‘सिंड्रेला’ – गौरी चुघ

सुनो लड़की!
इस बार कोयले की राख को पेशानी पर रगड़ लेना
हालात की सौतेली बहनों से समझौता तुम कर लेना
नहीं आएगी परी कोई तुम्हारा मुस्तक़बिल बदलने को
कोई घोड़ागाड़ी नहीं खड़ी है किसी कद्दू से निकलने को
इस बार इन्हीं चिथड़ों में तुम्हें महल तक जाना होगा
पहली दफ़ा ही हैसियत अपनी ज़ाहिर कर आना होगा..

सुनो लड़की!
तुम जब आबरू बचाए हवस के घने जंगल पार करोगी
दफ़्ना देना गर किसी बच्ची की नंगी लाश से मिलोगी
इस बार बारह बजते ही तुम्हें भागने की ज़रुरत नहीं है
रईसी का लबादा तो तुमने अब के ओढ़ा ही नहीं है..

सुनो लड़की!
इस बार महल में काँच का जूता नहीं, अपनी अधूरी ग़ज़ल का एक नायाब शेर छोड़ आना
ताकि शहज़ादा तुम्हारे ख़ूबसूरत पैर नहीं पूरी ग़ज़ल ढूँढता हुआ आए
और जब वो तुम तक पहुँच जाए तो कह देना उसे,
“मुझसे इश्क़ है तो अमीरी-ग़रीबी का ये फ़र्क़ मिटाना होगा,
मेरे साथ तुम्हें भी इस राख के ढेर पर बस जाना होगा..”

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(यह नज़्म हैरी अटवाल और तसनीफ़ हैदर द्वारा सम्पादित किताब ‘रौशनियाँ’ से है, जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की बीस समकालीन शायरों की कविताओं/नज़्मों का संकलन है। 7 जुलाई 2018 को इस किताब का विमोचन है, जिसकी डिटेल्स यहाँ देखी जा सकती हैं!)


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