ग़ज़ल | Ghazal

ग़ज़ल: ‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल’ – अमीर ख़ुसरो

‘ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल’ – अमीर ख़ुसरो ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ शाबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़ ओ रोज़-ए-वसलत चूँ उम्र-ए-कोताह सखी पिया को जो Read more…

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ग़ज़ल: सूफ़ियों में हूँ न रिन्‍दों में, न मयख़्वारों में हूँ – बहादुर शाह ज़फ़र

सूफ़ियों में हूँ न रिन्‍दों में, न मयख़्वारों में हूँ सूफ़ियों में हूँ न रिन्‍दों में, न मयख़्वारों में हूँ, ऐ बुतो, बन्‍दा ख़ुदा का हूँ, गुनहगारों में हूँ! मेरी मिल्‍लत है मुहब्‍बत, मेरा मज़हब Read more…

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इन्‍क़िलाब आया, नई दुन्‍या, नया हंगामा है

इन्‍क़िलाब आया, नई दुन्‍या, नया हंगामा है इन्‍क़िलाब आया, नई दुन्‍या, नया हंगामा है शाहनामा हो चुका, अब दौरे गांधीनामा है। दीद के क़ाबिल अब उस उल्‍लू का फ़ख्रो नाज़ है जिस से मग़रिब ने Read more…

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‘तराना-ए-बिस्मिल’ – राम प्रसाद बिस्मिल

‘तराना-ए-बिस्मिल’ – राम प्रसाद बिस्मिल बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से, लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से। लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी, तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी Read more…

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ग़ज़ल: ‘टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली’ – मीना कुमारी

‘टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली’ – मीना कुमारी टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी आँखें हँस दीं Read more…

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ग़ज़ल: ‘क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं’ – बहादुर शाह ज़फ़र

‘क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं’ – बहादुर शाह ज़फ़र क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं जो यह कहते हैं सुना है, पर ख़ुदा देखा नहीं ख़ौफ़ है रोज़े-क़यामत का Read more…

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