चल दी जी, चल दी

कविता: ‘चल दी जी, चल दी’ – अशोक चक्रधर

मैंने कहा
चलो
उसने कहा
ना
मैंने कहा
तुम्हारे लिए खरीदभर बाज़ार है
उसने कहा
बन्द
मैंने पूछा
क्यों
उसने कहा
मन
मैंने कहा
न लगने की क्या बात है
उसने कहा
बातें करेंगे यहीं
मैंने कहा
नहीं, चलो कहीं
झुंझलाई
क्या-आ है?
मैनें कहा
कुर्ता ख़रीदना है अपने लिए।
चल दी जी, चल दी
वो ख़ुशी-ख़ुशी जल्दी।

■■■

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