चंद्रकांता : पहला भाग – पन्द्रहवाँ बयान

हम पहले यह लिख चुके हैं कि महाराज शिवदत्त के यहाँ जितने ऐयार हैं सभी को तेजसिंह पहचानते हैं। अब तेजसिंह को यह जानने की फिक्र हुई कि उनमें से कौन-कौन चार आए हैं, इसलिए दूसरे दिन शाम के वक्त उन्होंने अपनी सूरत भगवानदत्त की बनाई जिसको तहखाने में बंद कर आए थे और शहर से निकल जंगल में इधर-उधर घूमने लगे, पर कहीं कुछ पता न लगा। बरसात का दिन आ चुका था, रात अँधेरी और बदली छाई थी, आखिर तेजसिंह ने एक टीले पर खड़े होकर जफील बजाई।

थोड़ी देर में तीनों ऐयार मय पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी के उसी जगह पहुँचे और भगवानदत्त को खड़े देखकर बोले – “क्यों जी, तुम नौगढ़ गए थे ना? क्या किया, खाली क्यों चले आए?”

तेजसिंह ने सभी को पहचानने के बाद जवाब दिया – “वहाँ तेजसिंह की बदौलत कोई कार्रवाई न चली, तुम लोगों में से कोई एक आदमी मेरे साथ चले तो काम बने।”

पन्ना – “अच्छा कल हम तुम्हारे साथ चलेंगे, आज चलो महल में कोई कार्रवाई करें।”

तेजसिंह – “अच्छा चलो, मगर मुझको इस वक्त भूख बड़े जोर की लगी है, कुछ खा लूँ तो काम में जी लगे। तुम लोगों के पास कुछ हो तो लाओ।”

जगन्नाथ – “पास में तो जो कुछ है बेहोशी मिला है। बाजार से जाकर कुछ लाओ तो सब कोई खा-पी कर छुट्टी करें।”

भगवान – “अच्छा एक आदमी मेरे साथ चलो।”

पन्नालाल साथ हुए, दोनों शहर की तरफ चले। रास्ते में पन्नालाल ने कहा – “हम लोगों को अपनी सूरत बदल लेना चाहिए क्योंकि तेजसिंह कल से इसी शहर में आया है और हम सभी को पहचानता भी है, शायद घूमता-फिरता कहीं मिल जाए।”

भगवानदत्त ने यह सोचकर कि सूरत बदलेंगे तो रोगन लगाते वक्त शायद यह पहचान ले, जवाब दिया – “कोई जरूरी नहीं, कौन रात को मिलता है?”

भगवानदत्त के इनकार करने से पन्नालाल को शक हो गया और गौर से इनकी सूरत देखने लगा, मगर रात अँधेरी थी पहचान न सका, आखिर को जोर से जफील बजाई। शहर के पास आ चुके थे, ऐयार लोग दूर थे, जफील सुन न सके। तेजसिंह भी समझ गए कि इसको शक हो गया, अब देर करने की कुछ जरूरत नहीं, झट उसके गले में हाथ डाल दिया, पन्नालाल ने भी खंजर निकाल लिया, दोनों में खूब जोर की भिड़ंत हो गई। आखिर को तेजसिंह ने पन्ना को उठा के दे मारा और मुश्कें कस बेहोश कर गठरी बाँध ली तथा पीठ पर लाद शहर की तरफ रवाना हुआ। असली सूरत बनाए डेरे पर पहुँचे। एक कोठरी में पन्नालाल को बंद कर दिया और पहरे वालों को सख्त ताकीद कर आप उसी कोठरी के दरवाजे पर पलँग बिछवा सो रहे, सवेरे पन्नालाल को साथ ले दरबार की तरफ चले।

इधर रामनारायण, बद्रीनाथ और ज्योतिषी जी राह देख रहे थे कि अब दोनों आदमी खाने का सामान लाते होंगे, मगर कुछ नहीं, यहाँ तो मामला ही दूसरा था। उन लोगों को शक हो गया कि कहीं दोनों गिरफ्तार न हो गए हों, मगर यह ख्याल में न आया कि भगवानदत्त असल में दूसरे ही कृपानिधान थे।

उस रात को कुछ न कर सके पर सवेरे सूरत बदलकर खोज में निकले। पहले महाराज जयसिंह के दरबार की तरफ चले, देखा कि तेजसिंह दरबार में जा रहे हैं और उसके पीछे-पीछे दस-पंद्रह सिपाही कैदी की तरह पन्नालाल को लिए चल रहे हैं। उन ऐयारों ने भी साथ-ही-साथ दरबार का रास्ता पकड़ा।

तेजसिंह, पन्नालाल को लिए दरबार में पहुँचे, देखा कचहरी खूब लगी हुई है, महाराज बैठे हैं, वह भी सलाम कर अपनी कुर्सी पर जा बैठे, कैदी को सामने खड़ा कर दिया। महाराज ने पूछा – “क्यों तेजसिंह किसको लाए हो?”

तेजसिंह ने जवाब दिया – “महाराज, उन पाँचों ऐयारों में से जो चुनारगढ़ से आए हैं एक गिरफ्तार हुआ है, इसको सरकार में लाया हूँ। जो इसके लिए मुनासिब हो, हुक्म किया जाए।”

महाराज गौर के साथ खुशी भरी निगाहों से उसकी तरफ देखने लगे और पूछा – “तेरा नाम क्या है?”

उसने कहा – “मक्कार खाँ उर्फ ऐयार खाँ।”

महाराज उसकी ढिठाई और बात पर हँस पड़े, हुक्म दिया – “बस इससे ज्यादा पूछने की कोई जरूरत नहीं, सीधे कैदखाने में ले जाकर इसको बंद करो और सख्त पहरे बैठा दो।”

हुक्म पाते ही प्यादों ने उस ऐयार के हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ी डाल दी और कैदखाने की तरफ ले गए। महाराज ने खुश होकर तेजसिंह को सौ अशर्फी इनाम में दीं। तेजसिंह ने खड़े होकर महाराज को सलाम किया और अशर्फियाँ बटुए में रख लीं।

रामनारायण, बद्रीनाथ और ज्योतिषी जी भेष बदले हुए दरबार में खड़े यह सब तमाशा देख रहे थे। जब पन्नालाल को कैदखाने का हुक्म हुआ, वे लोग भी बाहर चले आए और आपस में सलाह कर भारी चालाकी की। किनारे जाकर बद्रीनाथ ने तो तेजसिंह की सूरत बनाई और रामनारायण और ज्योतिषी जी प्यादे बनकर तेजी के साथ उन सिपाहियों के साथ चले जो पन्नालाल को कैदखाने की तरफ लिए जा रहे थे। पास पहुँचकर बोले – “ठहरो-ठहरो, इस नालायक ऐयार के लिए महाराज ने दूसरा हुक्म दिया है, क्योंकि मैंने अर्ज किया था कि कैदखाने में इसके संगी-साथी इसको किसी-न-किसी तरह छुड़ा ले जाएँगे, अगर मैं इसको अपनी हिफाजत में रखूँगा तो बेहतर होगा क्योंकि मैंने ही इसे पकड़ा है, मेरी हिफाजत में यह रह भी सकेगा, सो तुम लोग इसको मेरे हवाले करो।”

प्यादे तो जानते ही थे कि इसको तेजसिंह ने पकड़ा है, कुछ इनकार न किया और उसे उनके हवाले कर दिया। नकली तेजसिंह ने पन्नालाल को ले जंगल का रास्ता लिया। उसके चले जाने पर उसका हाल अर्ज करने के लिए प्यादे फिर दरबार में लौट आए। दरबार उसी तरह लगा हुआ था, तेजसिंह भी अपनी जगह बैठे थे। उनको देख प्यादों के होश उड़ गए और अर्ज करते-करते रुक गए। तेजसिंह ने इनकी तरफ देखकर पूछा – “क्यों? क्या बात है, उस ऐयार को कैद कर आए?”

प्यादों ने डरते-डरते कहा – “जी उसको तो आप ही ने हम लोगों से ले लिया।”

तेजसिंह उनकी बात सुनकर चौंक पड़े और बोले – “मैंने क्या किया है? मैं तो तब से इसी जगह बैठा हूँ।”

प्यादों की जान डर और ताज्जुब से सूख गई, कुछ जवाब न दे सके, पत्थर की तस्वीर की तरह जैसे-के-तैसे खड़े रहे।

महाराज ने तेजसिंह की तरफ देखकर पूछा – “क्यों? क्या हुआ?”

तेजसिंह ने कहा – “ऐयार चालाकी खेल गए, मेरी सूरत बनाकर, उसी कैदी को इन लोगों से छुड़ा ले गए।”

तेजसिंह ने अर्ज किया – “महाराज इन लोगों का कसूर नहीं, ऐयार लोग ऐसे ही होते हैं, बड़े-बड़ों को धोखा दे जाते हैं, इन लोगों की क्या बिसात है।”

तेजसिंह के कहने से महाराज ने उन प्यादों का कसूर माफ किया, मगर उस ऐयार के निकल जाने का रंज देर तक रहा।

बद्रीनाथ वगैरह पन्नालाल को लिए हुए जंगल में पहुँचे, एक पेड़ के नीचे बैठकर उसका हाल पूछा, उसने सब हाल कहा। अब इन लोगों को मालूम हुआ कि भगवानदत्त को भी तेजसिंह ने पकड़ के कहीं छिपाया है, यह सोच सभी ने पंडित जगन्नाथ से कहा – “आप रमल के जरिए दरियाफ्त कीजिए कि भगवानदत्त कहाँ है?”

ज्योतिषी जी ने रमल फेंका और कुछ गिन-गिना कर कहा – “बेशक भगवानदत्त को भी तेजसिंह ने ही पकड़ा है और यहाँ से दो कोस दूर उत्तर की तरफ एक खोह में कैद कर रखा है।”

यह सुन सभी ने उस खोह का रास्ता लिया। ज्योतिषी जी बार-बार रमल फेंकते और विचार करते हुए उस खोह तक पहुँचे और अंदर गए, जब उजाला नजर आया तो देखा, सामने एक फाटक है मगर यह नहीं मालूम होता था कि किस तरह खुलेगा। ज्योतिषी जी ने फिर रमल फेंका और सोचकर कहा – “यह दरवाजा एक तिलिस्म के साथ मिला हुआ है और रमल तिलिस्म में कुछ काम नहीं कर सकता, इसके खोलने की कोई तरकीब निकाली जाए तो काम चले।”

लाचार वे सब उस खोह के बाहर निकल आए और ऐयारी की फिक्र करने लगे।