‘दूसरा सप्तक’ से भवानी प्रसाद मिश्र का वक्तव्य

कोई भी अनचाहा, बे-मन का काम करणीय नहीं होता। अपनी कविता और अपने कवि पर वक्तव्य देने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी। मगर ‘सप्तक’ की बनावट का वह एक आवश्यक अंग है, इस लिए बहुत लाचार होकर लिखने बैठ गया हूँ।

कवि और कविता के बारे में जितनी बातें प्रायः कहीं और लिखी जाती हैं, उनके आसपास जो प्रकाश-मंडल खींचा जाता है और उन्हें जो रोज़मर्रा मिलने वाले आदमियों और इनकी कृतियों से कुछ अलग स्वभाव, प्रेरणाओं और सामर्थ्यों की चीज़ माना जाता है, वैसा कम से कम अपने बारे में मुझे कभी नहीं लगा। तो हो सकता है कि मैं कवि ही न होऊँ।

मुझ पर किन किन कवियों का प्रभाव पड़ा है, यह भी एक प्रश्न है। किसी का नहीं। पुराने कवि मैंने कम पढ़े, नए कवि जो मैंने पढ़े मुझे जंचे नहीं। मैंने जब लिखना शुरू किया तब अगर श्री मैथिलीशरण गुप्त और श्री सियारामशरण को छोड़ दें तो छायावादी कवियों की धूम थी। ‘निराला’, ‘प्रसाद’ और पन्त फैशन में थे। मेरी कमबख्ती (जिसे कहने में भी डर लगता है)- ये तीनों ही बड़े कवि मुझे लकीरों में अच्छे लगते थे। किसी एक की भी एक पूरी कविता बहुत नहीं भा गयी। तो उनका क्या प्रभाव पड़ता। अंग्रेज़ी कवियों में मैंने वर्डस्वर्थ पढ़ा था और ब्राउनिंग- विस्तार से। बहुत अच्छे मुझे लगते थे दोनों। वर्डस्वर्थ की एक बात मुझे बहुत पटी कि ‘कविता की भाषा यथासम्भव बोलचाल के करीब हो’। तत्कालीन हिन्दी कविता इस ख़याल के बिल्कुल दूसरे सिरे पर थी। तो मैंने जाने-अजाने कविता की भाषा सहज रखी। प्रायः प्रारम्भ की एक रचना में (‘कवि से’) मैंने बहुत सी बातें की थीं: दो लकीरें याद हैं:

“जिस तरह हम बोलते हैं
उस तरह तू लिख
और उसके बाद भी
हमसे बड़ा तू दिख।”

भारतीय कवियों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर मेरे लिए एक बड़े अरसे तक बन्द रहे। अंग्रेज़ी या हिन्दी के माध्यम से कवि रवीन्द्रनाथ को कौन जान सकता है; जिनका लगभग कुछ भी अंग्रेज़ी और हिन्दी में नहीं है। इस पुण्य-क्षण से आँखें चार हुईं सन’ 42 में जब मुझे तीन साल की अवधि तक तब की सरकार ने बन्दी रखा। जेल में मैंने बंगला सीखी और कविता-ग्रन्थ गुरुदेव के प्रायः सभी पढ़ डाले। उनका बड़ा असर पड़ा। उस असर में अनेक कविताएँ लिखी हैं जो अगर कभी किताब में रूप में छप सकीं तो नाम सोच लिया है- ‘अनुगामिनी’। मगर ‘अनुगामिनी’ की कविताएँ मैं मेरी नहीं समझता। क्योंकि उनपर मुझसे ज्यादा छाप रवीन्द्रनाथ की है। ‘दूसरा सप्तक’ की असमंजस कविता यद्यपि रवीन्द्रनाथ की किसी भी एक या अनेक कविताओं की छाया नहीं है, मगर मैं उसे अनुगामिनी तो मानता हूँ। उसका छंद, उसका प्रवाह, उसकी सजावट, ये मेरे नहीं हैं। अव्यक्त की ओर उसमें जो इशारा है वह भी मेरा नहीं है। मैं भगवान की बात कम करता हूँ- जब करता हूँ तो रहस्य की तरह नहीं। क्योंकि इस सिलसिले में मेरे सामने जो कुछ साफ़ है वह खूब साफ़ है, और जो साफ़ नहीं है, उसकी बात करने का अर्थ दूसरों के लिए एक उलझन की सम्भावना पैदा करने जैसा है। कदाचित इसी लिए मैंने अपनी कविता में प्रायः वही लिखा है जो मेरी ठीक पकड़ में आ गया है। दूर की कौड़ी लाने की महत्त्वाकांक्षा भी मैंने कभी नहीं की।

‘दूसरा सप्तक’ की मेरी कविताएँ मेरी ठीक प्रतिनिधि कविताएँ नहीं हैं। जगह की तंगी को सोच कर मैंने छोटी-छोटी कविताएँ ही इसमें दी हैं। ‘आशा-गीत’, ‘दहन-पर्व’, ‘अश्रु और आश्वास’, ‘बंधा सावन’ और ऐसी अन्य लम्बी कविताएँ अगर पाठकों के सामने पेश कर सकता तो ज्यादा ठीक अंदाज़ उनसे लगता। बहुत मामूली रोज़मर्रा के सुख-दुःख मैंने इसमें कहे हैं जिनका एक शब्द भी किसी को समझाना नहीं पड़ता। “शब्द टप-टप टपकते हैं फूल से, सही हो जाते हैं मेरी भूल से।”

बेशक ‘भूल से’ ही यह सब मेरे हाथों बन पड़ता है क्योंकि कभी कोई दर्शन, वाद और जिसे टैकनीक कहते हैं मैंने नहीं सोचा। बहुत से ख़याल अलबत्ता मेरे हैं, मगर मैं देखता हूँ कि ज़्यादातर लोगों के ख़याल भी तो वही हैं- वे अमल भले ही उन ख़यालों के मुताबिक न करते हों। दर्शन में अद्वैत, वाद में गांधी का, और टैकनीक में सहज-लक्ष्य ही मेरे बन जायें, ऐसी कोशिश है। और अधिक क्या कहूँ। इतना भी न कहता तो ज्यादा अच्छा लगता।

■■■


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

Leave a Reply

Related Posts

कहानी | Story

कहानी: ‘धुआँ’ – गुलज़ार

‘धुआँ’ – गुलज़ार बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में ‘धुआँ’ भर गया। चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई थी। सात बजे तक चौधराइन ने रो-धो कर Read more…

पुस्तक अंश | Book Excerpt

क्यों बीरसा मुण्डा ने कहा था कि वह भगवान है?

बीरसा मुण्डा, जिसके पूर्वज जंगल के आदि पुरुष थे और जिन्होंने जंगल में जीवन को बसाया था, आज वही बीरसा और उसका समुदाय जंगल की धरती, पेड़, फूल, फल, कंद और संगीत से बेदखल कर Read more…

कहानी | Story

कहानी: ‘उसने तो नहीं कहा था’ – शैलेश मटियानी

‘उसने तो नहीं कहा था’ – शैलेश मटियानी राइफल की बुलेट आड़ के लिए रखी हुई शिला पर से फिसलती हुई जसवंतसिंह के बाएँ कंधे में धँसी थी, मगर फिर भी काफी गहरी चोट लग Read more…

error:
%d bloggers like this: