आज कुछ सत्य कहता हूँ,
ईर्ष्या होती है थोड़ी बहुत,
थोड़ी नहीं,
बहुत।

लोग मित्रों के साथ,
झुंडों में या युगल,
चित्रों से,
मुखपत्र सजा रहें हैं..
ऐसा मेरा कोई मित्र नहीं।

कुछ महिला मित्रों के साथ,
कुछ चित्र हैं,
लेकिन उन्हें डर है परिजनों का।

बाल छोटे करा लिए हैं,
छोटे नहीं, बहुत छोटे,
दाढ़ी भी थोड़ी बढ़ा ली है,
अनायास ही,
दर्पण को घूरते घूरते,
बनारस का,
कोई मजाकिया ब्राह्मण लगता हूँ,
तो अगले ही क्षण,
किसी गंभीर चलचित्र का खलनायक।

घर आया हुआ हूँ,
दो चार पुराने लोग अब पहचान भी नहीं रहे,
एक-दो दुकानदार,
जिनसे साख अच्छी थी,
अब उधार नहीं दे रहे,
शायद वजह बाल नहीं,
समयवृत्ति है।

इस बार भी साईकिल वैसे ही,
उदास पड़ी है,
घर के कोने में,
मेरे अलावा कोई चलाता नहीं,
और डेढ़ दो साल से मैंने चलायी नहीं।

ठण्ड ज्यादा बढ़ गयी है,
जब भी घर से बाहर पैर रखता हूँ,
माँ कपड़ो की याद दिला देती है,
जो शायद ओस में ही सूखने को,
टंगे हैं बाहर।

अब कोई बहाना भी नहीं सूझता,
बहाना बनाने को।
घर में निकम्मा समझकर,
कोई टोकता नहीं।
बेशर्मों की तरह,
मैं भी अपनी रजाई,
चारों कोनों से दबाकर,
एक दो नींद खींच लेता हूँ।

उम्र बढ़ती जा रही है बस,
और शायद जिम्मेदारियां भी,
थोड़ा वक़्त लगेगा समझने को..।

■■■

(आदर्श भूषण दिल्ली यूनिवर्सिटी से गणित से एम. एस. सी. कर रहे हैं। कविताएँ लिखते हैं और हिन्दी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है। आदर्श से यहाँ जुड़ा जा सकता है।


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

2 Comments

  • Sanjana · February 13, 2018 at 10:48 pm

    👌👌👌👌

      Posham Pa · February 18, 2018 at 1:09 am

      Keep reading, Sanjana. 🙂

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