल के कविता संग्रह ‘अपूर्वा’ से कविताएँ

केदारनाथ अग्रवाल के कविता संग्रह ‘अपूर्वा’ में उनकी 1968 से 1982 तक की कविताओं का संकलन है। इस कविता संग्रह को इसके प्रकाशित वर्ष में ही साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। बकौल केदारनाथ अग्रवाल- Read more…

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आसान है एक मर्द पाना जिसे तुम प्यार कर सको

कमला दास की पाँच कविताएँ अंग्रेजी और मलयालम की प्रख्यात लेखिका कमला दास अपनी कविताओं के ज़रिए स्त्री विमर्श को आंदोलित करने के लिए जानी जाती हैं। आज अगर भारतीय महिलाओं से जुड़ी समस्याओं पर Read more…

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कन्नड़ कविता: ‘स्टापू’ – ए. के. रामानुजन्

‘स्टापू’ – ए. के. रामानुजन् रूपांतर: बी. आर. नारायण यह चतुरंग नहीं, घर की पिछली गली का स्टापू का खेल है। दोनों टाँगों पर सारी देह सम्भाले एक ख़ाने से दूसरे ख़ाने में फेंकते हैं Read more…

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कुछ लघु काव्य – इन्द्रा वासवाणी

कुछ लघु काव्य – इन्द्रा वासवाणी रूपान्तर: नामदेव एकलव्य की गुरु-दक्षिणा: लटका दो – सर द्रोणाचार्य का युगों तक! दर्द ने मेरा सीना चीर कर मौत को टाल दिया! सिन्धु! तेरे सीने पर छोड़े हैं Read more…

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पंजाबी कविता: ‘पूरा एक साल’ – अम्बरीश

‘पूरा एक साल’ – अम्बरीश मर्तबान में वह भर रही है आम की खट्टी, रसदार, महकती फाँकें और न जाने क्यों भला लगता है मुझे गहरे में कहीं लगता है कि ठीक-ठाक रहेगा आगामी साल Read more…

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कन्नड़ कविता: ‘सती’ – शशिकला वीरय्य स्वामी

‘सती’ – शशिकला वीरय्य स्वामी प्रेम माने क्या है पता है मित्र? मात्र मेरे होंठ, कटि सहलाकर रमना नहीं मात्र बातों का महल बना उसमें दफना देना नहीं। आओ कम-से-कम एक बार भीगो मेरे आँसुओं Read more…

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एक किताब खरीदी जाएगी कविताओं की

‘इस बार’ – कुमार अम्बुज एक किताब खरीदी जाएगी कविताओं की और एक फ्रॉक बिटिया के लिए छेदों वाली साड़ी माँ की दिनचर्या से अलग हो जाएगी एक बिन्दी का पत्ता चुन कर खरीदने का Read more…

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तेलुगु कविता: ‘अक्षय अक्षर’ – मद्दूरू श्रीनिवासुलु

‘अक्षय अक्षर’ – मद्दूरू श्रीनिवासुलु अनुवाद: डॉ. एस. ए. सूर्यनारायण शर्मा अक्षर उपजता है बीज-सा, शब्द-टहनियों में पल्लवित होता है कोंपल-सा, खिल उठता है फूल-सा। अक्षर गूँज उठता है मृदंग नाद-सा, जनता के मुक्तकंठ से Read more…

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नज़्म: ‘आख़री सच’ – निदा फाज़ली

‘आख़री सच’ – निदा फाज़ली वही है ज़िन्दा गरजते बादल सुलगते सूरज छलकती नदियों के साथ है जो ख़ुद अपने पैरों की धूप है जो ख़ुद अपनी पलकों की रात है जो बुज़ुर्ग सच्चाइयों की Read more…

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बांग्ला कविता ‘माँ और बेटी’ – जय गोस्वामी

जय गोस्वामी बंगाल के विख्यात साहित्यकार व कवि हैं। सन 2000 में जय को उनके कविता संग्रह ‘पागली तोमार संगे’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आज पोषम पा पर पढ़िए Read more…

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‘खटमलों की फ़रियाद’ – ‘तालिब’ ख़ुंदमीरी

‘खटमलों की फ़रियाद’ – सैयद महमूद ख़ुंदमीरी ‘तालिब’ एक दिन एक जोंक से कुछ खटमलों ने ये कहा दीजिए ख़ाला हमें भी कोई ऐसा मशवरा अब बजाए खून कोई और ही शै पी सकें आदमी से Read more…

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तुम दिन भर करती क्या हो!

हमारे समाज में सदियों से एक स्त्री को लेकर आम जन की अवधारणाएं और अपेक्षाएं एक कुंठित सोच से घिरी रही हैं। पुरुष वर्ग के द्वारा स्त्री वर्ग की भावनाओं और अधिकारों की अनदेखी हुई Read more…

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मैं तुम्हें बताऊँगा अपनी देह का प्रत्येक मर्मस्थल..

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ प्रयोगवाद के कवि थे और अपने समकालीन कवियों से काफी अलग। उनकी कविताएँ और यहाँ तक कि कहानियाँ भी मनुष्य के बाहरी संघर्षों से साथ-साथ उसके आंतरिक द्वंद्वों को एक मनोवैज्ञानिक Read more…

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महेश नेणवाणी की सिन्धी कविता ‘लाठी’

‘लाठी’ – महेश नेणवाणी जो भगवान को मानता है वह लँगड़ा है और उसे बैसाखियों की ज़रुरत है, जो भगवान को नहीं मानता वह अन्धा है उसे लाठी की ज़रुरत है, आपको तय सिर्फ़ इतना करना Read more…

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घर, माँ, पिता, पत्नी, पुत्र, बंधु! – कुँअर बेचैन की कविताएँ

कुँअर बेचैन हिन्दी की वाचिक परम्परा के प्रख्यात कवि हैं, जो अपनी ग़ज़लों, गीतों व कविताओं के ज़रिए सालों से हिन्दी श्रोताओं के बीच एक खास स्थान रखते आए हैं। शब्दों की गेयता के साथ Read more…

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‘सदा एकांत में मैं सूंघता हूँ उठाकर चंद ढेले..’ – फणीश्वरनाथ रेणु की दो कविताएँ

‘मैला आँचल’ से आँचलिक उपन्यासों की परम्परा की शुरुआत करने वाले तथा ‘तीसरी कसम’ व ‘पंचलैट’ जैसी यादगार कहानियां लिखने वाले फणीश्वरनाथ रेणु अपने उपन्यासों और कहानियों के लिए जाने जाते हैं। आज रेणु की Read more…

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धरती ने अपनी त्रिज्या समेटनी शुरू कर दी है..

मेरी तबीयत कुछ नासाज़ है; बस ये देखकर कि ये विकास की कड़ियाँ किस तरह हाथ जोड़े भीख मांग रहीं मानवता के लिए; मैं कहता हूँ कि बस परछाईयाँ बची है, अपना अस्तित्व टटोलते मर Read more…

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गौरव अदीब की कविताएँ

गौरव सक्सेना ‘अदीब’ बतौर स्पेशल एजुकेटर इंटरनेशनल स्कूल में कार्यरत हैं और थिएटर व शायरी में विशेष रुचि रखते हैं। दस वर्षों से विभिन्न विधाओं में लेखन के साथ-साथ हिन्दी में असगर वज़ाहत के चार Read more…

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गुलज़ार की ‘पाजी नज्में’

गुलज़ार साहब की नज़्मों की नयी किताब ‘पाजी नज़्में’ लगभग एक महीना पहले आयी है, उसी किताब से पाँच खूबसूरत नज्में यहाँ प्रस्तुत हैं। पढ़ते समय यह कल्पना कि इन नज़्मों का पाठ गुलज़ार साहब Read more…

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कुछ हादसे प्रेम के दरमियान भी होते हैं..

पंखुरी सिन्हा की पाँच कविताएँ परिचय: पंखुरी सिन्हा कवि और कहानीकार हैं और इनकी कहानी व कविताओं की हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। पंखुरी का नवीनतम कविता संग्रह ‘बहस पार Read more…

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हरिवंशराय बच्चन की पहली और अन्तिम कविता

यह जानना एक आम जिज्ञासा है कि एक कविता लिखते समय किसी कवि के मन में क्या चल रहा होता है! इसके बावजूद कि वह कविता हमारे खुद के मन को एक दर्पण दिखाती हो, Read more…

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कविता: ‘झेलम’ – आशीष मनचंदा

प्रेम, भरोसा, समर्पण.. ये सारे शब्द एक ऐसी गुत्थी में उलझे रहते हैं कि किसी एक की डोर खिंचे तो तनाव दूसरों में भी पैदा होता है। बिना प्रेम भरोसा नहीं, बिना भरोसे समर्पण नहीं। Read more…

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नज़्म: ‘गर्ल्स कॉलेज की लारी’ – जाँ निसार अख़्तर

“‘गर्ल्स कॉलेज की लारी’ जाँ निसार अख़्तर की पहली नज़्म है जिसने उन्हें ख्याति की सीढ़ी पर ला खड़ा किया। यह एक वर्णात्मक (Narrative) नज़्म थी और जाँ निसार अख़्तर के कथनानुसार ‘जवानी की एक Read more…

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बांके दयाल की कविता ‘पगड़ी सम्भाल जट्टा’

भगत सिंह पर आधारित फिल्मों में अक्सर आने वाला यह गीत ‘पगड़ी सम्भाल जट्टा’ असल में बांके दयाल जी की एक कविता है जो अंग्रेजों के खिलाफ हो रहे एक आन्दोलन के दौरान सुनायी गयी Read more…

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प्रेम की एक कविता ताल्लुक़ के कई सालों का दस्तावेज़ है

त्याग, समर्पण और यहाँ तक कि अनकंडीशनल लव भी प्रेम में पुरानी बातें हैं। और पुरानी इसलिए क्योंकि जब भी किसी ने इन शब्दों को इनके शाब्दिक अर्थों में ही साधना चाहा, हमेशा प्रेम हारा Read more…

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बनारस का कोई मजाकिया ब्राह्मण लगता हूँ – आदर्श भूषण

आज कुछ सत्य कहता हूँ, ईर्ष्या होती है थोड़ी बहुत, थोड़ी नहीं, बहुत। लोग मित्रों के साथ, झुंडों में या युगल, चित्रों से, मुखपत्र सजा रहें हैं.. ऐसा मेरा कोई मित्र नहीं। कुछ महिला मित्रों Read more…

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कविता जंगलों में गश्त लगाता हुआ चौकीदार है..

जीवन में कविता का उद्देश्य सदियों से ढूँढा जाता रहा है, और कविता में जीवन का अस्तित्व भी। कभी कोई कविता यह कहकर खारिज कर दी गयी कि उसने मानवीय अनुभूतियों को अपने अंदर नहीं Read more…

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बिल्क़ीस ज़फ़िरुल हसन की नज़्म ‘मैं’

‘मैं’ – बिल्क़ीस ज़फ़िरुल हसन कोई गिला तुझसे शिकायत कुछ नहीं है तेरी ही तरह मैंने भी लिखे हैं ऐसे अफ़साने निहायत पाक-तीनत1, बेख़ता मासूम करैक्टर तराशे फिर उनको दर्द, नाकामी, ग़म व हसरत सज़ाएँ और Read more…

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कविता: कैसे रहे सभ्य तुम इतने दिनों.. – पुनीत कुसुम

राहुल द्रविड़। एक ऐसा खिलाड़ी जिसने खेल को एक जंग समझा और फिर भी जंग में सब जायज़ होने को नकार दिया। एक ऐसा साथी जिसने अपने साथियों को खुद से हमेशा आगे रखा। एक Read more…

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कविता: ‘इस बार बसन्त के आते ही’ – पुनीत कुसुम

इस बार बसन्त के आते ही मैं पेड़ बनूँगा एक बूढ़ा और पुरवा के कान में फिर जाकर धीरे से बोलूँगा- “शरद ने देखो इस बारी अच्छे से अपना काम किया जर्जर सूखे जो पत्ते Read more…

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तसनीफ़ हैदर – मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 4

(1) एक शाम सिर्फ़ अँधेरे से सजाई जाये हवाएं दबे पाऊँ आकर स्लाइडिंग की दराज़ों में बैठ जाएँ तुम्हारी पिंडिलयों पर मेरे पैर का अंगूठा लिख रहा हो रात का सियाह गुदाज़ लफ़्ज़ तुम्हारी दाईं Read more…

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तसनीफ़ हैदर – मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 3

(1) तुम मुझसे नाराज़ न होना मैंने अपने दिल पन्नों पर हर्फ़ लिखा है ख़्वाबों वाला इस जंगल से गुज़र रहा है इक आसेब सराबों वाला नींद नगर मीनारों वाले, याद महल मेहराबों वाला सब Read more…

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तसनीफ़ हैदर – मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 2

(1) ये बर्फ़ की तरह ठंडा हाथ अपनी तासीर में बर्फ़ की सफ़ेद परत के नीचे रेंगते आतिशीं अज़दहे की तरह गर्म है इस हाथ को मेरे सीने पर रख कर देखो एक तिलिस्मी ग़ार Read more…

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तसनीफ़ हैदर – मोहब्बत की नज़्में (पहला दौर) – 1

दुनिया में जब पहली बार किसी ने मोहब्बत की होगी तो उस मोहब्बत का इज़हार शायरी में ना हुआ होगा, यह बात मन को नहीं भाती। बातों ने मिसरों का रूप न लिया होगा, लफ़्ज़ Read more…

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कविता: मैं समर अवशेष हूँ – पूजा शाह

‘कुरुक्षेत्र’ कविता और ‘अँधा युग’ व् ‘ताम्बे के कीड़े’ जैसे नाटक जिस बात को अलग-अलग शैलियों और शब्दों में दोहराते हैं, वहीं एक दोस्त की यह कविता भी उन लोगों का मुँह ताकती है जो Read more…

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कविता: ‘तमाशा’ – पुनीत कुसुम

उन्मादकता की शुरुआत हो जैसे जैसे खुलते और बंद दरवाज़ों में खुद को गले लगाना हो जैसे कोनों में दबा बैठा भय आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए जैसे वो सत्य जिसे झुठलाने की Read more…

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“शदायी केह्न्दे ने” – रमेश पठानिया की कविताएँ

आधुनिक युग का आदमियत पर जो सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है वो है इंसान से उसकी सहजता छीन लेना। थोपे हुए व्यवसाए हों या आगे बढ़ जाने की दौड़, हम जाने किन-किन माध्यमों का प्रयोग Read more…

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अनुवाद | Translation

कविता: ‘स्वयं हेतु’ – रिया जैन

रिया अंग्रेज़ी कविताएँ लिखती हैं और अपनी उम्र की भावनाएँ और असमंजस बड़े सुलझे हुए शब्दों में उकेरती हैं। मैंने यह कविता रिया के ब्लॉग The Scribbling Girl पर पढ़ी थी और चूंकि हिन्दी में ज़्यादा Read more…

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कविता: ‘कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ’ – पुनीत कुसुम

तुम कहती हो “कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ” मगर, क्यों मान लेती हो? आख़िर, क्यों मान लेती हो? पृथ्वी तो नहीं मानती अपने गुरुत्व को जब तक कोई ज़मीन से अपनी Read more…

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कुँवर नारायण: अबकी बार लौटा तो..

लेखक लक्ष्मण राव को एक वीडियो में कहते सुना था कि कोई कवि या लेखक पचास वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद जन्मता है और उसकी ज़िन्दगी उसकी मृत्यु के बाद शुरू होती है। Read more…

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कविता: ‘खजूर बेचता हूँ’ – पुनीत कुसुम

न सीने पर हैं तमगे न हाथों में कलम है न कंठ में है वीणा न थिरकते कदम हैं इस शहर को छोड़कर जिसमें घर है मेरा उस ग़ैर मुल्क जाके लोगों के मुँह देखता Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविताएँ | Poetry

छायावाद का बह चला ‘झरना’

कोई भी बहुत लम्बे समय तक केवल मनोरंजन के लिए कविताएँ नहीं सुन सकता। चाहे कविताओं के विषय हों या कवि की कथन-शैली, एक पाठक कहीं न कहीं खुद को उन कविताओं में ढूँढने लगता Read more…

By Posham Pa, ago
कविताएँ | Poetry

कविता: ‘पथिक’ – आदर्श भूषण

चलते चलते रुक जाओगे किसी दिन, पथिक हो तुम, थकना तुम्हारे न धर्म में है; ना ही कर्म में, उस दिन तिमिर जो अस्तित्व को, अपनी परिमिति में घेरने लगेगा, छटपटाने लगोगे, खोजना चाहोगे, लेकिन Read more…

By Posham Pa, ago
कविताएँ | Poetry

‘कविता’ पर कविताएँ

जब कविताएँ पढ़ते या लिखते हुए कुछ समय बीत जाता है तो कोई भी पाठक या कविता-प्रेमी अनायास ही कभी-कभी कुछ ऐसे सवालों में खोने लगता है जिनका कोई एक नियत जवाब नहीं हो सकता। Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविताएँ | Poetry

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रेम कविताएँ

अमूमन रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का नाम आते ही जो पंक्तियाँ किसी भी कविता प्रेमी की ज़बान पर आती हैं, वे या तो ‘कुरुक्षेत्र’ की ये पंक्तियाँ होती हैं- “वह कौन रोता है वहाँ- इतिहास के Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविताएँ | Poetry

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का जूता, मोजा, दस्ताने, स्वेटर और कोट

आप सोच रहे होंगें कि मैं सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कपड़ों की अलमारी क्यों खोलकर बैठा हूँ। लेकिन आप ग़लत सोच रहे हैं। ये सब चीज़ें उनकी कपड़ों की अलमारी से नहीं, उनके कविता संग्रह ‘खूटियों पर Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविताएँ | Poetry

कविता: ‘फुलझड़ी’ – पुनीत कुसुम

एक समस्या मुँह खोले खड़ी है वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है? है बदन ज्यों चन्द्रमा और थोड़ा काँच हो रेत से लिपटे हो दोनों और थोड़ी आँच हो एक वृत फिर आतिशों Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविताएँ | Poetry

कविता: ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ – शिवा

मेरे दिल की सतह पर टार जम गया है साँस खींचती हूँ तो खिंची चली आती है कई टूटे तारों की राख ना जाने कितने अरमान निगल गयी हूँ साँस छोड़ती हूँ तो बढ़ने लगता Read more…

By Shiva, ago
कविताएँ | Poetry

कविता: ‘राधा-कृष्ण’ – शिवा & पुनीत कुसुम

Puneet- हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे हे राधे, हे राधे कान्हा ढूँढ रहा तुझे राधे ऊपर नभ् को खोल खोल कर धरती के भीतर टटोल कर स्वर्ग, नरक और पातालों में जीव-मरण Read more…

By Shiva, ago
कविताएँ | Poetry

कविता: एक पेड़ – पुनीत कुसुम

[पापा के लिए] एक पेड़ मेरी क्षमता में जिसका केवल ज़िक्र करना भर है जिसे उपमेय और उपमान में बाँधने की न मेरी इच्छा है, न ही सामर्थ्य एक पेड़ जिसे हमेशा विशाल और घना Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविताएँ | Poetry

कविता: एक्सट्रा चीज़! – शिवा & पुनीत कुसुम

Shiva- कभी आँखों से लिख दो कुछ मेरी आखों पर कि हया की हर झुकी नज़र का गुनेहगार तुम्हारा ज़िक्र हो और दुआ में उठी पलकें वहां ऊपर भी तुम्हें ही पायें Puneet- तुम आँखों Read more…

By Shiva, ago

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