‘दिल्ली के नहीं कूचे’ – तसनीफ़ हैदर

(ये एक हिस्सा है मेरी किताब ‘दस बरसों की दिल्ली’ का। वैसे तो अभी वो किताब छपी भी नहीं है, उर्दू में इसके कुछ हिस्से ऑनलाइन हुए हैं, क़रीब ग्यारह या बारह,सोचा लोगों को पढ़वाया जाए ताकि वो दिल्ली को कुछ मेरी निगाहों से भी देख सकें। वैसे तो मैंने इस किताब के ज़रिये दिल्ली में अपने दस बरसों की गाथा लिखी है, मगर बहुत कुछ ऐसा भी उँगलियों के नीचे से गुज़र गया, जिसमें दूसरों की दिलचस्पी भी हो सकती है, ये ग्यारहवीं क़िस्त है, मगर इसे अलग से पढ़ने पर आपको बिलकुल अंदाज़ा नहीं होगा। सो पढ़िए और बताइये कि आपको ये कहानी कैसी लगी।)

दिल्ली एक शहर है, उस ठुके हुए तसव्वुर से बिलकुल जुदा, जिसने उसे आज भी बहुत से लोगों की नज़र में शाहजहानाबाद बना रखा है। कहते हैं कि एक अंग्रेज़ ने जिनका नाम ड्यूक कनॉट था, पुराने शहर की सजावट कुछ इस तरह की कि वो मुग़ल हुकमरानों की उस फ़सील ए दिल्ली में भी मुम्किन ना थी, जो कि मग़्लों के दौर में नया शहर कहलाती थी। पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली के दरमियान क़दीम-ओ-जदीद की एक बिलकुल अलग दीवार खड़ी हुई है। पुरानी दिल्ली आज भी अपने तर्ज़, बूद-ओ-बाश, रहन सहन और तौर तरीक़ों में बिलकुल उतनी ही शाहाना, अक्खड़ और ला-उबाली है, जितनी कि शाही हुकूमतों के दौर में रही होगी। एक पुराने पन की लहर इस शहर पर इस तरह छाई हुई है कि गोलचा सिनेमा और उर्दू बाज़ार सब कुछ मुग़ल अह्द की ही यादगार मालूम होते हैं। ग़ालिब ने अपने ख़तों में लिखा था कि दिल्ली वाले उजड़ गए, अब जो आकर बसे हैं, वो दिल्ली के नहीं हैं, कोई कहीं से आया, कोई कहीं से। कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा ले कर ग़दर के बाद बसाई गई दिल्ली में मेरा जाना कम हुआ है। वहां के लोगों में मेहमान-नवाज़ी बला की है, ग्राहकों के तअल्लुक़ से यहां के दुकानदारों का रवैय्या नई दिल्ली के लोगों में कुछ ख़ास अच्छा नहीं माना जाता है। जिन चचा कबाबी की दास्तान आप अशरफ़ सुबूही की किताब ‘दिल्ली की चंद अजीब हस्तियाँ’ में पढ़ चुके होंगे, उसूलों की ऐसी ही बे-तुकी दुकानदारियां आपको इस शहर में देखने के लिए मिल जाएँगी। नए ज़माने के एतबार से यहां कस्टमर केयर का रुजहान नहीं है और अहम और ग़ैर अहम सभी किस्म के गाहक एक ही तरीक़े से डील किए जाते हैं।

अब मेट्रो ज़मीन का सीना फाड़ते हुए इन गलीयों तक जा पहुंची है, यहां पुरानी तर्ज़ की इमारतों के ग्रांऊड फ़्लोर ज़मीनों की भराई की वजह से तह ख़ानों में तबदील हो चले हैं, कई झरझर करती हुई पुरानी हवेलियाँ हैं, बहुत सी तोड़ कर नई क़िस्म की बिल्डिंगें बनाई गई हैं, बाज़ू से बाज़ू चिपकाए, रानों से रानें, इमारतों की ऊबड़ खाबड़ क़तारें पुरानी दिल्ली की नई तहज़ीब का इश्तिहार बन गई हैं मगर उनमें रहने वाले आज भी दिल्ली छः की रौनक भरी शामों के गवाह हैं, फेसबुक और ट्विटर के ज़माने में फ़ुर्सत कम हो गई है, समाजी रिश्ते मैसेंजर और वाट्स एप्प तक चले आए हैं, उस के बावजूद शाम को किसी पंखा झुलाते हुए सीख़-कबाब वाले की दूकान पर पड़ी छोटी सी बैंच, अभी भी नौजवानों की ठिल्लियों, ठिठोलियों और हुक़्क़े बाज़ी का दौर गर्म रखती है।

पुरानी दिल्ली एक बहुत बड़ा बरगद है, जिसके नीचे वक़्त का क़िस्सागो बैठा पुराने वक़्तों की दास्तान सुनाता जा रहा है, मगर वक़्त तेज़ी से बदल रहा है, इस के चिलम ने धुंवें और राख में ढलते ढलते, ख़ुद को सारा ख़र्च कर दिया है, आँखें लाल हैं और पलकें बोझल। सुबह भी बहुत दूर नहीं, मगर ख़ुमार तो फ़िलहाल बाक़ी ही है। मैं दस बरसों के पूरे समय में लाल क़िला शायद दो तीन बार ही गया हूँ। मुझे लाल क़िले से वहशत होती है, वहां सफ़ैद रंग की ख़ूबसूरत इमारतें, बेवाओं का सा लिबास पहने, क़दमों से घांस की ज़ंजीर बाँधे, किसी क़ैदी की तरह सर झुकाए खड़ी रहती हैं। लंबी लाल फ़सील तारीख़ की क़ब्र पर बैठे हुए मुजाविर की तरह ख़ला में घूरती रहती है। वो हौज़, जिनमें कभी दूध और शफ़्फ़ाफ़ पानी की लहरें तैरती होंगी, अपने पेट में झाड़ झनकाड़ लिए उदासीयों की पैग़म्बर बनी हुई हैं, वो बाज़ार जिनमें दिन को मर्द और रात को औरतें, ख़्वाजा-सरा, कनीज़ें और बाहर से आए हुए ताजिर (व्यापारी) सामान ए ज़िंदगी को उलट-पलट कर देखते होंगे, खाने पीने के अस्बाब बेचने वाले, साज़-ओ-संगीत की दुकानें लगाने वाले, सजावट-ओ-बनावट के आलात (उपकरण) बेचने वाले, ये सब मेरे कानों में सरगोशियाँ करने लगते हैं, मगर अब वहां दो वर्दी वाले सिपाही, हाथों में बंदूक़ थामे, कैप लगाए, सर से पैर तक एक घने सब्ज़ लिबास में गश्त लगाते हैं। उनके क़दमों की टापें, भारी बूटों के नीचे कुचलती हुई महसूस होती हैं। इस ख़ामोश और चीख़ते हुए मंज़र में बस एक ख़ला है, और इस ख़ला में वो सारा शोर, सारा ग़ुरूर, सारे नारे लाशों की तरह पड़े हुए हैं, जिनमें अपनी सलतनत को फैलाने की, धन-दौलत को ज़ख़ीरा करने की लालच, मज़हब को बरतरी दिलाने का एहसास, वतन को फ़ख़्र से पुकारने की कोशिश और लोगों की आह-ओ-पुकार, चीख़ें, जंगें, यलग़ारें, धमा चौकड़ीयां, जश्न, हंगामे, औरतों के क़ीमती लिबास, जगमगाते हुए फ़ानूस और हुक्म का इशारा पाने वाले ग़ुलाम सब एक के ऊपर एक वहशत से आँखें फैलाए, हाथों को उलटी दिशाओं में बिखराए हुए, ज़बान बाहर निकाले बस ख़ामोश लेटे हैं, कभी ना उठने के लिए।

मुझे दिल्ली की जामा मस्जिद देखकर भी यही एहसास होता है, सबसे पहले मैं इससे सटे हुए उर्दू बाज़ार का ज़िक्र करना चाहूँगा, यहां से गुज़रने वाली मेन सड़क, आम शहरों की गलीयों जितनी पतली है। इस पर साईकल रिक्शे, बुर्क़ा-पोश औरतें, रोते बिलकते बच्चे, आटो रिक्शे, कारें, मोटर साईकलें, साईकल और स्कूटर, पैदल सवार सभी गुज़रते रहते हैं, रातों को भी इस घुटती हुई नाश ज़दा सड़क को शायद ही सुकून मिलता हो। मुख़्तलिफ़ जगहों पर करंसी चेंजर, मुसाफ़िर ख़ाने, छोटे मोटे होटल, किताबों की कुछ दुकानें। उर्दू बाज़ार तो ग़ालिब के अह्द में ही ख़त्म हो चुका था। ये कुछ और है और इस कुछ और में, एक नक़्क़ाली मौजूद है, जिसको देखने और महसूस करने के लिए बस एक ऐसी आँख चाहिए, जो रोज़ के इन हंगामों में मिलकर यहीं का एक मंज़र बन कर ना रह जाये। इन किताबों की दुकानों में बैठे हुए बूढ़े, बालों में मेहंदी लगाए, हाथों में किताब या अख़बार थामे ख़ामोश रहते हैं, गाहक आते हैं, अपनी पसंद की किताबें छांटते हैं और ले जाते हैं, कई मुसाफ़िर किताबों के पैकेट शाम तक के लिए यहीं छोड़ जाते हैं। हर हाल में ये लोग जो इन दुकानों पर बैठे हैं, इन ग्राहकों की आवभगत करने से ज़्यादा अपने दोस्तों के साथ गप्पें हाँकना पसंद करते हैं। छूट तक़रीबन सभी दूकानों पर दस फ़ीसद से ज़्यादा नहीं दी जाती है। लेकिन एक दुकान बड़ी दिलचस्प है, जहां जाकर आप सिर्फ किताबें ही नहीं ख़रीदते, दुकानदार की गुफ़्तगु का लुत्फ़ भी लेते हैं, ये साहिब कुतुब ख़ाना ए  अंजुमन के एक किताब फ़रोश हैं, क़ादरिया, चिश्तिया, नक़्शबंदिया, सुहरवर्दिया तमाम ऊपर नीचे के तसव्वुफ़ के सिलसिलों को ऐसे बयान करते हैं, जैसे इलियड की नज़्म सुना रहे होँ, अदबी लतीफ़ों, क़िस्सों और वाक़ियात की एक लंबी गठरी उनके पास मौजूद है, जो खुलती है तो ऐसा मज़ा देती है कि आदमी बस सुनता चला जाये, यहां हर क़िस्म के गाहक आते हैं। नौ सीखिये भी, उस्ताद भी, अदब के तालिब ए इल्म (विद्यार्थी) भी। ग़ैर मुल्की स्टूडैंटस जो उर्दू सीख रहे होते हैं, सबसे ज़्यादा इन्ही की दुकान पर देखने को मिल जाते हैं। बड़े मियां भैंगे हैं, मगर नज़र बिलकुल ठीक है। पैसा गिनने, छुट्टा देने की ऐसी मश्क़ है कि हाथ बड़ी फुर्ती से चलने के बावजूद मुम्किन नहीं कि रत्ती बराबर चूक जाये। मेरे सामने कई गाहक ऐसे आए, जिन्हें किताबों के नाम मालूम न थे, उधर उन्होंने शायर का नाम लिया और इधर वो मजमुए (संग्रह) गिनवाने लगे। सब लोग हंसी और हैरत के मिले जुले माहौल में उन्हें देखते हैं। कुरता पाजामा पहने, लंबी टोपी लगाए, हंसते बोलते सारे काम निमटाते रहते हैं। कई एक को डाँटते भी हैं कि ये किताब क्यों ख़रीदना चाहते हो, इस से बहकने का अंदेशा है, किताब ही पढ़नी है तो फ़ुलां फ़ुलां पढ़ो।

वाक़ई अब ऐसे लोग नदारद होते जा रहे हैं, ये भी पुराने वक़्तों की आख़िरी निशानी की तरह यहां बैठे हैं और इनकी अगली पीढ़ी पुरानी दिल्ली में मौजूद इस किताब की दुकान को एक क़ीमती प्रॉपर्टी की नज़र से देखकर भाव लगाने के लिए तैयार हो रही है। इन मोटे सौदों में इल्म का सौदा मांद पड़ता जा रहा है, नज़दीक ही चमकता दमकता कनॉट प्लेस है, ऊंची चमकती दमकती इमारतें, चिकनी सिमेंटी रंग की सड़कें, महंगी गाड़ियां, नर्म लहजे और तीखी नज़रें। एक बादल है जो धीरे धीरे इस ख़ाकी और पीले रंग के मिले जुले मंज़र पर हावी होने के लिए बिल्ली के क़दमों की तरह आहिस्तगी से इस तरफ़ बढ़ रहा है, बड़े मियां, एक दिन अचानक धूल बन जाऐंगे, दूकानें, कैफों में बदल जाएँगी, सड़क चौड़ी होगी, मोटे मोटे पेटों वाले मकानात, पतली पतली लंबी इमारतों का रूप धार लेंगे। तेल की धार लुटाने वाले बावर्ची, सफोला की महक में डूबते चले जाऐंगे, हार्ट-अटैक वालों की तादाद फिर भी बढ़ जाएगी और दिल वाले अचानक निगाहों से ग़ायब होजाएंगे।

दिल्ली की इमारतों में मुझे सबसे ज़्यादा हुमायूँ का मक़बरा पसंद है। पुराना क़िला मैं ख़ुद सिर्फ एक ही बार गया हूँ और वो भी तब जब हमारे दोस्त अली अकबर नातिक़ यहां आए हुए थे। मुझे ये क़िला बहुत ज़्यादा पसंद नहीं है, कहीं से कोई दीवार अपने आप उग आती है, कहीं ऊबड़ खाबड़ बड़े बड़े पत्थरों से बनाई गई दीवार का लोहा, धूप को अपनी पीठ पर उठाए छाँव उगलता रहता है। एक तवील-ओ-अरीज़ (भव्य) मस्जिद है, जिसमें छत वाला हिस्सा बहुत कम है। बहरहाल पुराने क़िले से ज़्यादा अजीब-ओ-ग़रीब मुझे कुतुबमीनार मालूम होता है, वहां भी मेरा ज़्यादा जाना नहीं हुआ, बस दो या तीन बार गया हूँ,एक बहुत बड़ा मीनार, क़ुरआन की आयतों का लिबास पहने हुए खड़ा है, लाल रंग के पत्थरों से तामीर किया गया ये मीनार सलातीन के दौर की यादगार है। क़ुतुब उद्दीन ऐबक सुना है कोई मस्जिद क़ुव्वत उल-इस्लाम बनाना चाहते थे, ये वो इरादा था जिसे ख़ुद ख़ुदा ने ही शायद रद कर दिया और शम्सुद्दीन अल्तमिश की मेहनतों के बावजूद भी सिर्फ एक ही मीनार वजूद में आसका। कुतुब मीनार मुझे ज़ाती तौर पर इसलिए पसंद नहीं है क्योंकि यहां बहुत सी मूर्तियां आज भी पत्थरों की सिलों पर सजी हुई, पीछे की जानिब ख़ामोश बैठी हैं, मेरी हमदर्दी इन तमाम पत्थरों से ज़्यादा है, क्योंकि ये मेरी रूह का हिस्सा हैं, इसी मिट्टी से उगने वाले देवता। मुझे हिन्दोस्तान पर हुकूमत करने वाले मुसलमान बादशाहों की ये हरकत बहुत अजीब मालूम होती है कि मस्जिद बनानी हो तो वो मंदिरों को तोड़ने से नहीं चूकते थे। कुतुब मीनार, इस में कोई शक नहीं कि हिन्दुस्तान की पहचान अपने तामीरी जलवे से पूरी दुनिया में कराने के लिए मशहूर है, लेकिन तारीख़ (इतिहास) पर उसे मैं एक लंबे, गहरे ज़ख़्म से ज़्यादा ऐहमियत देने को तैयार नहीं।

इस रवय्ये पर मुग़ल दौर के आख़िर और शान ए अवध के शुरू होते ज़मानों में बड़ी सख़्त तनक़ीद (आलोचना) की गई है, जो कि उस दौर के आर्ट, ख़ास तौर पर शेर-ओ-शायरी में साफ़ तौर पर देखी जा सकती है। हिन्दुस्तान पर चढ़ाई करने वाले ज़्यादा-तर बादशाह ज़ालिम, जंगजू, फ़ित्ना पर्वर और निहायत संगदिल क़िस्म के लोग थे, जिनका मक़सद यहां की दौलत लूटना और उसे हथियाना था। वो मज़हब के प्रचार के लिए यहां बिलकुल न आए थे। उनको हर हाल में यहां अपने क़ब्ज़े को ख़ून और तलवार के ज़ोर पर क़ायम रखना था, जो कि उन्होंने किया। अकबर इस पूरे दौर में वो पहला बादशाह था, जिसने हिन्दुस्तान को अपना घर समझा और उसे लूटने के बजाय, उस में सुकून से रहने को तर्जीह (वरीयता) दी।

सलातीन हों या मुग़ल, अपने साथ किताबें लेकर हिन्दोस्तान में दाख़िल नहीं हुए थे और हुकूमतों को फैलाने के लिए किताबों की नहीं तीरों, तलवारों की ज़रूरत ही हुआ करती थी, इसलिए उन्होंने वही किया, जो कि जंगजू क़ौमें किया करती हैं। वो किसी भी मज़हब से तअल्लुक़ रखते, हिन्दुस्तान में दाख़िल हो कर यहां की मुक़द्दस (पवित्र) इमारतों को गिरा कर वहां अपने देवताओं को सजा देते, जैसा कि उन्होंने मस्जिदों को तामीर करके इसका सुबूत दिया। ख़ून की नहरें बह जाएं, लोग जल जाएं, कट जाएं, मर जाएं लेकिन अपने पांव जहां तक हो सकें फैला लिए जाएं। यक़ीनी तौर पर पुराने ज़माने में लोग इसी तरह हुकूमत का दायरा फैलाते थे । मुस्लमानों, ईसाईयों इन दोनों क़ौमों ने यही तरीक़ा अपनाया और मज़हब को अपने मुल्क या हुकूमत को फैलाने का जवाज़ ठहराया, जिसकी वजह से ये क़ातिल और लुटेरे, अगली नसलों के हीरो बनते गए। इन तमाम मुआमलात का तअल्लुक़ मज़हब की इस उलझी तालीम से भी है, जिसमें एक तरफ़ ज़मीन पर फ़साद फैलाए जाने से रोका जाता है तो दूसरी तरफ़ ख़ुदा के दीन को आम करने की नसीहत की जाती है, उसकी राह में लड़ने मरने को अच्छा समझा जाता है। यही वो ढाल है, जिसका सहारा पहले जाहिल क़ौमें लिया करती थीं, अब दहश्तगर्द, मौलवी मुल्ला और नेता लिया करते हैं। ये सारे सवाल कुतुब मीनार से गुज़रते, वहां की ज़मीन पर फिरते हुए ज़हन की सतह पर केंचुए की तरह रेंगने लगते हैं, इसके उलट हुमायूँ का मक़बरा मुझे इसलिए पसंद है, क्योंकि वो उनकी ईरानी बेगम ने बनवाया था। मुग़ल दौर-ए-हुकूमत में मोहब्बत की ये अज़ीम निशानी ताज-महल से पहले एक औरत की तरफ़ से अपने शौहर को दिया जाने वाला ऐसा तोहफ़ा था, जिसमें चौदह साल बाद उस की हड्डियां निकाल कर कहीं और दफ़्न करने की तकलीफ़ भी नहीं की गई और ऐसी आलीशान इमारत क़ायम की गई, जिसने मुग़ल आरकीटेक्चर को एक नई दिशा भी दी। तारीख़ के दामन पर ईरानी बेगम का ये शानदार बोसा हमेशा के लिए नक़्श हो गया है। हुमायूँ का मक़बरा इसी लिए अब एक मक़बरे से ज़्यादा आशिक़ों की मुलाक़ातों और सरगोशियों से गूँजता रहता है। यहां क़ब्रों के नज़दीक उलझती हुई गर्म साँसें, दुनिया के इस शोर-ओ-हंगामे से बहुत दूर, बदन की धूप में साएँ साएँ करती हैं, जिसने इश्क़ के लिए दुनियादारी, नफ़रत और भाग दौड़ के चक्कर में ख़ुद को भी फ़रामोश कर रखा है।

कहते हैं इसी तर्ज़ पर बाद में अकबर के नवरत्नों में से एक अबदुर्रहीम ख़ान ख़ानां का मक़बरा भी तामीर किया गया। ये मक़बरा भोगल से ज़रा आगे और हज़रत निज़ाम उद्दीन की मज़ार से कुछ पहले आज भी सड़क किनारे मौजूद है। बराबर में मैली कुचैली जमना बह रही है, जो शायद उन दिनों आईने की तरह चमकती होगी। ऐसा महसूस होता है जैसे रहीम ख़ान ख़ानां अचानक दोहे सुनाते सुनाते यहां से दूर निकल गए हैं, क्या कीजिये ट्रैफ़िक दिल्ली में बहुत बढ़ गया है और हॉर्न की चीं चां, पीं पाँ में फ़िज़ाओं को इतनी मोहलत कहाँ कि लफ़्ज़ की तान पर थाप दे सकें।

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चित्र श्रेय: Raghu Rai


Tasneef Haidar

महाराष्ट्र में 1986 में वसई गाँव में पैदा हुआ, दसवीं कक्षा तक वहां पढ़ा, 2005 में फ़ैमिली के साथ दिल्ली आया और तब से यहीं हूँ। जामिआ मिल्लिया इस्लामिया से प्राइवेट पढ़ाई के ज़रिये एम ए (उर्दू) किया, अब दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम फिल कर रहा हूँ। रेख़्ता वेबसाइट से क़रीब तीन साल जुड़ा रहा, उसके बाद अपना उर्दू ब्लॉग अदबी दुनिया स्टैब्लिश किया। पिछले दो वर्षों से उर्दू-हिंदी ऑडियो बुक्स पर अपने यूट्यूब चैनल 'अदबी दुनिया' के ज़रिये काम कर रहा हूँ।

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