देजा वू

यह रात कितनी भरी-भरी सी है,
जैसे हो पतझड़ में गिरती उबासी।
पास खड़े लैंप पोस्ट पर बैठा एक पपीहा गाता है कोई धुन्दला सा गीत,
स्मृतियाँ झट से आ गिरती है टोकरों में जैसे गिरते हैं लदे पेड़ों से मीठे आड़ू,
मैं गुनगुनाती हूँ पपीहे के साथ अपने गाँव का वह भादों वाला साँवला गीत।

धूप तेज़ है, और मैं बैठ जाती हूँ आड़ू के पेड़ की ओट में,
फुनगियों पर घोंसलों में रहते है चिड़िया के नन्हे चूज़े,
करते हैं मुझसे ढेरों बातें,
चढ़ना चाहते हैं वह एक दिन धौलाधार के पहाड़ और कूदना चाहते हैं सबसे शिखर से।

आड़ू की मीठी सुगंध करती है जैसे कोई मादक नशा,
सो जाती हूँ मैं किसी स्वप्न के भीतर और देखती हूँ स्वप्न के अंदर खुलता एक और स्वप्न,
जाग खुलती है तो उसी लैंप पोस्ट पर बैठा पपीहा गा रहा होता है वही धुन्दला सा गीत,
छल नहीं तो होगा यह dejavu,
हमने जी रखा है शायद अपना आज पहले भी और कहीं,
बहुत बार!
सुदूर, किसी दूसरे लैंप पोस्ट पर बैठकर शायद अब पपीहा और चूज़े मिलकर गाते होंगे कोई नए-नए गीत।