देवेन्द्र शर्मा की कविताएँ

पढ़ने का शौक देवेन्द्र शर्मा को नागराज, डोगा और ध्रुव से लेकर प्रेमचंद, रेणु और शरतचंद्र तक ले गया तो लिखने का हौसला उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक की निबन्ध प्रतियोगिताएँ जीतने से मिला। कहानियाँ लिखने और पढ़ने के शौक के चलते ‘The Art Galore’ नाम से एक पोर्टल की शुरुआत भी की जिसमें साहित्य के विविध रूपों को एक मंच दिया जा रहा है।

प्रचलित सतहीपन से दूर देवेन्द्र की कविताओं में एक गंभीर सोच और परिपक्व भाषा देखने को मिलती है, जिसमें प्रेम और सामाजिक सरोकार दोनों ही स्थान पाते हैं। पढ़िए देवेन्द्र की कुछ कविताएँ!

दैवीय प्रेम

गाहे-बगाहे,
अपने प्रेम को महानता
और अपने अनुरोध को वैधता
देने के आशय से
मैंने हमारे साथ होने को दैवीयता के धागों से बुना;

मसलन ये कि
बिना चाँद की आधी रात को
तुम्हारी जैसी किसी प्रेमिका के बाहुपाश को विह्वल
मेरे जैसे किसी प्रेमी ने टकराये होंगे दो पत्थर
और आदिमानव ने आग की खोज कर ली।

या ये कि एक दिन
झमाझम झरते मेघों से उत्प्लावित दज़ला या फ़रात के इस पार रह गए
दो व्याकुल प्रेमियों ने मिलकर
सूखी लकड़ियाँ जुटाईं होंगी
और मेसोपोटामिया की पहली नौका का निर्माण कर
अपनी प्रेमिकाओं का साक्षात्कार करने निकले होंगे,
कि उनमें से एक मैं भी रहा होऊँगा।

मैंने दुनिया की महानतम सभ्यताओं के महानायकों
और मिथकीय सुंदरियों के प्रेम की कल्पनाएँ कर
उनमें हमारे चुटकी भर यथार्थ को मिला दिया
और आह्लादित हुआ हर बार
अपने प्रेम के ईश्वर होने को लेकर
तुम्हारे किसी अदृश्य लोक की अप्सरा होने को लेकर
मेरे विजेता देवपुरुष या सेनानायक होने को लेकर।

और आज
जब तुम्हारे होने के नाम पर तुम्हारी अनुपस्थिति है
जब शेष स्मृतियों को अंक भर के
दग्ध हूँ मैं

तो प्रतीत होता है

कि हमारे प्रेम को दैवीय बनाने के बजाये
हमें साधारण होना चाहिए था,
कि अच्छा होता अगर हम
खेत में साथ-साथ धान रोपते,
प्रेमी युगल ही रहते।

क्षण

रात ठहरी है,
थम गया है वक़्त,
और तारे टिमटिमा रहे हैं।
कुछ जुगनू चमकीले से
भटक रहे हैं दरबदर,
कुछ सूखे पत्ते खड़खड़ा रहे हैं।

कुछ दरख़्त गवाह बन रहे हैं,
अपने कोटरों में पल रहे पंछियों की
प्रेम कहानियों के।
एक नदी बह रही है
अपने शोर की चाबी से ख़ामोशी के बंद तालों को खोलती,
अपनी चपलता से थमे हुए वक्त को झकझोरती,
अपने साथ बहाकर बीते तिक्त क्षणों की मलिनता को मिटाती,
बह रही है।

एक चाँद चल रहा है,
स्कूल से दौड़कर घर जाते किसी बच्चे की तरह,
भाग रहा है।
उसे फीते बाँधने का सबर नहीं है,
जल्दी से घर पहुँचकर,
सहर को आज़ाद करना है,
आफ़ताब से मिलना है।

और मैं,
मैं ताक रहा हूँ तुमको,
निहार रहा हूँ
आँखों की गहराइयों से झांकते अपने चेहरे को,
और उन आँखों में दिखती,
अपनी आँखों में तुमको।

मैं आहिस्ता से,
छू रहा हूँ तुम्हारे खुश्क होंठ,
और पढ़ रहा हूँ वो नज़्म
जिसके कुछ मिसरे अधूरे हैं,
मेरी तरह।

इस रात, इस चाँद, नदी
जुगनू और दरख्तों के साथ,
मैं जी रहा हूँ तुमको,
क्यूंकि कभी कभी एक क्षण,
सम्पूर्ण होता है।

जीवन से भी ज्यादा सम्पूर्ण।

पत्थर

आज से कुछ दिनों, महीनों या बरसों बाद,
किसी उदास सी नीरव शाम या आधी गुज़र चुकी रात में,
हाँथ में चाय का प्याला या सस्ती सी सिगरेट का अधजला टुकड़ा लिये,
जब तुम शून्य में ताक रहे होगे अपलक,
और खूबसूरत सी लगने वाली चाँदनी आँखों में चुभने लगेगी।
जब तुम विचार कर रहे होगे,
अपने जिए हुए उस जीवन का,
जो तुमने उस जीवन की उम्मीद में जिया,
जो कभी आ न सका।
जब तुम्हारी असफलताएँ,
तुम्हारी गलतियाँ,
मुँह बाये तुम्हें निगलने की ताक में नज़र आएंगी,
और सब तुम्हारा साथ छोड़ चुके होंगे।
तुम्हारे अपने,
जिन्हें तुमसे कुछ उम्मीदें थीं,
अब उन उम्मीदों का पुलिंदा लिए कोई दूसरा नाज़ुक कन्धा ढूंढ रहे होंगे।
तुम्हारे दोस्त,
जो हमेशा तुम्हारे साथ सफर करने वाले थे,
किसी नए उभरते(भटकते) सहारे का सहारा बन रहे होंगे।
तुम्हारे शब्द,
जो कभी किस्से कविताओं में इत्र की तरह महकते थे,
बेतरतीबी से नाक भौं सिकोड़े, किसी कोने में पड़े अलसा रहे होंगे।
और तुम्हारा मौन,
जो सिर्फ तुम्हारा था,
उसमें विचारों ने अनधिकृत प्रवेश कर लिया होगा।

उस शाम या आधी रात में मेरे दोस्त,
उस आधी जली सस्ती सिगरेट की तरह,
तुम्हारी आधी ज़िन्दगी जल चुकी होगी,
और तुम टूटना चाहोगे,
बिखरना चाहोगे,
और चाहोगे,
बिखर कर निरुद्देश्य बह जाना।

बस उस उदास सी नीरव शाम में,
तुम खुद को बिखरने से मत रोकना;
वो तुम्हारे मनुष्य होने की शाम होगी।
तुम बस टूटकर बह जाना,
मेरे दोस्त,
तुम ठहरना मत,
क्योंकि ठहरना पत्थर हो जाना है,
और पत्थरों में,
जान नहीं होती।

हम सब सो रहे हैं

खट..खट..खट..खट..
दस्तक ! दस्तक !
श्श्श्श.. चुप रहो,
बात न करो,
हम सब सो रहे हैं।

धीरे धीरे, सरपट सरपट,
आओ भीतर,
बनकर रहबर,
बस बात न करो,
बस प्रश्न न करो,
हम सब सो रहे हैं।

हममें घुसकर, हिस्सा बनकर,
खोखला कर दो,
रहनुमा दिखकर,
जला दो किताबें हमारी,
मिटा दो स्याही का रंग,
तोड़ दो लाइब्रेरी की इमारतें,
दे दो खिलौने और मनोरंजन,
बस बात न करो,
बस प्रश्न न करो,
हम सब सो रहे हैं।

नाम चाहिए? पहचान चाहिए?
शायद तुम्हें हमारा,
ईमान चाहिए,
मिटाना है हमको?
सामान चाहिए?
या बसने को सुन्दर मकान चाहिए?
देखो ले लो, जो भी चाहो,
देखो लूटो, जितना चाहो,
बस बात न करो,
बस प्रश्न न करो,
हम सब सो रहे हैं।

हर माल दस रुपये,
हर जान दस रुपये,
इंसान दस रुपये,
हिंदुस्तान दस रुपये,
ईमान दस रुपये,
कीमत दो और ले लो,
जो भी चाहो ले लो,
बस बात न करो,
बस प्रश्न न करो,
हम सब सो रहे हैं।

अरे हाँ ख़बरदार,
कुछ सिरफिरे जागे होंगे,
तुम्हारी पहचान,
सबसे कहते होंगे,
पागल कर दो उन्हें,
या मार दो कुत्तों की तरह,
घोट दो उनकी आवाजें,
ख़त्म कर दो नामोनिशां,
फिर आज़ाद हो तुम,
चाहे जो करो,
बस बात न करो,
बस प्रश्न न करो,
हम सब सो रहे हैं।
हम सब सो रहे हैं।

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