अय्यारों से चलकर यथार्थवाद और फिर मनोविश्लेषणों तक आने वाली हिन्दी कहानी भी कभी केवल ‘कहानी’ ही रही होगी। जैसे हमारे बचपन में हमें सुनाए जाने वाली कहानियों की किस्में नहीं हुआ करती थीं, केवल कहानी थीं जो हमें पसंद थीं और जिन्हें हम बार-बार सुनना चाहते थे। उन कहानियों में अक्सर एक अलग दुनिया, थोड़े मज़े वाले प्रसंग और साथ ही एक सबक हुआ करता था, जो हमें बरसों याद रहता। तब तक जब तक कि हमें इस बात पर हंसी न आने लग जाती कि कितनी छोटी-छोटी बातों को समझाने के लिए हमें पूरी की पूरी कहानियां सुनायी गयी हैं। कुल मिलाकर हमेशा कहानी का एक सरल रूप हमारे सामने रहा है जिसमें होते हैं कुछ पात्र, कुछ भावनाएं, एक अंत और एक असर। एक सामान्य कहानी पढ़ने वाले के लिए इतना भी काफी ही होता है।

हिन्दी कहानी और उसके स्वरुप के विकास को पढ़ने या जानने वालों का किसी भी कहानी को वर्गीकृत कर देना स्वाभाविक है। लेकिन हिन्दी का एक सामान्य पाठक कहानी को उसके किस्से वाले रूप में ही ढालकर पढ़ता है। विषय को छोड़कर, किसी विचारधारा या वाद की तरफ मुड़ना उसे नहीं आता।

आज जहाँ हर किसी बात को, हर लेखन शैली को एक वाद या एक इज़्म में सीमित कर दिया जाता है, वहाँ शान रहमान की कहानियों की यह किताब ‘कॉरपोरेट कबूतर’ बिना किसी सोच का झंडा उठाए पाठकों के सामने केवल कुछ किस्से लेकर आयी है। ये किस्से जहाँ एक कहानी सुनने का चाव बनाए रखते हैं, वहीं अंत में एक सबक भी दे जाते हैं, लेकिन किसी कठोर तरीके से नहीं, बस ऐसे जैसे किसी ने गाल पर हलकी सी चपत लगा दी हो।

व्यवहारिक रूप से कॉरपोरेट आसमान में ही उड़ने वाले शान की इस किताब में 34 कहानियां हैं जिसकी शुरुआत ‘आबरा-का-डाबरा सोफ़ा’ से होती है। शेज़ू नाराज़ है अपने चाचा से, क्योंकि वो उसकी सालगिरह पर नहीं आए और चाचा ने उसे मनाने का एक अनूठा तरीका अपनाया है-

“सोफ़े पर बैठकर मैं इन छोटी-छोटी चीज़ों को किसी जादूगर की तरह ग़ायब करता, उस दिन, फिर ‘आबरा-का-डाबरा’ बोल के वापस ले आता। मेरी भतीजी खिलखिलाकर हँस पड़ती। मुझे जादूगर ही समझ रही थी वो।”

यह जादू जो इस कहानी से शुरू हुआ, पूरी किताब में बरकरार रहा है। बचपन की ये अठखेलियां किताब में इस तरह बिखरी पड़ी हैं जैसे फर्श पर बैठे किसी बच्चे के रंग बिखर जाते हैं जब वह अपनी कल्पनाएँ किसी चित्र में भर रहा होता है। ‘हाफ़ टिकट’, ‘पुलक‘, ‘ग़ायब करने वाली मशीन’, ‘चवन्नी, अठन्नी’, ‘नाड़े वाला पजामा’ और ‘स्कूल की परेड’ कुछ ऐसी कहानियां हैं जो आपको इस तंग ज़िन्दगी और तंग कर देने वाली ज़िन्दगी से निकालकर एक ऐसे कोने में ले जाती हैं जहाँ कभी आपने सबसे छिपकर कोई ऐसा काम किया होगा जिसे करने के बाद जब आप घर में घुसे होंगे तो हाल यह होगा कि अब पकड़े गए! और उस लम्हे का वह डर आपको पूरी ज़िन्दगी याद रहा होगा। यही मीठा डर जो अब केवल हंसाता है, नॉस्टेल्जिया के रूप में शान ने इन कहानियों में बखूबी लिख दिया है।

कुछ डर ऐसे होते हैं जो हमने स्वयं पाल रखे होते हैं और जिनकी वजह से हमारी सारी ज़िन्दगी एक पिंजरे में बंद होकर रह जाती है। जैसा कि किताब का नाम है, कॉरपोरेट में काम करने वाले लोग ऐसे ही एक पिंजरे में बंद एक कबूतर की तरह हैं जिनकी कहानी भी यह किताब कहती है। ‘उड़न छू’, ‘लाल रंग’, ‘रोमांस’ और ‘कॉरपोरेट कबूतर’ पाठकों को आज की तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में दो मिनट रूककर, एक आईने के सामने खड़ा होकर, खुद को एकटक ताकने का मौका देती हैं। और सवाल करती हैं कि जो हम ज़िन्दगी से नहीं चाहते उसे सहन करना इतना ज़रूरी और जो चाहते हैं, उसे टालना इतना आसान क्यों है?! ‘उड़न छू’ इस किताब की सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली कहानियों में से एक है।

इनके अलावा ‘आदम की कलम’, ‘चीनी वाली बीमारी’ और ‘नया नाम’ जैसी व्यंग्य कहानियां भी किताब में एक अलग स्वाद लेकर आती हैं। अपने घर से दूर रहकर नौकरी करने वालों की विवशता से लेकर, कश्मीर की हालत और मजहबों के वर्तमान टकराव पर भी शान ने अपनी बात बड़े संवेदनशील तरीके से रखी है।

“उसकी बात में कुछ ज़हर था, कुछ दर्द। कुछ हुआ होगा उसके साथ कभी। सभी के साथ कुछ न कुछ तो होता ही है।”

सभी कहानियां पाठक को एक विषय विशेष के बारे में सोचने पर मज़बूर तो करती हैं, लेकिन उस सोच को हाईजैक करने की कोशिश नहीं करती। गंभीर विषयों को भी साधारण किस्सों और व्यवहारों के ज़रिए उठाया गया है, जिससे ये कहानियां एक खुले संवाद का काम करती हैं।

शान की भाषा और शैली भी बहुत आसान लेकिन प्रभावित करने वाली है। भाषा में कहीं कोई मिलावट नहीं और वहीं शब्दों को थोपा भी नहीं गया है। कहने के तौर से देखा जाए तो ‘रोमांस’, ‘उड़न छू’ और ‘जायफल’ बहुत रोचक और मज़ेदार कहानियां हैं और शान की कथन शैली इन कहानियों में उभरकर सामने आयी है। ऑफिस रोमांस के साथ चलता शिव-पार्वती-कामदेव प्रसंग और बॉस की बॉसगिरी के समानांतर कबूतर के एक परिवार की कहानी मेरे लिए इस किताब के पसंदीदा हिस्सों में से हैं।

शान के अंदर एक शायर भी है, यह भी उनकी कहानियों में इधर-उधर दिख ही जाता है। दर्शन की कुछ बातें हों, या मनोरम चित्रों का वर्णन, या फिर वो भावनाएं जिन्हें सपाट शब्द व्यक्त नहीं कर सकते.. ऐसे मौकों पर कहीं-कहीं एक काव्यात्मक शैली भी देखने को मिली। दीनू किताबवाले के ज़रिए बेशक शान ही यह लिख रहे थे-

‘हर साँझ, अँधेरे में लटकी आवाज़ों को सुनता हूँ,
कुछ शोर में आरती दबी-दबी सी जान पड़ती है।
देखता हूँ कशमकश से,
गोल होने का दवा करती, आड़ी रोटियाँ।
डर के कुछ निवाले तोड़ता हूँ,
और उम्मीद की चादर तान के सो जाता हूँ।
…अब ख़्वाब से लड़ ही कौन सकता है।’

कहानी या गद्य में शान की यह पहली कोशिश है और मेरे अनुसार यह कोशिश उतनी ही सफल है जितनी एक बच्चे की वह कोशिश जिसमें वह साइकिल दौड़ाने से पहले बैलेंस करना सीखता है। यह नयी हिन्दी की एक और उम्दा और पढ़ी और पढ़ायी जाने योग्य ‘कहानियों’ की किताब है, यह कहने में मुझे कोई शंका नहीं।

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