धूल और धुआँ

धूल!
ठोकर खाती है,
उड़ती है-
फिर कहीं जाकर,
बैठ जाती है-
किसी बेवफा की तरह।

पर धुआँ!
घुटता है,
उड़ता है,
फिर कभी लौटकर
नहीं आता-
गये विश्वास की तरह।