कोई भी बहुत लम्बे समय तक केवल मनोरंजन के लिए कविताएँ नहीं सुन सकता। चाहे कविताओं के विषय हों या कवि की कथन-शैली, एक पाठक कहीं न कहीं खुद को उन कविताओं में ढूँढने लगता है। मुझसे एक बार किसी ने पूछा था कि अपनी निजी विषयों पर लिखी कविताएँ भी आप पब्लिक डोमेन में रख देते हो, आपको असुरक्षित नहीं महसूस होता? मेरा जवाब था कि जिन विषयों और परिस्थितियों को हम निजी समझते हैं, कविताओं के ज़रिये अक्सर यह पता चलता है (लोग खुद आकर बताते हैं) कि जाने कितने लोग उन्हीं संघर्षों से गुज़र रहे हैं जिनसे आप। फ़र्क सिर्फ इतना रहा कि आपने कविताओं में वह बात कह दी है जबकि वे लोग अभी तक अभिव्यक्ति का एक माध्यम ढूँढ रहे थे जो उन्हें शायद आपकी कविताओं में मिला होगा।

सम्भव है आपके और उनके जीवन में घटी घटनाएँ ज़मीन और आसमान की तरह अलग हों लेकिन वो फिर भी आपसे जुड़ जाते हैं और उस जुड़ाव का माध्यम होता है- आपकी कविताओं के प्रतीक। एक व्यापक रूप जो आप किसी व्यक्ति, किसी भाव, किसी परिस्थिति या किसी बात को दे देते हैं। मसलन, ‘मेरा जीवन कोरा कागज़’ गीत सुनकर ज़िन्दगी के किसी पड़ाव पर किसे यह गीत अपने लिए लिखा गया प्रतीत न हुआ होगा?!

ऐसा ही एक प्रतीक हिन्दी के ‘छायावाद’ युग के कवियों को मिला जिसमें हर किसी ने अपने जीवन का स्वरुप, अपनी भावनाओं का अक्स देखा। संक्षिप्त में बता दूँ कि छायावाद, हिन्दी साहित्य के इतिहास में लगभग 1916 से 1936 के बीच के समय को कहा गया है जिसके मुख्य या प्रतिनिधि कवि सुमित्रानंदन पन्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा रहे हैं।

दो विश्व युद्धों के बीच के इस समय में कवियों ने काव्य और समाज की पुरानी सारी ऐसी रूढ़ियों को तोड़ने का प्रयत्न किया जो जर्जर हो चुकी थीं और जिनको आधुनिक समाज में कोई स्थान देना, समाज व् साहित्य को पीछे ले जाने के बराबर होता। जैसे पर्वतों के बीच से एक ‘स्वतन्त्र’ वेग से बढ़ता हुआ पानी का झरना जहाँ-जहाँ से गुजरता है, सभी ‘जड़’ हुई चीजों को भी अपने साथ बहा ले जाता है और उसमें धुलकर प्रत्येक चीज़ एक नया रूप पाती है, एक चमक पाती है, उसी तरह छायावाद के कवियों ने न सिर्फ समाज की रूढ़ियों के खिलाफ उठती आवाजों को आगे बढ़ाया, बल्कि साहित्य की काव्य-धारा को भी एक नया स्वरुप प्रदान किया। इन कवियों का वह, सम्मलित रूप से खोजा गया प्रतीक, ‘झरना’ यानी ‘निर्झर’ ही था, जिसपर न जाने कितनी कविताएँ लिखी गईं। उन्ही में से कुछ कविताएँ यहाँ प्रस्तुत हैं। भाषा थोड़ी जटिल है, लेकिन फिर भाषा-प्रेम कुछ प्रयास तो माँगेगा ही। पढ़ लीजिए-

जयशंकर प्रसाद

झरना

मधुर हैं स्रोत मधुर हैं लहरी
न हैं उत्पात, छटा हैं छहरी
मनोहर झरना।

कठिन गिरि कहाँ विदारित करना
बात कुछ छिपी हुई हैं गहरी
मधुर हैं स्रोत मधुर हैं लहरी

कल्पनातीत काल की घटना
हृदय को लगी अचानक रटना
देखकर झरना।

प्रथम वर्षा से इसका भरना
स्मरण हो रहा शैल का कटना
कल्पनातीत काल की घटना

कर गई प्लावित तन मन सारा
एक दिन तब अपांग की धारा
हृदय से झरना-

बह चला, जैसे दृगजल ढरना।
प्रणय वन्या ने किया पसारा
कर गई प्लावित तन मन सारा

प्रेम की पवित्र परछाई में
लालसा हरित विटप झाँई में
बह चला झरना।

तापमय जीवन शीतल करना
सत्य यह तेरी सुघराई में
प्रेम की पवित्र परछाई में॥

सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

स्नेह-निर्झर बह गया है

स्नेह-निर्झर बह गया है !
रेत ज्यों तन रह गया है।

आम की यह डाल जो सूखी दिखी,
कह रही है-“अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ-
जीवन दह गया है ।”

“दिये हैं मैने जगत को फूल-फल,
किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल;
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल–
ठाट जीवन का वही
जो ढह गया है ।”

अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा ।
बह रही है हृदय पर केवल अमा;
मै अलक्षित हूँ; यही
कवि कह गया है ।

प्रपात के प्रति

अंचल के चंचल क्षुद्र प्रपात !
मचलते हुए निकल आते हो;
उज्जवल! घन-वन-अंधकार के साथ
खेलते हो क्यों? क्या पाते हो ?
अंधकार पर इतना प्यार,
क्या जाने यह बालक का अविचार
बुद्ध का या कि साम्य-व्यवहार !
तुम्हारा करता है गतिरोध
पिता का कोई दूत अबोध-
किसी पत्थर से टकराते हो
फिरकर ज़रा ठहर जाते हो;
उसे जब लेते हो पहचान-
समझ जाते हो उस जड़ का सारा अज्ञान,
फूट पड़ती है ओंठों पर तब मृदु मुस्कान;
बस अजान की ओर इशारा करके चल देते हो,
भर जाते हो उसके अन्तर में तुम अपनी तान ।

सुमित्रानंदन पन्त

निर्झर

तुम झरो हे निर्झर
प्राणों के स्वर
झरो हे निर्झर!

चिर अगोचर
नील शिखर
मौन शिखर

तुम प्रशस्त मुक्त मुखर,–
झरो धरा पर
भरो धरा पर
नव प्रभात, स्वर्ग स्नात,
सद्य सुघर!

झरो हे निर्झर
प्राणों के स्वर
झरो हे निर्झर!

ज्योति स्तंभ सदृश उतर
जव में नव जीवन भर
उर में सौन्दर्य अमर
स्वर्ण ज्वार से निर्भर
झरो धरा पर
भरो धरा पर
तप पूत नवोद्भूत
चेतना वर!

झरो हे निर्झर!

प्रीति निर्झर

यहाँ तो झरते निर्झर,
स्वर्ण किरणों के निर्झर,
स्वर्ग सुषमा के निर्झर
निस्तल हृदय गुहा में
नीरव प्राणों के स्वर!

ज्ञान की कांति से भरे
भक्ति की शांति से परे,
गहन श्रद्धा प्रतीति के
स्वर्णिम जल में तिरते
सतत सत्य शिव सुंदर!

अश्रु मज्जित जीवन मुख
स्वप्न रंजित से सुख दुख,
रहस आनंद तरंगित
सहज उच्छ्वसित हृदय सरोवर!

गान में भरा निवेदन
प्राण में भरा समर्पण
ध्यान में प्रिय दर्शन
प्रिय ही प्रिय रे गायन
अर्हनिशि भीतर बाहर
यहाँ तो झरते निर्झर
स्वर्ण के सौ सौ निर्झर
स्वर्ग शोभा के निर्झर
उमड़ उमड़ उठता
प्रतीति के सुख से अंतर!

निर्झर-गान

शुभ्र निर्झर के झर झर पात!
कहाँ पाया यह स्वर्गिक गान?
श्रंग के निर्मल नाद!
स्वरों का यह संधान?

विजानता का सा विशद विषाद,
समय का सा संवाद,
कर्म का सा अजस्त्र आह्वान
गगन का सा आह्लाद;
मूक गिरिवर के मुखरित ज्ञान!
भारती का सा अक्षय दान?

सितारों के हैं गीत महान
मोतियों के अमूल्य, अम्लान
फेन के अस्फुट, अचिर, वितान,
ओस के सरल, चटुल, नादान,
आँसुओं के अविरल, अनजान
बालुका के गतिवान;

कठिन उर के कोमल उदघात!
अमर है यह गान्धर्व विधान!
प्रणति में है निर्वाण,
पतन में अभ्युत्थान;
जलद ज्योत्स्ना के गात!
अटल हो यदि चरणों में ध्यान;

शिलोच्चय के गौरव संघात,
विश्व है कर्म प्रधान!

निर्झरी

यह कैसा जीवन का गान,
अलि, कोमल कल मल टल मल?
अरी शैल बाले नादान,
यह अविरल कल कल छल छल?

झर मर कर पत्रों के पास,
रण मण रोड़ों पर सायास,
हँस हँस सिकता से परिहास
करती हो अलि, तुम झलमल!

स्वर्ण बेलि-सी खिली विहान,
निशि में तारों की सी यान;
रजत तार-सी शुचि रुचिमान
फिरती हो रंगिणि, रल मल!

दिखा भंगिमय भृकुटि विलास
उपलों पर बहु रंगी लास,
फैलाती हो फेनिल हास,
फूलों के कूलों पर चल!

अलि, यह क्या केवल दिखलाव,
मूक व्यथा का मुखर भुलाव?
अथवा जीवन का बहलाव?
सजल आँसुओं की अंचल!

वही कल्पना है दिन रात,
बचपन औ’ यौवन की बात;
सुख की या दुःख की? अज्ञात!
उर अधरों पर है निर्मल!

सरल सलिल की-सी कल तान,
निखिल विश्व से निपट अजान,
विपिन रहस्यों की आख्यान,
गूढ़ बात है कुछ कल मल!

 

चित्र श्रेय: Leonid Afremov