‘दर्द-ए-दिल में कमी न हो जाए’ – बेखुद बदायुनी

दर्द-ए-दिल में कमी न हो जाए
दोस्ती दुश्मनी न हो जाए

तुम मिरी दोस्ती का दम न भरो
आसमाँ मुद्दई न हो जाए

बैठता है हमेशा रिंदों में
कहीं ज़ाहिद वली न हो जाए

ताले-ए-बद वहाँ भी साथ न दे
मौत भी ज़िंदगी न हो जाए

अपनी ख़ू-ए-वफ़ा से डरता हूँ
आशिक़ी बंदगी न हो जाए

कहीं ‘बेख़ुद’ तुम्हारी ख़ुद्दारी
दुश्मन-ए-बे-ख़ुदी न हो जाए..

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