दुःख के दिन की कविता

मारे जाते हैं सपने
बची रह जाती है
परम्परा।
वध होता है
जिजीविषा का
ढोती रहती हैं सभ्यताएँ
यह दुख।
सदियों तक
सलीब ढोता है मनुष्य।

***

रात ताकती रहती है
दुःख को,
और दुःख रात को
भयावह सन्नाटे के साथ
रख के एक दूसरे के
काँधे पर सर।

***

मैंने पीठ टेक दी है
समय की तरफ
हथेलियों को धरा है सपाट,
तुम मेरी हथेलियों पर
अपना हाथ रख,
और गले लगकर
सोख लेना मेरे दुःख।

***

मेरे लिए कविता
जब समाप्त हो जाएगी,
तब तुम्हें मेरी चीखें
सुनाई देंगी
सन्नाटे में गूँजती हुई।
दरअसल, कविता
सोखती रहती है
मेरे दुःख और आँसू।