ग़ज़ल | Ghazal

ग़ज़ल: ‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल’ – अमीर ख़ुसरो

‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल’ – अमीर ख़ुसरो ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ शाबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़ ओ रोज़-ए-वसलत चूँ उम्र-ए-कोताह सखी पिया को जो Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘सूर्योदय की प्रतीक्षा में’ – कुँवर नारायण

‘सूर्योदय की प्रतीक्षा में’ – कुँवर नारायण वे सूर्योदय की प्रतीक्षा में पश्चिम की ओर मुॅंह करके खड़े थे दूसरे दिन जब सूर्योदय हुआ तब भी वे पश्चिम की ओर मुॅंह करके खड़े थे जबकि Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ – शिवा

‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ – शिवा मेरे दिल की सतह पर टार जम गया है साँस खींचती हूँ तो खिंची चली आती है कई टूटे तारों की राख जाने कितने अरमान निगल गयी हूँ साँस छोड़ती हूँ Read more…

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ग़ज़ल | Ghazal

ग़ज़ल: सूफ़ियों में हूँ न रिन्‍दों में, न मयख़्वारों में हूँ – बहादुर शाह ज़फ़र

सूफ़ियों में हूँ न रिन्‍दों में, न मयख़्वारों में हूँ सूफ़ियों में हूँ न रिन्‍दों में, न मयख़्वारों में हूँ, ऐ बुतो, बन्‍दा ख़ुदा का हूँ, गुनहगारों में हूँ! मेरी मिल्‍लत है मुहब्‍बत, मेरा मज़हब Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘प्रेमपत्र’ – बद्रीनारायण

‘प्रेमपत्र’ – बद्रीनारायण प्रेत आएगा किताब से निकाल ले जायेगा प्रेमपत्र गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खायेगा चोर आयेगा तो प्रेमपत्र ही चुरायेगा जुआरी प्रेमपत्र ही दाँव लगाएगा ऋषि आयेंगे तो दान में माँगेंगे प्रेमपत्र Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘लड़की’ (क़ंदील बलोच के नाम) – सोफ़िया नाज़

नज़्म: ‘लड़की’ – सोफ़िया नाज़ (क़ंदील बलोच के नाम) पतले नंगे तार से लटकी जलती, बुझती, बटती वो लड़की जो तुम्हारी धमकी से नहीं डरती वो लड़की जिसकी मांग टेढ़ी है अंधी तन्क़ीद की कंघी से Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘शून्य’ – गजानन माधव मुक्तिबोध

‘शून्य’ – गजानन माधव मुक्तिबोध भीतर जो शून्य है उसका एक जबड़ा है जबड़े में मांस काट खाने के दाँत हैं; उनको खा जाएँगे, तुमको खा जाएँगे। भीतर का आदतन क्रोधी अभाव वह हमारा स्वभाव Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘कहीं कभी’ – भुवनेश्वर

‘कहीं कभी’ – भुवनेश्वर कहीं कभी सितारे अपने आपकी आवाज पा लेते हैं और आसपास उन्हें गुजरते छू लेते हैं… कहीं कभी रात घुल जाती है और मेरे जिगर के लाल-लाल गहरे रंग को छू Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘क्या करूँ’ – यासमीन हमीद

‘क्या करूँ’ – यासमीन हमीद क्या करूँ मैं आसमां को अपनी मुट्ठी में पकड़ लूँ या समुन्दर पर चलूँ पेड़ के पत्ते गिनूँ या टहनियों में जज़्ब होते ओस के क़तरे चुनूं डूबते सूरज को उंगली Read more…

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ग़ज़ल | Ghazal

इन्‍क़िलाब आया, नई दुन्‍या, नया हंगामा है

इन्‍क़िलाब आया, नई दुन्‍या, नया हंगामा है इन्‍क़िलाब आया, नई दुन्‍या, नया हंगामा है शाहनामा हो चुका, अब दौरे गांधीनामा है। दीद के क़ाबिल अब उस उल्‍लू का फ़ख्रो नाज़ है जिस से मग़रिब ने Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘कड़वा सत्य’ – विष्णु प्रभाकर

‘कड़वा सत्य’ – विष्णु प्रभाकर एक लंबी मेज दूसरी लंबी मेज तीसरी लंबी मेज दजीवारों से सटी पारदर्शी शीशेवाली अलमारियाँ मेजों के दोनों ओर बैठे हैं व्यक्ति पुरुष-स्त्रियाँ युवक-युवतियाँ बूढ़े-बूढ़ियाँ सब प्रसन्न हैं कम-से-कम अभिनय Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘रोटी’ – आकांक्षा गौड़

‘रोटी’ – आकांक्षा गौड़ रोज़ सवेरे ऑफिस जाते वक़्त ट्रैफिक की लाल बत्ती पर गाड़ी रुकती थी रोज़ देखती थी मैं उस भीड़ में ज़िन्दगी से ज़द्दोज़हद करते लोगों को कहीं ऑटो के लिए भागते Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘ओ देस से आने वाले बता’ – अख़्तर शीरानी

‘ओ देस से आने वाले बता’ – अख़्तर शीरानी ओ देस से आने वाले बता किस हाल में हैं यारान-ए-वतन आवारा-ए-ग़ुर्बत को भी सुना किस रंग में है कनआन-ए-वतन वो बाग़-ए-वतन फ़िरदौस-ए-वतन वो सर्व-ए-वतन रैहान-ए-वतन Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘जब सोच रही थी मैं एक नज़्म’ – तनवीर अंजुम

नज़्म: ‘जब सोच रही थी मैं एक नज़्म’ – तनवीर अंजुम जब सोच रही थी मैं एक नज़्म वो निकल गई बराबर से नाराज़गी से मुझे देखती तवज्जोह नहीं दे सकी मैं उनकी दानिश-मंदाना बातों पर Read more…

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कविताएँ | Poetry

विजय गुँजन के हाइकु

विजय गुँजन के हाइकु डॉ विजय श्रीवास्तव लवली प्रोफेशनल यूनिवसिर्टी में अर्थशास्त्र विभाग में सहायक आचार्य है। आप गांधीवादी विचारों में शोध की गहन रूचि रखते हैं और कई मंचों पर गांधीवादी विचारों पर अपने Read more…

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कविताएँ | Poetry

भोपाल में थोड़ा-थोड़ा कितना कुछ है।

भोपाल पर गौरव ‘अदीब’ की एक कविता भोपाल में थोड़ा-थोड़ा कितना कुछ है भोपाल में बहुत सारा लख़नऊ है यहाँ ऐशबाग है, हमीदिया रोड है यहाँ पुलिया है और कैसरबाग सा छत्ता भी नदवा की Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘दो ज़िंदगियाँ’ – अज़रा अब्बास

नज़्म: ‘दो ज़िंदगियाँ’ – अज़रा अब्बास हम दो ज़िंदगियां जी रहे हैं एक वो जो तुम देख रहे हो हमें अच्छे कपड़े पहन कर घूमते हुए हंसते मुस्कुराते हुए एक वो, जो हम सह रहे हैं Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘बोल! अरी ओ धरती बोल!’ – मजाज़ लखनवी

‘बोल! अरी ओ धरती बोल!’ – मजाज़ लखनवी बोल! अरी ओ धरती बोल! राज सिंघासन डाँवाडोल बादल बिजली रैन अँधयारी दुख की मारी प्रजा सारी बूढ़े बच्चे सब दुखिया हैं दुखिया नर हैं दुखिया नारी Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘फूल और काँटा’ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

‘फूल और काँटा’ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ हैं जन्म लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता। मेह Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘सिंड्रेला’ – गौरी चुघ

‘सिंड्रेला’ – गौरी चुघ सुनो लड़की! इस बार कोयले की राख को पेशानी पर रगड़ लेना हालात की सौतेली बहनों से समझौता तुम कर लेना नहीं आएगी परी कोई तुम्हारा मुस्तक़बिल बदलने को कोई घोड़ागाड़ी Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘देखेगा कौन?’ – शंभुनाथ सिंह

‘देखेगा कौन?’ – शंभुनाथ सिंह बगिया में नाचेगा मोर, देखेगा कौन? तुम बिन ओ मेरे चितचोर, देखेगा कौन? नदिया का यह नीला जल, रेतीला घाट, झाऊ की झुरमुट के बीच, यह सूनी बाट, रह-रह कर Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘मेघदूत’ – फ़हमीदा रियाज़

‘मेघदूत’ – फ़हमीदा रियाज़ सनसनाहटों के साथ गड़गड़ाहटो के साथ आ गया पवन रथ पे बैठ कर मेरा मेघ देवता दोश पर हवाओं के बाल उड़ाता हुआ उसका जामुनी बदन आसमाँ पे छा गया दूर तक Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘रतजगों का ज़वाल’ – शहरयार

‘रतजगों का ज़वाल’ – शहरयार वो अँधेरी रात की चाप थी जो गुज़र गई कभी खिड़कियों पे न झुक सकी किसी रास्ते में न रुक सकी उसे जाने किस की तलाश थी मिरी आँख ओस Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘ईद मुबारक’ – केदारनाथ अग्रवाल

‘ईद मुबारक’ – केदारनाथ अग्रवाल हमको, तुमको, एक-दूसरे की बाहों में बँध जाने की ईद मुबारक। बँधे-बँधे, रह एक वृंत पर, खोल-खोल कर प्रिय पंखुरियाँ कमल-कमल-सा खिल जाने की, रूप-रंग से मुसकाने की हमको, तुमको Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘ये वो धरती नहीं है’ – गुलनाज़ कौसर

‘ये वो धरती नहीं है’ – गुलनाज़ कौसर नहीं ये वो धरती नहीं है नहीं ये वो धरती नहीं है जहां मेरा बचपन मेरा तितलीयों, फूलों, रंगों से लबरेज़ बचपन किसी शाहज़ादी की रंगीं कहानी की Read more…

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कविताएँ | Poetry

इब्ने इंशा के कवित्त

इब्ने इंशा के कवित्त (1) जले तो जलाओ गोरी, पीत का अलाव गोरी अभी न बुझाओ गोरी, अभी से बुझाओ ना। पीत में बिजोग भी है, कामना का सोग भी है पीत बुरा रोग भी Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ – इब्ने इंशा

‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ – इब्ने इंशा हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘क़ैद में रक़्स’ – किश्वर नाहीद

‘क़ैद में रक़्स’ – किश्वर नाहीद सब के लिए ना-पसंदीदा उड़ती मक्खी कितनी आज़ादी से मेरे मुँह और मेरे हाथों पर बैठती है और इस रोज़-मर्रा से आज़ाद है जिस में मैं क़ैद हूँ मैं तो Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘आँखों की धुंध में’ – भुवनेश्वर

‘आँखों की धुंध में’ – भुवनेश्वर आँखों की धुंध में उड़ती-सी अफवाह का एक अजब मजाक है यह पिघलते हुए दिल और नमाई हुई रोटी का हीरा तो खान में एक प्यारा-सा फसाना है किसी Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘एक पुरानी कहानी’ – ज़हरा निगाह

‘एक पुरानी कहानी’ – ज़हरा निगाह किसी शहर में इक कफ़न चोर आया जो रातों को क़ब्रों में सूराख़ करके तन ए कुश्तगां से कफ़न खींच लेता आख़िर ए कार पकड़ा गया और उसको मुनासिब सज़ा Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘मैंने आहुति बन कर देखा’ – अज्ञेय

‘मैंने आहुति बन कर देखा’ – अज्ञेय मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा Read more…

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कविताएँ | Poetry

अंकिता वर्मा की कविताएँ

अंकिता वर्मा की कविताएँ अंकिता वर्मा हिमाचल के प्यारे शहर शिमला से हैं। तीन सालों से चंडीगढ़ में रहकर एक टेक्सटाइल फर्म में बतौर मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव काम कर रही थीं, फिलहाल नौकरी छोड़ कर किताबें पढ़ रही हैं, Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘ठाकुर का कुआँ’ – ओमप्रकाश वाल्मीकि

‘ठाकुर का कुआँ’ – ओमप्रकाश वाल्मीकि चूल्‍हा मिट्टी का मिट्टी तालाब की तालाब ठाकुर का भूख रोटी की रोटी बाजरे की बाजरा खेत का खेत ठाकुर का बैल ठाकुर का हल ठाकुर का हल की Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘बिजली फेल होने पर’ – बेढब बनारसी

‘बिजली फेल होने पर’ – बेढब बनारसी फेल बिजली हो गयी है रात मेरे ही भवन में आज आकर खो गयी है आ रही थीं वह लिए थाली मुझे भोजन खिलाने मैं उसी दम था Read more…

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कविता: ‘ओ अपाहिज आस्थाओं’ – हरीश भादानी

‘ओ अपाहिज आस्थाओं’ – हरीश भादानी ओ अपाहिज आस्थाओ! घुटन-कुण्ठा-अहम् भुभुक्षा की चौकोर शैयां पर लेटी रहो- चीखो नहीं, यह नहीं होगा कि- मैं तुम पर दया करने तुम्हारे पायताने लौट आऊँ, जीव हत्या के Read more…

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कविताएँ | Poetry

मैं क़सम खाता हूँ कि बग़ैर किसी क़सम के तुम्हें प्रेम करूँगा।

अनुराग तिवारी की कविताएँ अनुराग तिवारी ने ऐग्रिकल्चरल एंजिनीरिंग की पढ़ाई की, लगभग 11 साल विभिन्न संस्थाओं में काम किया और उसके बाद ख़ुद का व्यवसाय भोपाल में रहकर करते हैं। बीते 10 सालों में Read more…

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ग़ज़ल | Ghazal

‘तराना-ए-बिस्मिल’ – राम प्रसाद बिस्मिल

‘तराना-ए-बिस्मिल’ – राम प्रसाद बिस्मिल बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से, लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से। लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी, तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी Read more…

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कविताएँ | Poetry

‘छाप तिलक सब छीनी’ – अमीर खुसरो 

‘छाप तिलक सब छीनी’ – अमीर खुसरो  अपनी छवि बनाइ के जो मैं पी के पास गई, जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई। छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइ के Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘युधिष्ठिर’ – अम्बर बहराईची

‘युधिष्ठिर’ – अम्बर बहराईची अभी चीड़ के जंगलों से गुज़रना बहुत जाँ-फ़ज़ा है कई मील के बाद बर्फ़ीले तूदों का सहरा मिलेगा जहाँ सर्द पुरवाइयों के थपेड़े थिरकते मिलेंगे उमूदी ढलानों का इक सिलसिला भी Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘व्याकुल चाह’ – सुभद्राकुमारी चौहान

‘व्याकुल चाह’ – सुभद्राकुमारी चौहान सोया था संयोग उसे किस लिए जगाने आए हो? क्या मेरे अधीर यौवन की प्यास बुझाने आए हो?? रहने दो, रहने दो, फिर से जाग उठेगा वह अनुराग। बूँद-बूँद से Read more…

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ग़ज़ल | Ghazal

ग़ज़ल: ‘टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली’ – मीना कुमारी

‘टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली’ – मीना कुमारी टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी आँखें हँस दीं Read more…

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कविताएँ | Poetry

‘उर्दू का स्यापा’ – भारतेंदु हरिश्चंद्र

‘उर्दू का स्यापा’ – भारतेंदु हरिश्चंद्र अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट और बनारस अखबार के देखने से ज्ञात हुआ कि बीबी उर्दू मारी गई और परम अहिंसानिष्ठ होकर भी राजा शिवप्रसाद ने यह हिंसा की– हाय हाय! Read more…

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नज़्में | Nazmein

नज़्म: ‘खंडर’ – शमीम करहानी

‘खंडर’ – शमीम करहानी इसी उदास खंडर के उदास टीले पर जहाँ पड़े हैं नुकीले से सुरमई कंकर जहाँ की ख़ाक पे शबनम के हार बिखरे हैं शफ़क़ की नर्म किरन जिस पे झिलमिलाती है Read more…

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ग़ज़ल | Ghazal

ग़ज़ल: ‘क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं’ – बहादुर शाह ज़फ़र

‘क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं’ – बहादुर शाह ज़फ़र क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं जो यह कहते हैं सुना है, पर ख़ुदा देखा नहीं ख़ौफ़ है रोज़े-क़यामत का Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘निष्ठा’ – रेनर मरिया रिल्के 

कविता: ‘निष्ठा’ – रेनर मरिया रिल्के  (‘Extinguish My Eyes’ का अनुवाद, धर्मवीर भारती द्वारा) मेरी आँखें निकाल दो फिर भी मैं तुम्हें देख लूँगा मेरे कानों में सीसा उड़ेल दो पर तुम्हारी आवाज़ मुझ तक पहुँचेगी Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘एक बूँद’ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

‘एक बूँद’ – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी सोचने फिर-फिर यही जी में लगी, आह! क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी? देव Read more…

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कविताएँ | Poetry

ज्योति शोभा की कविताएँ

ज्योति शोभा की कविताएँ सजग पाठिका एवम सदैव साहित्य सृजन में उन्मुख ज्योति शोभा अंग्रेजी साहित्य में स्नातक हैं। ‘बिखरे किस्से’ संग्रह के अतिरिक्त इनकी कई कविताएं राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं।  प्रेम, Read more…

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कविताएँ | Poetry

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ

कविता: ‘मैं तुम्हें प्यार करता हूँ’ – एरिश फ्रीड  अनुवाद – प्रतिभा उपाध्याय मैं तुम्हें प्यार करता हूँ इसलिए नहीं कि तुम ऐसी हो अपितु इसलिए कि मैं ऐसा बन जाता हूँ जब मैं तुम्हारे साथ Read more…

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कविताएँ | Poetry

धृतराष्ट्रों की आँखें फूट चुकी थीं..

उड़िया कविता: ‘युद्ध’ – शत्रुघ्न पाण्डव कुरुक्षेत्र से कुवैत तक धृतराष्ट्रों की आँखें फूट चुकी थीं रक्त में जल रहा था अहंकार घायल किए बिना नहीं लौटता कोई भी अस्त्र एक-एक अजातशत्रु आपस में जूझ रहे Read more…

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कविताएँ | Poetry

कल मैं एक महाग्रन्थ प्रारम्भ करने वाला हूँ

कन्नड़ कविता: ‘कल का ग्रन्थ’ – रामचन्द्र देव अनुवाद: बी. आर. नारायण कल मैं एक महाग्रन्थ प्रारम्भ करने वाला हूँ नेस्ट्रोडमस के ग्रन्थ जैसा आगे किस शताब्दी में कहाँ और किस गाँव में पड़ेगा अकाल, Read more…

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कविताएँ | Poetry

कन्नड़ कविता: ‘रोकना है न!’ – पी. एस. रामानुजम्

‘रोकना है न!’ – पी. एस. रामानुजम् (रूपान्तर: बी. आर. नारायण) कितनी बसी है रक्त की बास इस धरती में कितने लोग मरे, कितने लोग रोये दुर्दैव है यह, आश्चर्य है यह तब भी धरती Read more…

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कविताएँ | Poetry

इस धरती को तुम थोड़ा-थोड़ा कर ही सही समझना तो शुरू करो।

बांग्ला कविता: ‘हिमशिला’ – विप्लव माझी मैं चाहता हूँ इस धरती को तुम थोड़ा-थोड़ा कर ही सही समझना तो शुरू करो। तुम खुद अपनी आँखों से देखो किस तरह खण्डहर में तब्दील हो गये हैं Read more…

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सिन्धी कविता: ‘कौन है’ – नामदेव

‘कौन है’ – नामदेव कौन है जो बन्दूक की नली से गुलाब को घायल कर रहा है? कौन है जो बन्सरी की चोट से किसी का सर फोड़ रहा है? कौन है जो बाल-मन्दिर की Read more…

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नज़्म: ‘रस की अनोखी लहरें’ – मीराजी

‘रस की अनोखी लहरें’ – मीराजी मैं ये चाहती हूँ कि दुनिया की आँखें मुझे देखती जाएँ यूँ देखती जाएँ जैसे कोई पेड़ की नर्म टहनी को देखे लचकती हुई नर्म टहनी को देखे मगर Read more…

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ख्यालों को बहने दो, बनके नदिया..

मुदित श्रीवास्तव की कविताएँ मुदित श्रीवास्तव भोपाल में रहते हैं। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और कॉलेज में सहायक प्राध्यापक भी रहे हैं। साहित्य से लगाव के कारण बाल पत्रिका ‘इकतारा’ से जुड़े Read more…

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कविताएँ | Poetry

इस बार जीवित रहे तो…

कविता: ‘इस बार जीवित रहे तो’ – जसबीरसिंह आहलूवालिया यदि इस बार सावन आया यदि जमकर बादल बरसे यदि रिमझिम-रिमझिम हो गयी कोई भीगा मन तक आया काग़ज़ की कश्तियों को तुम्हारी और अपनी को Read more…

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कविता: ‘चौराहे पर घर’ – नन्द जवेरी

‘चौराहे पर घर’ – नन्द जवेरी अनुवाद: श्याम जयसिंघाणी कल तक मेरा घर एक चौराहे पर था पर आज सवेरे घर के बाहर लठधर चौकीदार की जगह बन्दूकधारी जवान तैनात था और चौराहा गुम था। Read more…

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कविताएँ | Poetry

‘देर से, बहुत देर से बतानी चाहिए जाने की ख़बर!!’ – गौरव अदीब की नयी कविताएँ

गौरव अदीब की कुछ नयी कविताएँ गौरव सक्सेना ‘अदीब’ बतौर स्पेशल एजुकेटर इंटरनेशनल स्कूल में कार्यरत हैं और थिएटर व शायरी में विशेष रुचि रखते हैं। दस वर्षों से विभिन्न विधाओं में लेखन के साथ-साथ Read more…

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कविता: ‘अब माँ शांत है!’ – शिवा

‘अब माँ शांत है!’ – शिवा मुझे लोगों पर बहुत प्यार आया ज़रा संकोच न हुआ मैंने प्यार बरसा दिया अब मन शांत है मुझे लोगों पर बहुत गुस्सा आया ज़रा संकोच हुआ मैंने माँ Read more…

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‘जेठ’ पर हाइकु

‘जेठ’ पर हाइकु जेठ (ज्येष्ठ) हिन्दू पंचांग के अनुसार साल का तीसरा महीना होता है और इस माह को गर्मी का महीना भी कहा जाता है। आई. आई. टी. रुड़की में कार्यरत रमाकांत जी ने Read more…

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विशेष चंद्र ‘नमन’ की कविताएँ

विशेष चंद्र नमन दिल्ली विवि, श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में तृतीय वर्ष, स्नातक (गणित) में अध्ययनरत हैं। गुज़रे तीन वर्षों में कॉलेज के दिनों में साहित्यिक रुचि खूब जागी, नया पढ़ने का मौका Read more…

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कविताएँ | Poetry

बालकवि बैरागी की बाल कविताएँ

बालकवि बैरागी की बाल कविताएँ यह केवल पाठकों का ही नहीं, हिन्दी साहित्य का भी दुर्भाग्य है, कि हिन्दी के लेखक और कवियों को भारत का एक बड़ा वर्ग उनके निधन के बाद पढ़ना शुरू Read more…

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कविताएँ | Poetry

जोशना बैनर्जी आडवानी की कविताएँ

आज पोषम पा पर प्रस्तुत हैं जोशना बैनर्जी आडवानी की कुछ कविताएँ। जोशना इन्टर कॉलेज में प्राचार्या हैं और कत्थक व भरतनाट्यम में प्रभाकर कर चुकी हैं। जोशना को कविताएँ लिखना बेहद पसंद है और Read more…

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कविताएँ | Poetry

‘माँ’ के लिए कुछ कविताएँ

‘माँ’ के लिए कुछ कविताएँ ‘माँ’ – मोहनजीत मैं उस मिट्टी में से उगा हूँ जिसमें से माँ लोकगीत चुनती थी हर नज्म लिखने के बाद सोचता हूँ- क्या लिखा है? माँ कहाँ इस तरह Read more…

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कविताएँ | Poetry

‘दरवाज़े गर ज़बान की चिटखनी खोल पाते तो बताते..’ – गौरी चुघ की नज्में

गौरी चुघ स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में एक दशक से ज़्यादा समय से सक्रिय हैं। उन्होंने शिक्षा जगत से जुड़े विभिन्न सरकारी, ग़ैर-सरकारी और निजी संस्थानों में अलग-अलग भूमिकाओं में काम किया है। 2008 में Read more…

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कविताएँ | Poetry

कविता: ‘उत्कृष्टता’ – उदय प्रकाश

‘उत्कृष्टता’ – उदय प्रकाश सुन्दर और उत्कृष्ट कविताएँ धीरे-धीरे ले जाएँगी सत्ता की ओर सूक्ष्म संवेदनाओं और ख़फ़ीफ़ भाषा का कवि देखा जाएगा अत्याचारियों के भोज में शामिल सबसे ज़्यादा स्वादों का बखान करता हुआ Read more…

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कविताएँ | Poetry

क्यों पीछे रह जाएगा युवा होने का अद्भुत आश्चर्य

कविता: ‘अकेले क्यों?’ – अशोक वाजपेयी हम उस यात्रा में अकेले क्यों रह जाएँगे? साथ क्यों नहीं आएगा हमारा बचपन, उसकी आकाश-चढ़ती पतंगें और लकड़ी के छोटे से टुकड़े को हथियार बना कर दिग्विजय करने Read more…

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कविता: ‘पत्ते नीम के’ – कुमार शिव

‘पत्ते नीम के’ – कुमार शिव तालियों से बजे पत्ते नीम के। अनवरत चलती रही थी, थक गयी, तनिक आवे पर ठहर कर पक गयी, अब चढ़ी है हवा हत्थे नीम के। था बहुत कड़वा Read more…

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वह दीवाल के पीछे खड़ी है

कविता: ‘वह दीवाल के पीछे खड़ी है’ – सुदीप बनर्जी वह दीवाल के पीछे खड़ी है दीवाल का वह तरफ़ उसके कमरे में है जिस पर कुछ लिखा है कोयले से कोयले से की गयी Read more…

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कविता: ‘कोशिश’ – इन्दु जैन

कविता: ‘कोशिश’ – इन्दु जैन एक चीख लिखनी थी एक बच्चे की चीख अरबी में, तुर्की में, यिद्दिश में, यैंकीस्तानी में असमिया, हिन्दी, गुरमुखी में चिथड़े उड़े बाप और ऐंठी पड़ी माँ के बीच उठी Read more…

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बलराज साहनी की कविताएँ

बलराज साहनी एक अभिनेता के रूप में ही ज्यादा जाने जाते हैं, जबकि उन्होंने एक साहित्यकार के रूप में भी काफी कार्य किया है। उन्होंने कविताओं और कहानियों से लेकर, नाटक और यात्रा-वृत्तान्त तक लिखे हैं। Read more…

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कविता: ‘समाज’ – पुनीत कुसुम

‘समाज’ – पुनीत कुसुम कल एक प्राणी से मुलाक़ात हुई जब मैंने उससे उसका नाम पूछा तो वह बोला- ‘समाज’ प्राणी इसलिए कहा क्योंकि उसकी शक्ल और हरकतें मानवों से तो नहीं मिलती थीं संवेदनाओं Read more…

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झूठ बोलिए, सच बोलिए, खचाखच बोलिए

कविता: ‘खचाखच बोलिए’ – शिवा बोलिए बोलना ज़रूरी है सुनना, पढ़ना, समझना मूर्खों के लिए छोड़ दीजिए सत्ता की शय से बोलिए चढ़ गयी मय से बोलिए ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ के लिए बोलिए ‘अधिकतम आउटरीच’ Read more…

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सुन्दरता कितना बड़ा कारण है..

कविता: ‘चाहिए’ – नवीन सागर एक बच्ची अपनी गुदगुदी हथेली देखती है और धरती पर मारती है। लार और हँसी से सना उसका चेहरा अभी इतना मुलायम है कि पूरी धरती अपने थूक के फुग्गे Read more…

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कविता: ‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ – आतिफ़ ख़ान

प्रख्यात व्यंग्यकार और शायर इब्ने इंशा की कविता ‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ एक ऐसा काव्य झरना है जिसमें भीगने के बाद उसकी नमी एक अरसे तक आपको महसूस होती है। उसी नमी का Read more…

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उड़ना, उड़ते रहना, उड़ते जाना..

गुजराती कविता: ‘अपना तो’ – मफत ओझा ये सब के सब जैसे-के-तैसे सोफासेट, पलंग, कुर्सी, खिड़कियाँ, दरवाज़े, पर्दे सीलिंगफैन, घड़ी की सुइयाँ- टक-टक और बन्द अँधेरी दीवारों पर टँगा है ईश्वर नश्वर पिता के फोटो Read more…

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तेरे अनन्य प्रतिरूप अपने लिए बनाये हैं मैंने।

उड़िया कविता: ‘प्रतिरूप’ – अपर्णा महान्ति पास नहीं हो इसीलिए न! कल्पना के सारे श्रेष्ठ रंग लगाकर इतने सुन्दर दिख रहे हो आज! विरह की छेनी से ठीक से तराश-तराश कर तमाम अनावश्यक असुन्दरता काट-छाँटकर Read more…

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मराठी कविता: ‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले

‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले (रूपान्तर: प्रकाश भातम्ब्रेकर) खोये हुए बालक-सा प्रजातन्त्र जो माँ-बाप का नाम भी नहीं बता सकता न ही अपना पता और सत्ता भी मानो नीची निगाहों से रास्ता नाप रही पतिव्रता Read more…

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अंकल आई एम तिलोत्तमा!

कविता: ‘पहचान और परवरिश’ – प्रज्ञा मिश्रा कौन है ये? मेरी बिटिया है, इनकी भतीजी है, मट्टू की बहन है, वी पी साहब की वाइफ हैं, शर्मा जी की बहू है। अपने बारे में भी Read more…

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पोर उँगलियों के बंसी टटोलते रहे रात भर..

असमिया कविता: ‘पर्वत के उस पार’ – समीर ताँती पर्वत के उस पार कहीं लो बुझी दीपशिखा इस पार हुआ धूसर नभ उतरे पंछी कुछ अजनबी नौका डूबी… उस पार मगर वो पेड़ ताकता रहा Read more…

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संस्कृत कविता: ‘विवशता’ – सीताराम द्विवेदी

‘विवशता’ – सीताराम द्विवेदी जब जब मैंने, धरती पर, सनी धूल में, शोकालीन लता को चाहा- फिर से डालना बाँहों में वृक्ष की, तभी आँधी के झौंके से धूल भरी- आँखें हो गयीं लाल। थोड़ा Read more…

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के. एल. सहगल की कविता ‘परदेस में रहने वाले आ’

यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि के. एल. सहगल एक कवि/शायर भी थे और निजी महफिलों में वे अपनी कविताएँ/छंद सुनाया भी करते थे, हालांकि ‘मैं बैठी थी फुलवारी में’ के अलावा उन Read more…

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नज़्म: ‘आख़िरी दुआ’ – शहरयार

‘आख़िरी दुआ’ – शहरयार आख़िरी दुआ माँगने को हूँ आसमान पर, रात के सिवा, कुछ नहीं रहा कौन मुट्ठियाँ, रेत से भरे पानियों का रुख, शहर की तरफ़, अब नहीं रहा। कितने मुतमइन लोग आज Read more…

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कविता: ‘गर्मियों की शुरुआत’ – मंगलेश डबराल

‘गर्मियों की शुरुआत’ – मंगलेश डबराल पास के पेड़ एकदम ठूँठ हैं वे हमेशा रहते आए हैं बिना पत्तों के हरे पेड़ काफी दूर दिखाई देते हैं जिनकी जड़ें हैं, जिनकी परछाईं हैं उन्हीं में Read more…

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केदारनाथ अग्रवाल के कविता संग्रह ‘अपूर्वा’ से कविताएँ

केदारनाथ अग्रवाल के कविता संग्रह ‘अपूर्वा’ में उनकी 1968 से 1982 तक की कविताओं का संकलन है। इस कविता संग्रह को इसके प्रकाशित वर्ष में ही साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। बकौल केदारनाथ अग्रवाल- Read more…

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आसान है एक मर्द पाना जिसे तुम प्यार कर सको

कमला दास की पाँच कविताएँ अंग्रेजी और मलयालम की प्रख्यात लेखिका कमला दास अपनी कविताओं के ज़रिए स्त्री विमर्श को आंदोलित करने के लिए जानी जाती हैं। आज अगर भारतीय महिलाओं से जुड़ी समस्याओं पर Read more…

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कन्नड़ कविता: ‘स्टापू’ – ए. के. रामानुजन्

‘स्टापू’ – ए. के. रामानुजन् रूपांतर: बी. आर. नारायण यह चतुरंग नहीं, घर की पिछली गली का स्टापू का खेल है। दोनों टाँगों पर सारी देह सम्भाले एक ख़ाने से दूसरे ख़ाने में फेंकते हैं Read more…

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कुछ लघु काव्य – इन्द्रा वासवाणी

कुछ लघु काव्य – इन्द्रा वासवाणी रूपान्तर: नामदेव एकलव्य की गुरु-दक्षिणा: लटका दो – सर द्रोणाचार्य का युगों तक! दर्द ने मेरा सीना चीर कर मौत को टाल दिया! सिन्धु! तेरे सीने पर छोड़े हैं Read more…

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पंजाबी कविता: ‘पूरा एक साल’ – अम्बरीश

‘पूरा एक साल’ – अम्बरीश मर्तबान में वह भर रही है आम की खट्टी, रसदार, महकती फाँकें और न जाने क्यों भला लगता है मुझे गहरे में कहीं लगता है कि ठीक-ठाक रहेगा आगामी साल Read more…

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कन्नड़ कविता: ‘सती’ – शशिकला वीरय्य स्वामी

‘सती’ – शशिकला वीरय्य स्वामी प्रेम माने क्या है पता है मित्र? मात्र मेरे होंठ, कटि सहलाकर रमना नहीं मात्र बातों का महल बना उसमें दफना देना नहीं। आओ कम-से-कम एक बार भीगो मेरे आँसुओं Read more…

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एक किताब खरीदी जाएगी कविताओं की

‘इस बार’ – कुमार अम्बुज एक किताब खरीदी जाएगी कविताओं की और एक फ्रॉक बिटिया के लिए छेदों वाली साड़ी माँ की दिनचर्या से अलग हो जाएगी एक बिन्दी का पत्ता चुन कर खरीदने का Read more…

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तेलुगु कविता: ‘अक्षय अक्षर’ – मद्दूरू श्रीनिवासुलु

‘अक्षय अक्षर’ – मद्दूरू श्रीनिवासुलु अनुवाद: डॉ. एस. ए. सूर्यनारायण शर्मा अक्षर उपजता है बीज-सा, शब्द-टहनियों में पल्लवित होता है कोंपल-सा, खिल उठता है फूल-सा। अक्षर गूँज उठता है मृदंग नाद-सा, जनता के मुक्तकंठ से Read more…

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नज़्म: ‘आख़री सच’ – निदा फाज़ली

‘आख़री सच’ – निदा फाज़ली वही है ज़िन्दा गरजते बादल सुलगते सूरज छलकती नदियों के साथ है जो ख़ुद अपने पैरों की धूप है जो ख़ुद अपनी पलकों की रात है जो बुज़ुर्ग सच्चाइयों की Read more…

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बांग्ला कविता ‘माँ और बेटी’ – जय गोस्वामी

जय गोस्वामी बंगाल के विख्यात साहित्यकार व कवि हैं। सन 2000 में जय को उनके कविता संग्रह ‘पागली तोमार संगे’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आज पोषम पा पर पढ़िए Read more…

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‘खटमलों की फ़रियाद’ – ‘तालिब’ ख़ुंदमीरी

‘खटमलों की फ़रियाद’ – सैयद महमूद ख़ुंदमीरी ‘तालिब’ एक दिन एक जोंक से कुछ खटमलों ने ये कहा दीजिए ख़ाला हमें भी कोई ऐसा मशवरा अब बजाए खून कोई और ही शै पी सकें आदमी से Read more…

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तुम दिन भर करती क्या हो!

हमारे समाज में सदियों से एक स्त्री को लेकर आम जन की अवधारणाएं और अपेक्षाएं एक कुंठित सोच से घिरी रही हैं। पुरुष वर्ग के द्वारा स्त्री वर्ग की भावनाओं और अधिकारों की अनदेखी हुई Read more…

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मैं तुम्हें बताऊँगा अपनी देह का प्रत्येक मर्मस्थल..

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ प्रयोगवाद के कवि थे और अपने समकालीन कवियों से काफी अलग। उनकी कविताएँ और यहाँ तक कि कहानियाँ भी मनुष्य के बाहरी संघर्षों से साथ-साथ उसके आंतरिक द्वंद्वों को एक मनोवैज्ञानिक Read more…

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महेश नेणवाणी की सिन्धी कविता ‘लाठी’

‘लाठी’ – महेश नेणवाणी जो भगवान को मानता है वह लँगड़ा है और उसे बैसाखियों की ज़रुरत है, जो भगवान को नहीं मानता वह अन्धा है उसे लाठी की ज़रुरत है, आपको तय सिर्फ़ इतना करना Read more…

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घर, माँ, पिता, पत्नी, पुत्र, बंधु! – कुँअर बेचैन की कविताएँ

कुँअर बेचैन हिन्दी की वाचिक परम्परा के प्रख्यात कवि हैं, जो अपनी ग़ज़लों, गीतों व कविताओं के ज़रिए सालों से हिन्दी श्रोताओं के बीच एक खास स्थान रखते आए हैं। शब्दों की गेयता के साथ Read more…

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‘सदा एकांत में मैं सूंघता हूँ उठाकर चंद ढेले..’ – फणीश्वरनाथ रेणु की दो कविताएँ

‘मैला आँचल’ से आँचलिक उपन्यासों की परम्परा की शुरुआत करने वाले तथा ‘तीसरी कसम’ व ‘पंचलैट’ जैसी यादगार कहानियां लिखने वाले फणीश्वरनाथ रेणु अपने उपन्यासों और कहानियों के लिए जाने जाते हैं। आज रेणु की Read more…

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