द्रौपदी: एक आत्मकथा

है कौन यहाँ पर वीर जिसे
मैं दिल की बात बता पाऊं
है किस प्राणी में धीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं

ये बात उसी तक पहुंचेगी
ये आंच उसी तक पहुंचेगी
जिसने अग्नि के जल तट पर
अपने मन को सेका होगा
जिसने नारी के अश्कों को
पलक पलक रोका होगा
जिसने रोकी होंगी नदियां
जिसने अम्बर रोका होगा
जिसने देखी शमशीर उसे
मैं शम और शीर दिखा पाऊं
है किस प्राणी में धीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं

अग्नि ने मुझको जन्म दिया
सो यज्ञसेनी मैं कहलाई
प्रतिशोध का तीर चलाने को
द्रौपदी पिता के घर आई।
कमल नयन, छवि अरी सुंदर
कृष्णा का मुझको नाम मिला
मुझ से अधर्म का सर्वनाश
ऐसा मुझको वरदान मिला
कृष्ण की छवि लिए मन में
मैं कृष्ण कृष्ण भजती जाऊं
है किस प्राणी में धीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं।

नागिन सा चढ़ता यौवन
कान्हा की प्रीत में रमता मन
कुछ और मगर सौभाग्य मेरे
ये कह गए कृष्ण आराध्य मेरे
ब्राह्मण का धर कर सरल वेश
अर्जुन थे कर गए लक्ष भेद
अभिमान भूपों का चूर्ण हुआ
इति। स्वयंवर सम्पूर्ण हुआ
अर्जुन छवि है मोहन की
मैं अर्जुन की अब हो जाऊं
है किस प्राणी में धीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं।

हाय!
माँ ने क्या यह बात कही
अब कैसे हो यह बात सही
खुद को कैसे यूं बांट दूं मैं
पर नर का कैसे पाप लूं मैं
अवज्ञा माँ की कैसे करूं
प्रभु! कहो मैं डूब मरूं
युग युग तक बदनाम किया
नीति ने कैसा काम किया
बहू नारी गौरव है नर का
नारी धिक्कारी जाऊं
है किस प्राणी में धीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं

मुश्किल बहुत यह कृत सखी
है इच्छाएं सब मृत सखी
हर वर्ष कक्ष बदलती हूँ
स्वामी सा रंग मैं धरती हूँ
अर्जुन को मेरा मोह नहीं
वनवास गए, विछोह नहीं
ठहरा हुआ सा पानी हूँ
मैं इंद्रप्रस्थ की महारानी हूँ
पंचपति पांचाली मै अब
पृथक् पृथक् बिखरी जाऊं
है किस प्राणी में धीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं

द्यूतक्रीड़ा का सेज सजा
पाखण्ड का मैला खेल रचा
अधर्मी, अभिमानी, मूरख
मंदबुद्धि, अज्ञानी मूरख
मेरे क्या केश पकड़ता है
आ तुझको काल जकड़ता है
धृतराष्ट्र और द्रोण सभी
सभा में बैठे मौन सभी
चुप हैं मेरे वीर पति
कैसे मैं लाज बचा पाऊं
है किस प्राणी में धीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं

घमंड शत्रु पर भारी है
रण चंडी अवतारी है
काली का अवतार हूँ मैं
हाँ खुद में हाहाकार हूँ मैं
नहीं दूर, है मृत्यु निकट
तू देख रूप विकराल, विकट
झुके शीश कट जाएंगे
जो मौन अभी, चिल्लाएंगे
कृष्णा ने मेरी लाज धरी
मैं अल्पमती से डर जाऊं?
है किस प्राणी में धीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं

अरण्यावास, अज्ञातवास
युग के देखो सभी दास
दुर्योधन न्याय ले ना सका
पांच ग्राम भी दे ना सका
नियति ने जो लिखा कभी
होगा अब परिणाम वहीं
धर्म अधर्म का छण होगा
महाभारत का रण होगा
पति, पुत्र, पिता सबको
मैं माथे तिलक लगा जाऊं
है किस प्राणी में धीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं

माथे से रक्त टपकता है
अपनों सा रक्त महकता है
भीषण नर संहार मिला
कैसा विजय उपहार मिला
लाशों से है पटी धरती
रोती माँ विलाप करती
कुंती और गांधारी सभी
हस्तिनापुर की नारी सभी
जिन पूतों पर जान दिया
बेजान देह कैसे पाऊं
है कौन यहां पर वीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं

लोभ, वासना अहंकार
मृत्यु के देखो सभी द्वार
मृत्यु जब मुह को खोलती है
जात धर्म नहीं तौलती है
मेरू की गोद में लेटी हुई
जीवन से विदाई लेती हुई
पांच पति, कोई साथ नहीं
इसमें विचित्र कोई बात नहीं
नीति की कठपुतली बन
मैं मंद मंद ही मस्काऊं
है कौन यहां पर वीर जिसे
मैं मन की पीड़ा गा पाऊं

ये बात नहीं अभी पूरी है
कुछ इच्छा मेरी अधूरी है
फिर जो गर यह काव्य लिखो
ज्वाला से मेरा भाग्य लिखो
जो हो उचित, हो सत्य वहीं
मैं रहूं जहां हो वक्त सही
कोई नज़र ना मुझको छू पाए
कोई कीटक ना अब गुर्राए
मैं अपने खुद के भाग्य का घर
जीत जीत बुनती जाऊं
हो मुझमें इतना धीर कि मैं
अब मन की पीड़ा ना गाऊ
हो मुझमें इतना धीर की मैं
अब मन की पीड़ा ना गाऊ