‘दिल की मेरी बेक़रारी’ – बहादुर शाह ज़फ़र

दिल की मेरी बेक़रारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
शब की मेरी आह-ओ-ज़ारी मुझ से कुछ पूछो नहीं

बार-ए-ग़म से मुझ पे रोज़-ए-हिज्र में इक-इक घड़ी
क्या कहूँ है कैसी भारी मुझ से कुछ पूछो नहीं

मेरी सूरत ही से बस मालूम कर लो हम-दमो
तुम हक़ीक़त मेरी सारी मुझ से कुछ पूछो नहीं

शाम से ता-सुबह जो बिस्तर पे तुम बिन रात को
मैंने की अख़्तर-शुमारी मुझ से कुछ पूछो नहीं

ऐ “ज़फ़र” जो हाल है मेरा करूँगा गर बयाँ
होगी उन की शर्म-सारी मुझ से कुछ पूछो नहीं..

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