मंटो और ग़ालिब की दोज़ख

जिस किताब की बात आज मैं करने जा रहा हूँ उसे रबिशंकर बल ने मूल रूप से बंगला में लिखा है और इसका अनुवाद अमृता बेरा ने हिंदी या कह लीजिए हिंदुस्तानी में किया है। किताब का नाम है ‘दोज़ख़नामा’। इसकी कहानी उर्दू और फ़ारसी के मशहूर अदबी शायर ग़ालिब तथा बीसवीं सदी के उर्दू के बेबाक अफसाना-निगार मंटो की निजी ज़िन्दगियों के इर्द गिर्द घूमती है।

मिर्ज़ा ग़ालिब को लेके लिखा गया मंटो का अप्रकाशित उपन्यास एक अख़बार में क़लम घिसने वाले मज़दूर के हाथ लग जाता है, उसके उर्दू में होने की वजह से वो उसे अपने साथ कोलकाता ले जाता है इस मक़सद से कि उसका तर्जुमा किसी से करवाएगा और खुद उसे अपनी ज़ुबान में ढालेगा।

मंटो और ग़ालिब अपनी-अपनी क़ब्रगाहों से एक दूसरे से मुब्तिला हैं। एक तरफ है मंटो जिसे दुनिया पागल कहती थी, जो किस्सों की खोज में इतनी दूर आ चुका है कि अब वहाँ से लौटना नामुमकिन है। तो दूसरी तरफ हैं ग़ालिब जो खुद में एक तरीक़ी पहेली की तरह हैं, जो खुद को एक बुरा ख़्वाब मानते हैं, वो ख़्वाब जिसमें दिल्ली के करबला हो जाने का दुःख उनके सीने पर एक भारी पत्थर जैसा है जिसे वो तमाम उम्र अपनी ग़ज़लों के साथ ढोते रहे हैं।

कभी मंटो ने किसी किस्से में एक चिड़िया की शक्ल इख़्तियार करके आज़ादी की गुहार लगायी, जिसमें वो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की सरहद के ठीक बीच ओ बीच उड़ रहा है। कभी किसी काफ़िर रूह के जैसे किसी गंदे से कोठे पे औरत को ठंडा गोश्त समझने वाला सरफिरा, तो कभी सादत हसन को ज़िंदा दफन करके उसकी लाश को किस्सों की आग में जला मंटो खुद को धुआँ बना देता है।

कभी ग़ालिब ख़ून से सने काग़ज़ पर इश्क़ की बातें लिखते हैं, कभी ज़िन्दगी के शतरंज में शिकस्त खाते हुए मौलाना रूमी के किस्से सुनाते हैं तो कभी मीर तक़ी मीर के दर्द भरे अशआर। उनके दिल की दरगाह में शराब यूँ बहती है मनो बहिश्त की कोई नहर बह रही हो, बदनसीबी के किस्सों के बीच क़ब्र के अंधेरों को अपनी मुठ्ठी में समेटे एक शेर बार-बार दोहरा रहे हैं –

“मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती”

कैसे आएगी नींद, भला क़ब्र में भी नींद आती है क्या?

मंटो और बम्बई से मुहब्बत भी अलग किस्सा है, उसे लाहौर जाके भी लगता है अभी भी वो बम्बई में ही है। आख़िर हो भी क्यों न, बम्बई ने ही मंटो का हाथ पकड़ के वहाँ के गली-कूंचों, कोठों, समुंदर का किनारा, रात-दिन, ख़ुशी- ग़म, बीमारी, दोस्ती और न जाने कैसे कैसे अनुभवों से रूबरू करवाया। जब भी मंटो को बम्बई की याद आती, वो अपनी आँखें बंद कर लेता और बम्बई एक अँधेरे जहाज़ के मानिंद दूर समुंदर की लहरों पर तैरता हुआ दिखता।

ऐसे ही ग़ालिब और दिल्ली का रिश्ता सुकून और तकलीफों का है। यूँ तो उनका ज़्यादातर वक़्त अपने शैतान के कमरे में ही गुज़रता, दो-चार दोस्त थे जो आके महफ़िल जमा लेते। शराब और शायरी का एक अनोखा संगम हर रोज़ होता। ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हों में जहाँपनाह के दरबार में जगह मिली इस शर्त पर कि कोई जश्न हो या त्यौहार जहाँपनाह को नज़राना चाहिए और ये बात ग़ालिब को बिलकुल नागावार थी सो खर्चों के लिए कुछ न कुछ लिख कर बादशाह के मुंह पे मार देते।

पर आख़िर कब तक यूँही ज़िन्दगी बसर होती। न तो मंटो ने अपनी ज़िन्दगी को कभी किस्सों और शराब से ऊपर रखा और न ही ग़ालिब ने कभी ग़ज़लों और शराब से ऊपर आके अपनी नवाबियत को छोड़ा।

दोनों ही एक बार फिर इस उपन्यास में अपनी-अपनी दोज़ख में जलते हुए उसकी रौशनी से पैदा होने वाले किस्सों से एक के बाद एक जुड़ते जाते हैं जैसे हम सब की ज़िन्दगियों से जुड़ा किस्सा एक दोज़ख़नुमा अंजाम की तरफ बढ़ रहा हो।

– अनस